Monday, May 17, 2010

विवेक-बुद्धि से काम लेने पर शक्तिशाली शत्रु को भी परास्त किया जा सकता है !

पंचतंत्र की कहानियां बहुत जीवंत हैं. इनमे लोकव्यवहार को बहुत सरल तरीके से समझाया गया है. मैं इस पुस्तक को नेतृत्व क्षमता विकसित करने का एक सशक्त माध्यम मानता हूँ ! सभी लोग इसे पढ़कर अपनी ज्ञान को ताजा कर सकते हैं ! As per Computer term "Refresh"
नाग और चीटियां: —बुद्धि से काम लेने पर शक्तिशाली शत्रु को भी परास्त किया जा सकता है.........
( पंचतंत्र की रोचक कहानियां पुस्तक के कुछ अंश )
एक घने जंगल में एक बड़ा-सा नाग रहता था। चिड़ियों के अंडे, मेढ़क तथा छिपकलियों जैसे छोटे-छोटे जीव-जंतुओं को खाकर अपना पेट भरता था। रातभर वह अपने भोजन की तलाश में रहता और दिन निकलने पर अपने बिल में जाकर सो रहता। धीरे-धीरे वह मोटा होता गया, हालत यह हो गई कि वह इतना मोटा हो गया कि बिल के अंदर-बाहर आना-जाना भी दूभर हो गया।आखिरकार, उसने बिल को छोड़कर एक विशाल पेड़ के नीचे रहने की सोची। लेकिन वहीं पेड़ की जड़ में चींटियों की बांबी थी और उनके साथ का रहना नाग के लिए असंभव था। सो, वह नाग उन चींटियों की बांबी के निकट जाकर बोला, ‘‘मैं सर्पराज नाग हूं, इस जंगल का राजा। मैं तुम चींटियों को आदेश देता हूं कि यह जगह छोड़कर चले जाओ।’’वहां और भी जानवर थे, जो उस भयानक सांप को देखकर डर गए और जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। लेकिन चींटियों ने नाग की इस धमकी पर कोई ध्यान न दिया। वे पहले की तरह अपने काम-काज में जुटी रहीं। नाग ने यह देखा तो उसके क्रोध का पारावार न रहा।वह गुस्से में भरकर बांबी के निकट जा पहुंचा। यह देखा हजार-हजार चींटियाँ उस बांबी से निकल पड़ी और नाग से लिपटकर उसके शरीर पर काटने लगीं। उनके कंटीले डंकों से परेशान नाग बिलबिलाने लगा। उसकी पीड़ा असहनीय हो चली थी और शरीर पर घाव होने लगे थे। नाग ने चींटियों को हटाने की बहुत कोशिश की लेकिन असफल रहा। कुछ ही देर में उसने वहीं तड़प-तड़प कर जान दे दी।
गोलू-मोलू और भालू--सच्चा मित्र वही है जो संकट के काम आए !!!!!!
