Monday, May 10, 2010

किसी भी मनुष्य के मन में कोई-न-कोई इच्छा या कामना तो अवश्य ही उत्पन्न होती रहती है !!!!

किसी इच्छा के पूर्ण होने के लिए सबसे जरूरी चीज है मन में उस इच्छा का होना। इच्छा के अभाव में कल्पवृक्ष भी फल नहीं दे सकता। कामना नहीं तो कैसी कामनापूर्ति?
हर फल या परिणाम किसी कर्म के फलस्वरूप ही उत्पन्न होता है। कर्म नहीं करेंगे तो फल नहीं मिलेगा। कर्म की प्रेरणा विचार से ही उत्पन्न होती है और विचार का उद्गम है मन। कल्पवृक्ष भी तभी इच्छा पूरी करेगा जब मन में कोई इच्छा उत्पन्न होगी। दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि जैसी इच्छा होगी वैसी ही परिणाम आएगा। भोजन और पानी की इच्छा हो तो भोजन-पानी और मृत्यु का भय हो तो मृत्यु का सामना। हमारी इच्छापूर्ति हमारी सोच का ही परिणाम है। हमारी सफलता-असफलता, सुख-दुख, लाभ हानि, आरोग्य-रुग्णता सब हमारी सोच द्वारा निश्चित होते हैं। सकारात्मक सोच का अच्छा परिणाम तथा नकारात्मक सोच का बुरा परिणाम।

सफलता, सुख, समृद्धि और आरोग्य हमारी सकारात्मक सोच या भावधारा का परिणाम है। असफलता, दुख, हानि और रुग्णता हमारी नकारात्मक सोच का परिणाम है। सफलता, सुख-समृद्घि, आय, स्वास्थ्य तथा आयु के प्रति अविश्वास, संशय तथा भय ही इनकी प्राप्ति में प्रमुख बाधा है। मनुष्य वास्तव में वही है जो उसकी सोच है। तभी वेदों में कामना की गई है कि मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो-तन्मे मन: शिव संकल्पमस्तु!
मन तो संकल्प-विकल्प दोनों करता है। उसमें परस्पर विरोधी भाव उत्पन्न होते रहते हैं। अच्छे विचार आते हैं तो बुरे विचार भी आते हैं। बुरे विचार आते हैं तो उसके विरोधी विचार अर्थात अच्छे विचार भी अवश्य उत्पन्न होते हैं। मन में उठने वाले विचारों पर नियंत्रण कर हम जीवन को मनचाहा आकार दे सकते हैं। जैसा भाव या विचार, वैसा ही जीवन।
यह पूरा ब्रह्माण्ड ही एक कल्पवृक्ष है जो हमारे भावों के अनुरूप हमारी सृष्टि का निर्माण करता है। हमारी आंतरिक और बाह्य सृष्टि हमारे ही भावों से आकार पाती है और उसी से नियंत्रित होती है। सकारात्मक भावों द्वारा इसे सही आकार प्रदान किया जा सकता है तथा नियंत्रण द्वारा गलत आकार पाने से रोका जा सकता है।
उच्च प्राणी कहलानेवाला मनुष्य भी भावों की एक जोड़ी लेकर धरती पर गिरता है। उसके छोटे से हृदय में पहले दु:ख और आनंद भर ही के लिए जगह रहती है। ये मनोवेग ऐसे हैं जो मनुष्य यदि जन्म से स्ववर्गियों से अलग रखा जाय तो भी उत्पन्न होंगे। पेट के भरे रहने या खाली रहने के अनुभव ही से इनका आरंभ होता है। इन उद्वेगों के लिए दूसरे व्यक्तियों के साथ की अपेक्षा नहीं। जीवनारंभ में इन्ही दोनों के चिद्द हँसना और रोना देखे जाते हैं। यह न समझना चाहिए कि और प्रकार के भाव भी शिशु के हृदय में उमड़ते हैं पर वह उनका बोध नहीं करा सकता। प्रकृति इतना अन्याय कभी नहीं कर सकती। बच्चे के हृदय में उसी रूप में भाव उत्पन्न होते हैं जिस रूप में वह व्यंजित करता है। यह बात इस विचार से प्रत्यक्ष हो जाएगी कि इन्हीं दोनों