स्वर्ग कहीं बाहर नहीं है, नर्क कहीं बाहर नहीं है। स्वर्ग और नर्क हमारे अन्दर होते हैं। स्वर्ग और नर्क हम अपने आप निर्मित करते हैं -- अपने ही मन में, अपने ही विचारों से, अपनी ही धारणाओं से। स्वर्ग हमारी सद्भावना में हैं, नर्क हमारी दुर्भावना में है।स्वर्ग हमारी सद्भावना में है, नर्क हमारी दुर्भावना में है | सन्त जहाँ भी जाता है, वहीं स्वर्ग बन जाता है | स्वर्ग कोई ऐसा स्थान नहीं है जहाँ पर मृत्यु के बाद सुख भोगने के लिये किसी को भेजा जाता है। स्वर्ग आपकी वह मनःस्थिति है जिसमें आप अपने अन्दर की जागृति से परमात्मा की कृपा से मिलने वाले हर्ष और उल्लास की अनुभूति करते हैं। इसी प्रकार नर्क भी कोई ऐसा स्थान नहीं है जहाँ पर पापियों को यंत्रणा दी जाती है, जहाँ पर किसीको जलती आग की लपटों में झोंका जाता है। नर्क हमारी वह मानसिक दशा है जिसमें हम अपने अस्तित्त्व की घोर यातना और अवसाद का अनुभव करते हैं। नर्क की यह स्थिति भी हम स्वयं ही निर्मित करते हैं।
स्वर्ग और नर्क के प्रति सबलोगो का आपका अपना दृष्टिकोण है।स्वर्ग और नर्क दोनों आप की अपनी मर्जी से बनते हैं और आपके साथ ही चलते हैं। देवतागण जहाँ भी जाते हैं, स्वर्ग उनके साथ चलता है।हमेशा लोग कहते हैं कि सन्त स्वर्ग जाते हैं, लेकिन ऐसा कहना बिल्कुल गलत है। वास्तविकता तो यह है कि सन्त जहाँ भी जाता है, वहीं स्वर्ग बन जाता है। देवता जहाँ भी होगा, वह स्वर्ग ही होगा।
स्वर्ग और नर्क के प्रति सबलोगो का आपका अपना दृष्टिकोण है।स्वर्ग और नर्क दोनों आप की अपनी मर्जी से बनते हैं और आपके साथ ही चलते हैं। देवतागण जहाँ भी जाते हैं, स्वर्ग उनके साथ चलता है।हमेशा लोग कहते हैं कि सन्त स्वर्ग जाते हैं, लेकिन ऐसा कहना बिल्कुल गलत है। वास्तविकता तो यह है कि सन्त जहाँ भी जाता है, वहीं स्वर्ग बन जाता है। देवता जहाँ भी होगा, वह स्वर्ग ही होगा।
बहुत सारे लोग अपने जीवन से असंतुष्ट हैं, जो लोग जीवन में कुछ अधिक पाना चाहते हैं किन्तु नहीं पा सकते, वे अपने आप को तसल्ली देते हैं , बाकी सब हमें स्वर्ग में मिलेगा। जिन को इस जीवन में सुख नहीं मिला, वे ही स्वर्ग की कल्पना करते हैं। जो लोग सुख के लिये तरसते हैं, वे ही स्वर्ग की कामना करते हैं, वे ही स्वर्ग की प्रतीक्षा करते हैं।कल्पना का स्वर्ग और कल्पना का नरक एक दुखी व्यक्ति ही बना सकता है। सुखी व्यक्ति तो जहाँ है, वहीं स्वर्ग है। नरक की बात तो वह कभी सोच ही नहीं सकता। जहाँ सुख है, वहाँ नरक नहीं होता। जहाँ देवता हैं, वहाँ नरक का सवाल ही नहीं उठता। परमात्मा नरक नहीं बनाता। हम लोग ही नरक बनाते हैं। स्वर्ग के सुख भी हमारी कल्पना के अनुसार होते हैं, नरक के दुख भी हमारी अपनी कल्पना से बनते हैं।
मनुष्य के पास जो कुछ होता है, वह उसे अच्छा नहीं लगता , जो नहीं होता वह उसके पीछे भागता है।स्वर्ग और नरक दोनों ही हमारी कल्पनाएँ हैं। स्वर्ग की कल्पना हम उन सुखों के लिये करते हैं जो हमें इस जीवन में नहीं मिल पाते। लेकिन हमारी उपलब्धि तो इसी लोक में सुख पाने में है। प्रमुखता इसी लोक की है, इसी जीवन की है। जब हम अपना सारा सामर्थ्य इसी जीवन को सफल बनाने में लगा देते हैं तो परलोक के होने या न होने का कोई महत्त्व नहीं रह जाता।
""""जार्ज बर्नार्ड शॉ ने कहा हैं कि :पात्रता अर्जित किये बिना यदि स्वर्ग पहुँच भी,जाओ तो क्या; स्वर्ग के सुख तो फिर भी नहीं पाओगे।"""""
इसलिये हमेशा काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार से दूर रहे- ये सब विकार आत्मानंदरूपी धन को हर लेनेवाले शत्रु हैं ........बड़ी से बड़ी कठिनाइयों का सामना करने वाला व्यक्ति ही स्वर्ग के सुख की अनुभूति पाता हैं !
काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, नर्क के द्वार हैं !!!!!!
