दुःख के साथ जो सुख है, वह दुःख का कारण है। सुखके भोगीको दुःख भोगना ही पड़ेगा। सुखमात्र दुःखमें परिणत हो जाता है। भोगी मनुष्य सुख-दुख दोनों को भोगता है।जब शरीर के किसी अंग में पीड़ा होती है तो सारा शरीर व्याकुल हो जाता है। मित्र वही है जो विपत्ति में काम आवे। मित्रों के साथ बन्दीगृह भी स्वर्ग है पर दूसरों के साथ उपवन नरक समान है।
सुंदरता बिना शृंगार ही के मन को मोहती है।दूसरो को उपदेश देना सबसे सरल कार्य हैं , उन अच्छे उपदेशो को अपने पर लागू कीजिये , तब शोभा देंगे आपकी बात !वे मनुष्य समाज के लिए कितनी उपयोगी हैं या नहीं? अथवा उन में गेयता कितनी है? या फिर उन की कला कैसी है? वे आकर्षक हैं या नहीं? क्या वे ऐसी हैं जिन्हें लोग ग्रहण करना पसंद करेंगे अथवा नहीं। ऐसे बहुत से आधार रहे हैं जिन पर किसी भी कृति का मूल्यांकन होता रहा है।
जिसकी अस्ल खराब है उस पर सज्जनों के सत्संग का कुछ असर नहीं होता।धनी होना धन पर नहीं वरन् हृदय पर निर्भर है, बड़प्पन अवस्था पर नहीं वरन् बुध्दि पर निर्भर है।
हर युद्ध के पहले मनुज है सोचता, क्या शस्त्र ही-
उपचार एक अमोघ है
अन्याय का, अपकर्ष का, विष का गरलमय द्रोह का!
लड़ना उसे पड़ता मगर।
औ' जीतने के बाद भी,
रणभूमि में वह देखता है सत्य को रोता हुआ;
वह सत्य, है जो रो रहा इतिहास के अध्याय में
विजयी पुरुष के नाम पर कीचड़ नयन का डालता।
उस सत्य के आघात से
हैं झनझना उठ्ती शिराएँ प्राण की असहाय-सी,
सहसा विपंचि लगे कोई अपरिचित हाथ ज्यों।
वह तिलमिला उठता, मगर,
है जानता इस चोट का उत्तर न उसके पास है।
सहसा हृदय को तोड़कर
कढती प्रतिध्वनि प्राणगत अनिवार सत्याघात की-
'नर का बहाया रक्त, हे भगवान! मैंने क्या किया
लेकिन, मनुज के प्राण, शायद, पत्थरों के हैं बने।
जिसका लेखा साफ है उसे हिसाब समझाने वाले का क्या डर ?
किसी जाति के एक आदमी से बुराई हो जाती है तो सारी की सारी जाति बदनाम हो जाती है। न छोटे की इज्जत रहती है न बड़े की।
मेरी आंखें तेरी ओर हैं तुझसे अन्य लोग बातें कर रहे हैं। भोगियों के लिये शराब चाहिये, ज्ञानी शराब पिलाने वालों को देखकर ही मस्त हो जाता है। खूब मस्त मस्त !!!!!!!तू सब कुछ कर सकता है किन्तु मुझ पर जुल्म नहीं कर सकता !
मैं यह न कहूंगा कि दया में तू औलिया से बढ़ा हुआ है, न यह कि न्याय में तू बादशाहों का नेता है।और यदि यह सब गुण तुझ में हैं तो तुझे उपदेश करना और भी उत्तम है क्योंकि सच्चे प्रेम और श्रध्दा के प्रकट करने का यही मार्ग है।
तेरे आधिपत्य के स्थिर रहने का बस एक ही मन्त्रा है, कि किसी सबल का हाथ किसी निर्बल पर न उठने पाये |अगर किसी को ग़लतफ़हमी हैं कि अगला सोया हुआ हैं तो ये उसकी मुर्खता हैं !सुंदरता बिना शृंगार ही के मन को मोहती है।दूसरो को उपदेश देना सबसे सरल कार्य हैं , उन अच्छे उपदेशो को अपने पर लागू कीजिये , तब शोभा देंगे आपकी बात !वे मनुष्य समाज के लिए कितनी उपयोगी हैं या नहीं? अथवा उन में गेयता कितनी है? या फिर उन की कला कैसी है? वे आकर्षक हैं या नहीं? क्या वे ऐसी हैं जिन्हें लोग ग्रहण करना पसंद करेंगे अथवा नहीं। ऐसे बहुत से आधार रहे हैं जिन पर किसी भी कृति का मूल्यांकन होता रहा है।
जिसकी अस्ल खराब है उस पर सज्जनों के सत्संग का कुछ असर नहीं होता।धनी होना धन पर नहीं वरन् हृदय पर निर्भर है, बड़प्पन अवस्था पर नहीं वरन् बुध्दि पर निर्भर है।
भेड़िये का बच्चा भेड़िया ही होता है। भेड़िया या भेड़िये के बच्चे से कोई अच्छी भी चीज का आशा रखना भी मुर्खता हैं !
ईष्यालु मनुष्य स्वयं ही ईष्या-अग्नि में जला करता है। उसे और सताना व्यर्थ है।यदि हम बिना किसी उदाहरण, तथ्य और साक्ष्य के अपनी बात कहते हैं तो प्रशंसा करने की स्थिति में यह चाटुकारिता और कमियों का उल्लेख करने पर यह निंदा का रूप ले लेगी।
अगर किसी की कड़वी बात नहीं सुनना चाहे तो उसका मुंह मीठा कर। कड़वी से कड़वी बात झेल सकता है वो,मन निष्पाप हो जिसका,कठोर से कठोर सत्य का सामना कर सकता वो,इरादे मज़बूत हों जिसके,जीवन की नैया को सुगमता से खे सकता है वो,दिल में लगन और विश्वास हो जिसके,संसार के पालनहार को पा सकता है वो,जिसके हृदय में सच्चाई,दया और प्रेम हो !
......आमोद कुमार,
पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान
श्री रामधारी सिंह 'दिनकर' जी की एक रचना हैं :
हर युद्ध के पहले द्विधा लड़ती उबलते क्रोध से,
हर युद्ध के पहले मनुज है सोचता, क्या शस्त्र ही-
उपचार एक अमोघ है
अन्याय का, अपकर्ष का, विष का गरलमय द्रोह का!
लड़ना उसे पड़ता मगर।
औ' जीतने के बाद भी,
रणभूमि में वह देखता है सत्य को रोता हुआ;
वह सत्य, है जो रो रहा इतिहास के अध्याय में
विजयी पुरुष के नाम पर कीचड़ नयन का डालता।
उस सत्य के आघात से
हैं झनझना उठ्ती शिराएँ प्राण की असहाय-सी,
सहसा विपंचि लगे कोई अपरिचित हाथ ज्यों।
वह तिलमिला उठता, मगर,
है जानता इस चोट का उत्तर न उसके पास है।
सहसा हृदय को तोड़कर
कढती प्रतिध्वनि प्राणगत अनिवार सत्याघात की-
'नर का बहाया रक्त, हे भगवान! मैंने क्या किया
लेकिन, मनुज के प्राण, शायद, पत्थरों के हैं बने।
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