मनोवेगों से क्रमश: और दूसरे मनोवेगों की उत्पत्ति और विकास होता है। सब मनोवेग दु:ख और आनंद ही के सामाजिक विकार हैं। दु:ख ही के गर्भ में क्रोध, भय, करुणा, घृणा और ईर्ष्‍या आदि के भाव रहते हैं जो आगे चलकर समाज के साथ संबंध बढ़ने और शरीर के साथ साथ मनसिक शक्तियों के पुष्ट और प्रशस्त होने पर पृथक् पृथक् रूप में प्रकट होने लगते हैं। जैसे यदि शरीर में कहीं सुई चुभने की पीड़ा हो तो केवल दु:ख होगा। पर यदि यह ज्ञान हो जाय कि सुई चुभानेवाला कोई दूसरा व्यक्ति है तो दु:ख अनष्टि वा प्रतिकार की प्रबल इच्छा से मिश्रित हो जाएगा और क्रोध कहलावेगा। जिस शिशु को पहले अपने ही दु:ख का ज्ञान होता था बढ़ने पर उसे अनुमन द्वारा औरों का क्लेश देखकर भी दु:ख होने लगता है जिसे हम करुणा वा दया कहते हैं। इसी प्रकार अज्ञान वा जिस पर अपना वश न हो ऐसे कारण से पहुँचनेवाले भावी अनिष्ट के निश्चय से जो दु:ख होता है वह भय कहलाता है। शिशु को जिसे यह निश्चयात्मक बुद्धि नहीं होती भय बिलकुल नहीं होता। यहाँ तक कि उसे मारने के लिए हाथ उठाएँ तो वह विचलित न होगा क्योंकि वह यह नहीं निश्चय कर सकता कि इस हाथ उठाने का परिणाम दु:ख होगा।

इसी प्रकार जैसे जैसे संबंध, काल, मात्रा और स्थान आदि का ज्ञान और विवेक शिशु में होता जाता है वैसे ही वैसे उसी आनंद से संतोष, प्रसन्नता, उत्साह, प्रेम, लोभ, आदि फूट फूट कर निकलने लगते हैं। जिस प्रकार दु:ख पहुँचानेवाले का ज्ञान होने पर हमें क्रोध होता है उसी प्रकार जिससे आनंद मिला है उसका ज्ञान होने पर हम उस पर प्रसन्न होते हैं और उसे भी प्रसन्न करना चाहते हैं। जो बात हम जैसी चाहते हैं यदि किसी से वैसी ही बन पड़ी तो हमें संतोष होता है। यदि उससे बढ़कर हुई तो हमें प्रसन्नता होती है। इसी प्रकार आनेवाले सुख को सोचकर हमें उत्साह होता है और उसके निमित्त हम किसी कार्य में प्रवृत्त होते हैं। प्रकृति को मनुष्य से काम कराना मंजूर रहता है इसी से सुख के अनुभव की अपेक्षा भावी सुख की आशा बहुत बलवती होती है। संतोष और प्रसन्नता की अपेक्षा उत्साह में कहीं अधिक क्रियोत्पादिनी शक्ति होती है। कोई किसी पर संतुष्ट वा प्रसन्न होगा तो बहुत करेगा उसे कुछ दे दिला देगा पर यदि वह भावी आनंद के अनुमन से उत्साहित होगा तो कोसों पैदल चलेगा, नदी नाले पार करेगा और रात रात भर जागेगा। लोग कहते हैं कि जब हमारा काम हो जाएगा तब तुम्हें इतना देंगे पर जब वह काम हो जाता है तब देने का जी नहीं करता। इसी से कहा गया है कि Man never is but will be happy अर्थात मनुष्य सुखी नहीं है पर सुखी होगा। किसी पर प्रसन्न होकर फिर उसे प्रसन्न करने के लिए जिस भाव की प्रेरणा से हम अनेक प्रकार के आयोजन करते हैं और श्रम उठाते हैं वह भी उत्साह ही कहलाता है क्योंकि उसे प्रसन्न देखकर हमें जो संतोष होगा उसी की चाह से हम दौड़धूप करते हैं। देशोपकारियों के आगमन पर जो उत्साह दिखाया जाता है वह इसी प्रकार का है।