गोलू-मोलू और पक्के दोस्त थे। गोलू जहां दुबला-पतला था, वहीं मोलू मोटा गोल-मटोल। दोनों एक-दूसरे पर जान देने का दम भरते थे, लेकिन उनकी जोड़ी देखकर लोगों की हंसी छूट जाती। एक बार उन्हें किसी दूसरे गांव में रहने वाले मित्र का निमंत्रण मिला। उसने उन्हें अपनी बहन के विवाह के अवसर पर बुलाया था।उनके मित्र का गांव कोई बहुत दूर तो नहीं था लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए जंगल से होकर गुजरना पड़ता था। और उस जंगल में जंगली जानवरों की भरमार थी।दोनों चल दिए...जब वे जंगल से होकर गुजर रहे थे तो उन्हें सामने से एक भालू आता दिखा। उसे देखकर दोनों भय से थर-थर कांपने लगे। तभी दुबला-पतला गोलू तेजी से दौड़कर एक पेड़ पर जा चढ़ा, लेकिन मोटा होने के कारण मोलू उतना तेज नहीं दौड़ सकता था। उधर भालू भी निकट आ चुका था, फिर भी मोलू ने साहस नहीं खोया। उसने सुन रखा था कि भालू मृत शरीर को नहीं खाते। वह तुरंत जमीन पर लेट गये और सांस रोक ली। ऐसा अभिनय किया कि मानो शरीर में प्राण हैं ही नहीं। भालू घुरघुराता हुआ मोलू के पास आया, उसके चेहरे व शरीर को सूंघा और उसे मृत समझकर आगे बढ़ गया।जब भालू काफी दूर निकल गया तो गोलू पेड़ से उतरकर मोलू के निकट आया और बोला, ‘‘मित्र, मैंने देखा था....भालू तुमसे कुछ कह रहा था। क्या कहा उसने ?’’मोलू ने गुस्से में भरकर जवाब दिया, ‘‘मुझे मित्र कहकर न बुलाओ...और ऐसा ही कुछ भालू ने भी मुझसे कहा। उसने कहा, गोलू पर विश्वास न करना, वह तुम्हारा मित्र नहीं है।’’सुनकर गोलू शर्मिन्दा हो गया। उसे अभ्यास हो गया था कि उससे कितनी भारी भूल हो गई थी। उसकी मित्रता भी सदैव के लिए समाप्त हो गई।
गुफा की आवाज—संकट के समय में भी बुद्धि का दामन नहीं छोड़ना चाहिए...
एक बूढ़ा शेर जंगल में मारा-मारा फिर रहा था। कई दिनों से उसे खाना नसीब नहीं हुआ था। दरअसल बुढ़ापे के कारण वह शिकार नहीं कर पाता था। छोटे-छोटे जानवर भी उसे चकमा देकर भाग जाते थे। वह भटकते-भटकते काफी थक गया तो एक स्थान पर रुककर सोचने लगा कि क्या करूं ? किधर जाऊं ? कैसे बुजाऊं इस पेट की आग ? काश ! मैं भी दूसरे शाकाहारी जानवरों की भांति घास-पात, फल-फूल खा लेने वाला होता तो आज मुझे इस प्रकार भूखों न मरना पड़ता।अचानक उसकी नजर एक गुफा पर पड़ी। उसने सोचा कि इस गुफा में अवश्य ही कोई जंगली जानवर रहता होगा। मैं इस गुफा के अन्दर बैठ जाता हूं, जैसे ही वह जानवर आएगा, मैं उसे खाकर अपना पेट भर लूंगा। शेर उस गुफा के अंदर जाकर बैठ गया और अपने शिकार की प्रतीक्षा करने लगा।वह गुफा एक गीदड़ की थी। गीदड़ ने गुफा के करीब आते ही गुफा में शेर के पंजों के निशान देखे तो वह फौरन खतरा भांप गया। परंतु सामने संकट देखकर उसने अपना संयम नहीं खोया बल्कि उसकी बुद्धि तेजी से काम करने लगी कि इस शत्रु से कैसे बचा जाए ?और फिर उसकी बुद्धि में नई बात आ ही गई, वह गुफा के द्वार पर खड़ा होकर बोला--‘‘ओ गुफा ! गुफा ।’’जब अंदर से गुफा ने कोई उत्तर न दिया, तो गीदड़ एक बार फिर बोला—‘‘सुन री गुफा ! तेरी मेरी यह संधि है कि मैं बाहर से आऊंगा तो तेरा नाम लेकर तुझे बुलाऊंगा, जिस दिन तुम मेरी बात का उत्तर नहीं दोगी मैं तुझे छोड़कर किसी दूसरी गुफा में रहने चला जाऊंगा।’’जवाब न मिलता देख गीदड़-बार-बार अपनी बात दोहराने लगा।अन्दर बैठे शेर ने गीदड़ के मुंह से यह बात सुनी, तो वह यह समझ बैठा कि गुफा गीदड़ के आने पर जरूर बोलती होगी। अतः अपनी आवाज को भरसक मधुर बनाकर वह बोला—‘‘अरे आओ—आओ गीदड़ भाई। स्वागत है।’’ ‘‘अरे शेर मामा ! तुम हो। बुढ़ापे में तुम्हारी बुद्धि इतना भी नहीं सोच पा रही कि गुफाएं कभी नहीं बोलतीं। कहकर वह तेजी से पलटकर भागा। शेर ने उसे पकड़ने के लिए गुफा से बाहर अवश्य आया किंतु तब तक वह गीदड़ नौ दो ग्याह हो चुका था।
भेड़िया आया...भेड़िया आया—झूठ बोलने वालों पर कोई विश्वास नहीं करता.......