परम श्री कृष्ण कहते हैं ........दो प्रकार के योगी हैं ; एक का केन्द्र बुद्धि होती है और दूसरे का केन्द्र कर्म होता है । जो लोग बुद्धि मार्ग से साधना करते हैं उनको तत्व-ज्ञानी , सांख्य-योगी या ज्ञान - योगी का नाम दिया जाता है । वैज्ञानिक कहता है ----ज्ञान दो प्रकार का होता है ; एक मुर्दा ज्ञान है जो किताबों से मिलता है और दूसरा सजीव ज्ञान होता है जो चेतना से बुद्धि में बूँद-बूद टपकता है ।
आत्मा ही परमात्मा हैं , आत्मा विकार सहित देह में निर्विकार रूप में ह्रदय में है जो कुछ करता नहीं लेकिन इसके बिना कुछ होना सम्भव भी नहीं । आत्मा देह में एक द्रष्टा है । आत्मा ह्रदय में परमात्मा है जो शरीर के कण-कण में है। आत्मा आदि- अंत रहित है और स्थिर है । आत्मा किसी भी रासायनिक, भौतिक या जैविक बिधि से न तो रूपांतरित किया जा सकता है और न ही बिभक्त किया जा सकता है । आत्मा देह समाप्ति पर मन के साथ गमन करता है । मन जब निर्विकार होता है तब आत्मा का फ्यूजन परमात्मा में हो जाता है और यदि मन विकारों के साथ होता है तब वह आत्मा नया शरीर धारण करता है ।
स्थिर- प्रज्ञ यह नहीं समझता की वह आत्मा केंद्रित है क्योंकि उसके जाननें के माध्यम --मन-बुद्धि गुन रहित होते हैं । स्थिर प्रज्ञ द्रष्टा होता है , और वह संसार को भावातीत की स्थिति में देखता है । जब तन, मन एवं बुद्धि निर्विकार होते हैं तब वह ब्यक्ति परा साधना में पहुंचा होता है जहाँ से ज्ञान मिलता है ,और ह्रदय का द्वार खुलता है तथा वह साधक परम प्रकाश की किरणों को देख कर धन्य हो उठता है ।
मनुष्य कर्मयोनि में रहकर नये संस्कारों का उपार्जन करने वाला प्राणी है । उसके सामने दो मार्ग हैं, एक तो बन्धन या नरक का और दूसरा मोक्ष या स्वर्ग का । संसार के भोगों में फँस हुआ मानव नर्क में ही पड़ा हुआ है । इसके विपरीत, सत्संग, परोपकार, शुभ कार्य, समाज-सेवा, आत्म-सुधार द्वारा मनुष्य मोक्ष की ओर अग्रसर होता है ।
संगत करना हो तो सत्य लोगो की करे , पूजा करनी हो तो ज्ञानियों का करे , बध करना हो तो अपराधियों का करे , सेवा करना हैं तो गरीबो की करे , परमात्मा को प्राप्त करना तो अपनी आत्मा को शुद्ध रखे ! स्वर्ग का भ्रमण करना हो तो सन्त के साथ रहे ! क्योंकि सन्त जहाँ भी जाता है, वहीं स्वर्ग बन जाता है !!!!!
स्वर्ग और नर्क स्वयं मनुष्य में ही विद्यमान हैं ये उसके मन के दो स्तर हैं मनुष्य के मन में स्वर्ग की स्थिति वह है जिसमें देवत्व के सद्गुणों का पावन प्रकाश होता है । दया, प्रेम, करुणा, सहानुभूति, उदारता की धाराएँ बहती हैं । इस स्थिति में मन स्वतः प्रसन्न रहता है । यही मानसिक मार्ग कल्याणकारी है । अतः इसे स्वर्ग की स्थिति भी कहा जा सकता है । दूसरी मनःस्थिति वह है जिसमें मनुष्य उद्वेग, चिंता, भय, तृष्णा, प्रतिशोध, दम्भ आदि राक्षसी वृत्तियाँ मनुष्य को अन्धकूप में डाल देती हैं । अनुताप और क्लेश की काली और मनहूस मानसिक तस्वीरें चारों ओर दिखाई देती हैं । अन्तर्जगत् यन्त्रणा से व्याकुल रहता है । कुछ भी अच्छा नहीं लगता । शोक, संताप और विलाप की प्रेतों जैसी आकृतियाँ अशान्त रखती हैं । यही नर्क की मनःस्थिति है । इस प्रकार इस जगत् में रहते हुए मानव-जीवन में ही हमें स्वर्ग और नर्क के सुख-दुःख प्राप्त हो जाते हैं ।
......आमोद कुमार
पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान
तुम मेरे साथ रहो , मैं तेरे को कर्म से बैराग में पहुँचानें का काम करूँगा तेरे को बस मेरे मुताबिक बदलते रहना है और यह काम ऐसा है जिसको कोई नहीं चाहता। जब तक पढनें से होना न हो वह पढ़ना अहंकार पैदा करता रहेगा और अहंकार अग्नि है। गीता से जो मिलता है वह अवर्नातीत है लेकिन गीता से जो खोता है उसे कोई खोना नहीं चाहता --बस यही कठिनाई हमें भटका रही है ।
आत्मा कभी न मारता है , न मरता है ...शरीर समाप्ति पर भी जो रहता है .... .वह है.....आत्मा ।
3 comments:
श्री मान ..आपका यह लेख किसी महान संत की अमृतवाणी से कम नहीं...बहुत ही गहरी और अमूल्य सोच रखते है आप ....जीवन की सारी सच्चाई को खुसूरत तरीके से पेश किया है ....इसे पढ़कर कुछ प्रेरणा मिली ...आपक बहुत-बहुत शुक्रिया
http://athaah.blogspot.com/
GREAT THOUGHTS
सकारात्मक सोंच ,जीवन का संघर्ष हे मनुष्य को आगे ले जाता है . मई भी इस परिस्थिथि से गुजर चूका हूँ और aapki लेखनी में यथार्थ है
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