जिससे हमें बराबर किसी प्रकार का सुख मिलता है वा एकबारगी अत्यंत सुख मिलता है उसका ज्ञान होने पर उससे हमें प्रेम हो जाता है अर्थात उसके सामीप्य की एक स्थायी इच्छा जिसे हम एक प्रकार का लोभ कह सकते हैं चित्त में स्थान कर लेती है जो अभाव में बड़ा उग्र रूप धारण करती है। शिशु अपनी माता का दूध पी पी कर सुखी होता है और उससे प्रेम करता है। युवक किसी युवती के रूप गुण आदि को देख कर एकबारगी आनंदित हो उठता है और उसका अत्यंत सान्निधय चाहता है। इसी से कवि लोग ऐसे प्रेम को 'रूप का लोभ' भी कहते हैं। इधर उधर सुनाई भी पड़ता है कि 'वे उसके रूप पर लुभा गए'।
संसार में दु:ख की निवृत्ति की अधिक और चटपट आवश्यकता होती है इसी से उसका इतना स्पष्ट विश्लेषण हुआ है। आनंद के इतने स्पष्ट विभाग नहीं हुए हैं। संतोष, प्रसन्नता, उत्साह आदि के अनुभव प्राय: एक ही से जान पड़ते हैं। उनमें इतना भेद नहीं जान पड़ता जितना क्रोध, भय, करुणा, घृणा, ईर्ष्‍या आदि में परस्पर मालूम होता है। इससे यह अनुमन होता है कि संसार में जितने रूपों में दु:ख की निवृत्ति की आवश्यकता पड़ती है उतने रूपों में प्राप्त सुख के उपभोग की नहीं। प्रकृति या नियामक आत्मा संसार मे जीवों के लिए कठिनाइयाँ अधिक समझती है इसी से उसने उनको दूर करने के लिए अधिक उग्र उपाय रखे हैं। सारांश यह कि सजीवता दु:ख निवृत्ति के लिए छटपटाने ही का नाम है, पड़े पड़े आनंद के चसक लेने का नहीं।
मनुष्य जिस समय होश सँभाल कर समाज में प्रवेश करता है वह अपने आनंद और दु:ख के बहुत से अंशों को क्रिया और दशा पर अवलंबित कर अपने जीवन को अधिक विस्तृत और व्यापक बनाता है। इस व्यापकत्व के लिए लालायित होना आत्मा का गुण है। समाज के संसर्ग से ही दु:ख और आनंद के अनेक मनोविकारों की सृष्टि होती है। क्रोध, करुणा, ईर्ष्‍या, राग आदि के आधार के लिए दूसरे प्राणियों और वस्तुओं की अपेक्षा होती है।
दु:ख से निकले हुए मनोविकारों की ओर ध्यान देते हुए पहले हम उनको लेते हैं जो दु:ख से अपनी रक्षा के हेतु रखे गए हैं, जैसे-क्रोध और भय।
सामाजिक जीवन के लिए क्रोध की बड़ी आवश्यकता है। यदि क्रोध न हो तो जीव बहुत से दु:खों की चिर निवृत्ति के लिए यत्न ही न करे। कोई मनुष्य किसी दुष्ट के नित्य दो चार प्रहार सहता है। यदि उसमें क्रोध का विकास नहीं हुआ है तो वह केवल आह ऊह करेगा जिसका उस दुष्ट पर कोई प्रभाव नहीं। उस दुष्ट के हृदय में दया आदि उत्पन्न करने में बड़ी देर लगेगी। प्रकृति किसी को इतना समय ऐसे छोटे छोटे कामों के लिए नहीं दे सकती। भय के द्वारा भी प्राणी अपनी रक्षा करता है पर समाज में इस प्रकार की दु:ख निवृत्ति चिर स्थायिनी नहीं होती। मेरे कहने का यह अभिप्राय नहीं कि क्रोध के समय क्रोधकर्ता के हृदय में भावी दु:ख से बचने या औरों को बचाने की इच्छा ही रहती है बल्कि प्रकृति ने क्रोध को इसी अभिप्राय से रखा है।
