आज विश्व की सभी संस्*तियों में विघटन चल रहा है। भारतीय संस्*ति भी इससे अछूती नहीं है। परिवर्तन प्रत्येक संस्*ति की अनिवार्य आवश्यकता है। लेकिन इतना परिवर्तन भी तो हानिकारक है कि जिससे आफ नैतिक मूल्य ही समूल नष्ट होने लगे। यही हुआ है आज के वर्तमान भारत में। वर्तमान परिवेश में आधुनिकता के नाम पर हमारी संस्*ति में पाश्चात्य प्रभाव को ग्रहण किया जा रहा है। अर्थात् भारतीय समाज में आधुनिकीकरण के नाम पर पाश्चात्यीकरण हो रहा है। इस क्रम में समाज की अनेक जड परम्पराओं को उखाड फेंका और नवीन मूल्य स्थापित होने लगे। इन नये मूल्यों में अधिकांशतः पश्चिम के जीवन मूल्यों की झलक देखने को मिली। यहीं से मूल्य संघर्ष प्रारम्भ हुआ।
युवा वर्ग जिम्मेदारियों से कतराता है इसलिये ऐसे रिश्ते का निर्माण करता है। जहाँ तक भारतीय परिवेश का प्रश्न है यह व्यवस्था न तो युवा वर्ग के लिए और न भारतीयों के लिए श्रेष्ठ है। पश्चिम की इस दूषित व्यवस्था ने न केवल भारतीय समाज को दूषित किया है अपितु भटकाया भी है। जहाँ तक भारतीय विवाह संस्कार का प्रश्न है वह जग-जाहिर है। माना कि आज देश और दुनिया बदल रही है, इसके साथ-साथ मूल्य भी बदल रहे हैं, मगर इसका अर्थ यह नहीं है कि हम स्वतंत्र्ता के नाम पर हमारी सनातन परम्पराओं एवं नैतिक मूल्यों को तिलांजलि दें।
वर्तमान परिवेश में समय के साथ-साथ व्यवस्थित विवाहों के स्थान पर आज समाज में प्रेम विवाह होने लगे हैं। वैश्वीकरण व पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव के कारण एक नई शुरुआत होती नजर आ रही है। आज बडे-बडे महानगरों में युवक-युवतियों ने विवाह जैसी पुरानी मान्यता को छोडकर एक नई जीवन शैली की शुरुआत की है। वे एक-दूसरे के साथ बिना विवाह किए साथ-साथ रहने लगे हैं। इस आयातित प्रणाली को अपनाने में युवक-युवतियों ने अपने-अपने तर्क भी दिये हैं। इसके पक्षधरों का कहना है कि इस नये कानून में स्वतंत्र्ता ही स्वतंत्र्ता है। किसी प्रकार का कोई उत्तरदायित्व या जवाबदेही नहीं है। युवकों के विचारानुरूप ऐसा करने से वे दहेज उत्पीडन जैसे कानूनी दाँवपेंच जिनका आज महिलाएँ ज्यादातर दुरुपयोग कर रही हैं, उस प्रपंच से बच जाएँगे। इसी विषय पर युवतियों की मान्यता है कि इस तरह प्रणाली अपनाने से वे जब तक लडके के साथ रहना चाहती है, रहेगी। तलाक लेने की लम्बी व उबाऊ प्रक्रिया में से होकर गुजरने की उसे जरूरत नहीं पडेगी।
भाषा तभी विकसित हो सकती है जबकि इसका सूत्र् जनता के हाथ में दे दिया जाये। पाठ्यपुस्तकों में काम ली जाने वाली भाषा इतनी क्लिष्ट होती है कि अच्छे खासे हिन्दी के जानकार को भी समझ में नहीं आती है। इसी कारण तकनीकी क्षेत्र् के विद्यार्थी हिन्दी के बजाय अंग्रेजी की पुस्तकों को पढना श्रेष्ठ मानते हैं। इसी प्रकार बैंक व दफ्तरों आदि में आवेदन के साथ प्रारूप ऐसी हिन्दी में बनाये जाते हैं कि कोई समझ नहीं पाता है। ऐसी हिन्दी ने हिन्दी को नुकसान पहुँचाया है। भाषा कभी भी स्थाई नहीं होती है तथा वह लोक द्वारा निरन्तर परिवर्तित और समृद्ध होती है।
अभी जरूरत हैं देश के सभी युवा वर्ग को कि नक्सलवादी नक्सली माओवादियो संगठनों के खिलाफ एकजुट होकर ख़त्म करना , ताकि देश विकास की ओर बढे !