एक लड़का रोज जंगल में भेड़ें चराने के लिए जाता था। वह बड़ा शैतान था।अपनी शैतानियों द्वारा दूसरों को परेशान करने में उसे बड़ा मजा आता था। मगर जंगल में अकेला होने के कारण वह उकता जाता था। यहां किसे और कैसे परेशान करे, यही सोचता रहता था। जंगल से लगते कुछ किसानों के खेत थे। वे सुबह-सुबह आकर अपने खेतों में काम करने में जुट जाते थे।एक दिन उसने किसानों के साथ शैतानी करने की सूझी।वह सोचने लगा कि ऐसा क्या किया जाए कि सारे किसान परेशान हो जाएं।अचानक उसके दिमाग में एक खुराफात आ ही गई।वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा, ‘‘बचाओ, बचाओ ! भेड़िया आया...भेड़िया आया !’’किसानों ने लड़के की आवाज सुनी तो वे अपना-अपना काम छोड़कर लड़के की मदद के लिए दौड़ पड़े। जो भी हाथ लगा, साथ ले आए। कोई फावड़ा ले आया, कोई दरांती, तो कोई हंसिया। मगर जब वे लड़के के पास पहुंचे तो, उन्हें कहीं भेड़िया दिखाई नहीं दिया।किसानों ने लड़के से पूछा, ‘‘कहाँ है भेड़िया ?’’उनका सवाल सुनकर लड़का हंस पड़ा और बोला—‘‘मैं तो मजाक कर रहा था भेड़िया आया ही नहीं था। जाओ....तुम लोग जाओ।’’किसान लड़के को डांट-फटकार कर लौट आए।उनके जाने के बाद वह अपने आपसे बोला—‘वाह ! कैसा बेवकूफ बनाया। मजा आ गया।’कुछ दिनों बाद लड़के ने फिर ऐसा ही किया। आसपास के किसान फिर मदद के लिए दौड़ आए। लड़का फिर हंसकर बोला, ‘‘मैं मजाक कर रहा था। आप लोगों के पास कोई और काम नहीं है जो मामूली – सी चीख-पुकार सुनकर दौड़े चले आते हो।’’किसानों को बड़ा गुस्सा आया एक बार फिर उन्होंने उसे डांट-फटकार लगाई।मगर ढीठ लड़का हंसता रहा।लेकिन अब किसानों ने दृढ़ निश्चय कर लिया कि इस लड़के की मदद को कभी नहीं आएंगे।कुछ समय बाद एक दिन सचमुच ही भेड़िया आ पहुंचा। लड़का दौड़कर एक पेड़ पर चढ़ गया और मदद के लिए चिल्लाने लगा। इस बार उसकी मदद के लिए कोई नहीं आया। सभी ने यही सोचा कि वह बदमाश लड़का पहले की तरह मजाक कर रहा है।भेड़िये ने कई भेड़ों को मार डाला। इससे लड़के को अपने किए पर दुख हुआ।
मुफ्तखोर मेहमान -----—अजनबियों पर कभी विश्वास न करो.......
