किसी भी बच्चे को समाज से जुड़ कर चलने की प्रेरणा अभिभावकगण ही दे सकते हैं। अगर यह दुनिया खुशनुमा होगी, तो बच्चों के चेहरे पर मुसकान खिली रहेगी। बच्चे कभी एक-दूसरे के हाथों में हाथ डाले खेलते हैं, तो कभी पतंग उड़ाते हैं, कभी गुब्बारों से मन बहलाते हैं, तो कभी तोते और पिल्ले के साथ खेलते हैं। इनकी इसी मुस्कान को बनाए रखने के लिए अभिभावकगण को आगे आना चाहिए।
अभिभावक ही बच्चों को संस्कार दे सकते है। बच्चों का समग्र विकास तब होगा, जब अभिभावक अपने पुत्र पुत्रियों में संस्कार का संचय स्वंम करेंगे |
प्रत्येक अभिभावक का यह परम पुनीत धर्म र्कत्तव्य है कि बालक को जन्म देने के साथ-साथ आई हुई जिम्मेदारियों में से भोजन, वस्त्र आदि की शारीरिक आवश्यकताओं की की पूर्ति होने प़र उनकी अच्छी शिक्षा का प्रबंध करे !
आदर्श देना, संस्कारित करना और शिक्षाएं देना ये काम तो हर समाज के अभिभावक करते हैं. शैली हर एक की अलग अलग होती है. क्या सिखा रहे हो ये तो महत्व का है ही कैसे सिखा रहे हो वह भी कम महत्व का नही है.
बहुत से अभिभावक मित्रों का सा बर्ताव रखते हैं – जैसे वो और उनके बच्चे एक ही टीम हैं जिसके वो कप्तान हैं. मौका आने पर छोटी-मोटी जिम्मेदारियों के बहाने कप्तानी का भार छोटों पर डालना और उन से करवा कर सिखाना – आदर्श और संस्कार एक क्रियात्मक तरीके से एक प्रक्रिया के माध्यम से देना. फ़ंडे पिलाना या पास बैठा कर भाषण या उपदेश झिलवाना नहीं. ऐसे मे दिए गए संस्कार ज्यादा टिकाऊ साबित होते हैं. क्योंकि आप खुद एक उदाहरण प्रस्तुत करते हो और व्यव्हारिक पक्ष मजबूत रहता है.
अपने बच्चो को हमेशा बताये की अहिंसा एक सुंदर आदर्श है लेकिन आत्मरक्षा के गुर भी सिखाये . आत्मरक्षा के बिना अहिंसा एक सुंदर आदर्श की अति है , इस बात को भी हमेशा ध्यान में रखे |
......आमोद कुमार,
......आमोद कुमार,
पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान
1 comment:
बिलकुल सत्य हैं !!!!!!
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