युवा वर्ग जिम्मेदारियों से कतराता है इसलिये ऐसे रिश्ते का निर्माण करता है। जहाँ तक भारतीय परिवेश का प्रश्न है यह व्यवस्था न तो युवा वर्ग के लिए और न भारतीयों के लिए श्रेष्ठ है। पश्चिम की इस दूषित व्यवस्था ने न केवल भारतीय समाज को दूषित किया है अपितु भटकाया भी है। जहाँ तक भारतीय विवाह संस्कार का प्रश्न है वह जग-जाहिर है। माना कि आज देश और दुनिया बदल रही है, इसके साथ-साथ मूल्य भी बदल रहे हैं, मगर इसका अर्थ यह नहीं है कि हम स्वतंत्र्ता के नाम पर हमारी सनातन परम्पराओं एवं नैतिक मूल्यों को तिलांजलि दें।
वर्तमान परिवेश में समय के साथ-साथ व्यवस्थित विवाहों के स्थान पर आज समाज में प्रेम विवाह होने लगे हैं। वैश्वीकरण व पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव के कारण एक नई शुरुआत होती नजर आ रही है। आज बडे-बडे महानगरों में युवक-युवतियों ने विवाह जैसी पुरानी मान्यता को छोडकर एक नई जीवन शैली की शुरुआत की है। वे एक-दूसरे के साथ बिना विवाह किए साथ-साथ रहने लगे हैं। इस आयातित प्रणाली को अपनाने में युवक-युवतियों ने अपने-अपने तर्क भी दिये हैं। इसके पक्षधरों का कहना है कि इस नये कानून में स्वतंत्र्ता ही स्वतंत्र्ता है। किसी प्रकार का कोई उत्तरदायित्व या जवाबदेही नहीं है। युवकों के विचारानुरूप ऐसा करने से वे दहेज उत्पीडन जैसे कानूनी दाँवपेंच जिनका आज महिलाएँ ज्यादातर दुरुपयोग कर रही हैं, उस प्रपंच से बच जाएँगे। इसी विषय पर युवतियों की मान्यता है कि इस तरह प्रणाली अपनाने से वे जब तक लडके के साथ रहना चाहती है, रहेगी। तलाक लेने की लम्बी व उबाऊ प्रक्रिया में से होकर गुजरने की उसे जरूरत नहीं पडेगी।
भाषा तभी विकसित हो सकती है जबकि इसका सूत्र् जनता के हाथ में दे दिया जाये। पाठ्यपुस्तकों में काम ली जाने वाली भाषा इतनी क्लिष्ट होती है कि अच्छे खासे हिन्दी के जानकार को भी समझ में नहीं आती है। इसी कारण तकनीकी क्षेत्र् के विद्यार्थी हिन्दी के बजाय अंग्रेजी की पुस्तकों को पढना श्रेष्ठ मानते हैं। इसी प्रकार बैंक व दफ्तरों आदि में आवेदन के साथ प्रारूप ऐसी हिन्दी में बनाये जाते हैं कि कोई समझ नहीं पाता है। ऐसी हिन्दी ने हिन्दी को नुकसान पहुँचाया है। भाषा कभी भी स्थाई नहीं होती है तथा वह लोक द्वारा निरन्तर परिवर्तित और समृद्ध होती है।
अभी जरूरत हैं देश के सभी युवा वर्ग को कि नक्सलवादी नक्सली माओवादियो संगठनों के खिलाफ एकजुट होकर ख़त्म करना , ताकि देश विकास की ओर बढे !
समाज को जात पात के आधार प़र बाटकर लम्बे समय तक शासन करनेवाले नेतागण से दूर रहे, वे देशहित और जनहित का कार्य कैसे करते हैं सभी लोगो ने देखा हैं , वैसे लोगो के कारण सभी अच्छे लोग को भी लोग गलत श्रेणी में ही देखते हैं !
......आमोद कुमार,
पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान
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