एक राजा के शयनकक्ष में मंदरीसर्पिणी नाम की जूं ने डेरा डाल रखा था। रोज रात को जब राजा जाता तो वह चुपके से बाहर निकलती और राजा का खून चूसकर फिर अपने स्थान पर जा छिपती।संयोग से एक दिन अग्निमुख नाम का एक खटमल भी राजा के शयनकक्ष में आ पहुंचा। जूं ने जब उसे देखा तो वहां से चले जाने को कहा। उसने अपने अधिकार-क्षेत्र में किसी अन्य का दखल सहन नहीं था।लेकिन खटमल भी कम चतुर न था, बोलो, ‘‘देखो, मेहमान से इसी तरह बर्ताव नहीं किया जाता, मैं आज रात तुम्हारा मेहमान हूं।’’जूं अततः खटमल की चिकनी-चुपड़ी बातों में आ गई और उसे शरण देते हुए बोली, ‘‘ठीक है, तुम यहां रातभर रुक सकते हो, लेकिन राजा को काटोगे तो नहीं उसका खून चूसने के लिए।’’खटमल बोला, ‘‘लेकिन मैं तुम्हारा मेहमान है, मुझे कुछ तो दोगी खाने के लिए। और राजा के खून से बढ़िया भोजन और क्या हो सकता है।’’‘‘ठीक है।’’ जूं बोली, ‘‘तुम चुपचाप राजा का खून चूस लेना, उसे पीड़ा का आभास नहीं होना चाहिए।’’‘‘जैसा तुम कहोगी, बिलकुल वैसा ही होगा।’’ कहकर खटमल शयनकक्ष में राजा के आने की प्रतीक्षा करने लगा।रात ढलने पर राजा वहां आया और बिस्तर पर पड़कर सो गया। उसे देख खटमल सबकुछ भूलकर राजा को काटने लगा, खून चूसने के लिए।ऐसा स्वादिष्ट खून उसने पहली बार चखा था, इसलिए वह राजा को जोर-जोर से काटकर उसका खून चूसने लगा। इससे राजा के शरीर में तेज खुजली होने लगी और उसकी नींद उचट गई। उसने क्रोध में भरकर अपने सेवकों से खटमल को ढूंढकर मारने को कहा।यह सुनकर चतुर खटमल तो पंलग के पाए के नीचे छिप गया लेकिन चादर के कोने पर बैठी जूं राजा के सेवकों की नजर में आ गई। उन्होंने उसे पकड़ा और मार डाला।
नकल करना बुरा है -—नकल करने के लिए भी अकल चाहिए......
एक पहाड़ की ऊंची चोटी पर एक बाज रहता था। पहाड़ की तराई में बरगद के पेड़ पर एक कौआ अपना घोंसला बनाकर रहता था। वह बड़ा चालाक और धूर्त था। उसकी कोशिश सदा यही रहती थी कि बिना मेहनत किए खाने को मिल जाए। पेड़ के आसपास खोह में खरगोश रहते थे। जब भी खरगोश बाहर आते तो बाज ऊंची उड़ान भरते और एकाध खरगोश को उठाकर ले जाते।एक दिन कौए ने सोचा, ‘वैसे तो ये चालाक खरगोश मेरे हाथ आएंगे नहीं, अगर इनका नर्म मांस खाना है तो मुझे भी बाज की तरह करना होगा। एकाएक झपट्टा मारकर पकड़ लूंगा।’दूसरे दिन कौए ने भी एक खरगोश को दबोचने की बात सोचकर ऊंची उड़ान भरी। फिर उसने खरगोश को पकड़ने के लिए बाज की तरह जोर से झपट्टा मारा। अब भला कौआ बाज का क्या मुकाबला करता। खरगोश ने उसे देख लिया और झट वहां से भागकर चट्टान के पीछे छिप गया। कौआ अपनी हीं झोंक में उस चट्टान से जा टकराया। नतीजा, उसकी चोंच और गरदन टूट गईं और उसने वहीं तड़प कर दम तोड़ दिया।
!!!!!!जिस प्रकार मस्त भँवरे किसी हाथी के कान के समीप जाकर जब अपना राग अलापते हैं तो हाथी उनपर क्रोध नहीं करता क्योंकि बलवान को दुसरे बलवान पर ही क्रोधित होना शोभा देता है !!!!!!
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दक्षिण देश के एक प्रान्त में महोलारोप्य नाम का नगर था. वहां एक महादानी, प्रतापी राजा अमरशक्ति रहता था. उसके अनन्त धन था व रत्‍नों की अपार राशि थी किन्तु उसके पुत्र बिल्कुल जड़्बुद्धि थे. तीनों पुत्रों – बहुशक्ति, उग्रशक्ति, अनन्तशक्ति के होते हुए भी वह सुखी न था. तीनों अविनीत, उच्छृङखल और मूर्ख थे.
राजा ने अपने मन्त्रियों को बुलाकर पुत्रों की शिक्षा के संबंध में अपनी चिन्ता प्रकट की. राजा के राज्य में उस समय 500 वृत्ति-भोगी शिक्षक थे. उनमें से एक भी ऐसा नहीं था जो राजपुत्रों को उचित शिक्षा दे सकता. अन्त में राजा की चिन्ता को दूर करने के लिए सुमति नाम के मन्त्री ने सकलशास्त्र-पारंगत आचार्य विष्णुशर्मा को बुलाकर राजपुत्रों का शिक्षक नियुक्त करने की सलाह दी.राजा ने विष्णुशर्मा को बुलाकर कहा कि यदि आप इन पुत्रों को शीघ्र ही राजनीतिज्ञ बना देंगे तो मैं आपको 100 गांव इनाम में दूँगा. विष्णुशर्मा ने हँसकर उत्तर दिया – “महाराज, मैं अपनी विद्या को बेचता नहीं हूँ. इनाम की मुझे इच्छा नहीं है. आपने आदर से बुलाकर आदेश दिया है इसलिये 6 महीने में ही मैं आपके पुत्रों को राजनीतिज्ञ बना दूंगा. यदि मैं इसमें सफल न हुआ तो अपना नाम बदल डालूंगा”.
आचार्य का आश्‍वासन पाकर राजा ने अपने पुत्रों का शिक्षण भार उनपर डाल दिया और निश्‍चिन्त हो गया. विष्णुशर्मा ने उनकी शिक्षा के लिये अनेक कथायें बनाईं. उन कथाओं द्वारा ही उन्हें राजनीति और व्यवहार-नीति की शिक्षा दी. उन कथाओं के संग्रह का नाम ही ’पंचतंन्त्र’ है. पांच प्रकरणों में उनका विभाग होने से उसे ’पंचतंन्त्र’ नाम दिया गया है.
राजपुत्र इन कथाओं को सुनकर 6 महीने में ही पूरे राजनीतिज्ञ बन गये.
आचार्य विष्णुशर्मा ने सभी राजकुमारों को नीति एवं ज्ञान की शिक्षा कथाओं के माध्यम से दी. ये कथाएँ पांच खंडों में संकलित हैं जिनसे मिलकर पंचतंत्र बना है !
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जिस प्रकार कोई स्वस्थ मनुष्य चिकित्सक को पसंद नहीं करता उसी प्रकार दुखों और संकटों से घिरा हुआ मनोरोगी राजा किसी भले मंत्री को पसंद नहीं करता है !
दूसरे पर विश्वास न करने वाले कमज़ोर प्राणी बलवानों से नहीं मारे जाते, जबकि कभी-कभी बलवान भी विश्वास करने पर कमज़ोर के हाथों मारा जाता है.
गर्मी के दिनों में तालाब तो सारे ही सूख जाते हैं लेकिन सागर कभी नहीं सूखता. जो व्यक्ति मुसीबतों से नहीं डरता, सुख में प्रसन्न नहीं रहता, और युद्ध करने से नहीं कतराता, ऐसा वीर पुरुष हर माँ के गर्भ से उत्पन्न नहीं होता है.
“खुश होनेपर राजा अपने जिन बहादुर और वफादार सेवकों को ईनाम देता है वही सेवक समय आने पर राजा के लिए अपनी जान भी न्यौछावर कर देते हैं.”
“जो राजा अपनी प्रजा का मन न जीत सके, जनहित के कार्य न करे, उसे कान्तिविहीन सूर्य ही कहा जा सकता है.”
!!!!!!बंजर धरती पर हल जोतने और बीज बोने का कोई लाभ नहीं होता उसी प्रकार मंद बुद्धि वाले प्राणी से विद्या और गुण की बात करना बेकार होता है !!!!!
यदि आपका पड़ोसी भूखा सो रहा है और आप पूजा पाठ करने में मस्‍त है, तो यह मत सोचिये कि आपके द्वारा शुभ कार्य हो रहा है क्‍योकि भूखा व्‍यक्ति उसी की छवि है, जिसे पूजा-पाठ करके आप प्रसन्‍न करना या रिझाना चाहते है। क्‍या वह सर्व व्‍यापक नही है? ईश्‍वर द्वारा सृजित किसी भी जीव व संरचना की उपेक्षा करके प्रभु भजन करने से प्रभु कभी प्रसन्‍न नही होगें।
“उनपर यक़ीन करो जो सत्य की खोज कर रहे हैं. संदेह उनपर करो जिन्हें सत्य मिल गया है”. – आंद्रे गीद
जीवन में खतरे तो उठाने ही पड़ते हैं. बिना खतरों के जीवन भी कैसा जीवन! जीवन में खतरे नहीं उठाने पर दुःख-दर्द को कुछ दूर रखा जा सकता है लेकिन कुछ भी नया सीखने, महसूस करने, बदलने, बढ़ने, प्यार पाने, और जीने के लिए खतरे उठाने पड़ते हैं.
आम लोग जिसे पागलपन कहते हैं वह मेरे लिए ज्ञान की चरमसीमा है. सभी समाजों में यह प्रवृत्ति पाई जाती है कि वे पूर्णतः मुक्त व्यक्ति को बाँधकर रखना चाहते हैं. पहले तो वे उसे परास्त करने की कोशिश करते हैं. उसमें असफल रहें तो उसे विषपान कराते हैं. यदि वे इसमें भी असफल हो जाते हैं तो उनके पास एक ही उपाय बचता है – वे उसे सम्मानों और पारितोषकों के बोझ तले दबा देते हैं.
जीवन की असल त्रासदियाँ वे हैं जिनका हमारे बंधे-बंधाये विचारों से कोई सम्बन्ध नहीं होता. उनके घटित होते समय हम उनकी सरलता, विहंगमता, और बेतुकेपन से हतप्रभ हो जाते हैं.
घर घर की कहानी सबसे पुरानी हैं , घर एक मंदिर हैं , जहाँ हमारे शीष हमेशा झुकने चाहिए , अपने कार्यो को सरल और सहज ढंग से करना चाहते हैं , तो अपने घर में कभी गुस्सा ना करे , अगर आप अच्छा कार्य कर रहे हो , फिर भी घर से फटकार मिले तो भी उसे प्रेम पूर्वक स्वीकार करना सीखे , समय का पहिया बड़ा तेज चलता हैं दोस्त , घर ही तो असली मंदिर हैं , घर की गाली को हमेशा प्रसाद समझकर ग्रहण करे , हमेशा विजयी रहेंगे !!!!!!
......आमोद कुमार पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

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