क्रोध दु:ख के कारण के परिज्ञान या साक्षात्कार से होता है। अत: एक तो जहाँ इस ज्ञान में त्रुटि हुई वहाँ क्रोध धोखा देता है। दूसरी बात यह है कि क्रोध जिस ओर से दु:ख आता है उसी ओर देखता है अपने धारणाकर्ता की ओर नहीं। जिससे दु:ख पहुँचा है या पहुँचेगा उसका नाश हो वा उसे दु:ख पहुँचे यही क्रोध का लक्ष्य है, जिसे दुख पहुँचा है उसका फिर क्या होगा इससे उसे कुछ सरोकार नहीं। इसी से एक तो मनोवेग ही एक दूसरे को परिमित किया करते हैं दूसरे विचारशक्ति भी उनपर अंकुश रखती है। यदि क्रोध इतना उग्र हुआ कि हृदय के दु:ख के कारण की अवरोधवरोधिनी शक्ति के रूप और परिमाण के विचार तथा भय आदि और विचारों के संचार के लिए जगह ही न रही तो बहुत हानि पहुँच जाती है। जैसे कोई सुने कि उसका शत्रु बीस आदमी लेकर उसे मारने आ रहा है। और वह चट क्रोध से व्याकुल होकर बिना शत्रु की शक्ति का विचार या भय किए उसे मारने के लिए अकेला दौड़े तो उसके मारे जाने में बहुत कम संदेह है। अत: कारण के यथार्थ निश्चय के उपरांत आवश्यक मात्रा में ही क्रोध वह काम दे सकता है जिसके लिए उसका विकास होता है।

कभी कभी लोग अपने कुटुम्बियों या स्नेहियों से झगड़कर उन्हें थोड़ा सा दु:ख पहुँचाने के अभिप्राय से अपना सिर तक पटक देते हैं। यह सिर पटकना अपने को दु:ख पहुँचाने के अभिप्राय से नहीं होता क्योंकि बिलकुल बेगानों के साथ कोई ऐसा नहीं करता। जब किसी को क्रोध में सिर पटकते देखें तो समझ लेना चाहिए कि उसका क्रोध ऐसे व्यक्ति के ऊपर है जिसे उसके सिर पटकने की परवाह है अर्थात् जिसे उसके सिर फूटने से यदि उस समय नहीं तो आगे चलकर दु:ख पहुँचेगा।
क्रोध का वेग इतना प्रबल होता है कि कभी कभी मनुष्य यह विचार नहीं करता कि जिसने दु:ख पहुँचाया है उसमें दु:ख पहुँचाने की इच्छा थी या नहीं। इसी से कभी तो वह अचानक पैर कुचल जाने पर किसी को मार बैठता है और कभी ठोकर खाकर कंकड़ पत्थर तोड़ने लगता है। चाणक्य ब्राह्मण अपना विवाह करने जाता था। मार्ग में कुश उसके पैर में गड़े। वह चट मट्ठा और कुदाली लेकर पहुँचा और कुशों को उखाड़ उखाड़ कर उनकी जड़ों में मट्ठा देने लगा। मैंने देखा कि एक ब्राह्मण देवता चूल्हा फूँकते फूँकते हैरान हो गए, जब आग नहीं जली, तब उस पर कोप करके चूल्हे में पानी डाल किनारे हो गए। इस प्रकार का क्रोध असंस्कृत है। यात्रियों ने बहुत सी ऐसी जंगली जातियों का हाल लिखा है जो रास्ते में पत्थर की ठोकर लगने पर बिना उसको चूर चूर किए आगे नहीं बढ़ते। इस प्रकार का क्रोध अपने दूसरे भाइयों के स्थान को दबाए हुए है। अधिक अभ्यास के कारणयदि कोई मनोवेग अधिक प्रबल पड़ गया तो वह ऊपर कहे हुए विश्लेषण को व्यर्थ कर मनुष्य को फिर बचपन से मिलती जुलती अवस्था में ले जाकर पटक देताहै।
क्रोध सब मनोविकारों से फुरतीला है इसीलिए अवसर पड़ने पर यह और दूसरे भी मनोविकारों का साथ देकर उनकी सहायता करता है। कभी वह दया के साथ कूदता है कभी घृणा के। एक क्रूर कुमार्गी किसी अनाथ अबला पर अत्याचार कर रहा है। हमारे हृदय में इस अनाथ अबला के प्रति दया उमड़ रही है। पर दया की पहुँच तो आर्त ही तक है। यदि वह स्‍त्री भूखी होती तो हम उसे कुछ रुपया पैसा देकर अपने दया के वेग को शांत कर लेते। पर यहाँ तो उस दु:ख का हेतु मूर्तिमन तथा अपने विरुद्धा प्रयत्नों को ज्ञानपूर्वक व्यर्थ करने की शक्ति रखनेवाला है। ऐसी अवस्था में क्रोध ही उस अत्याचारी के दमन के लिए उत्‍तेजित करता है जिसके बिना हमारी दया ही व्यर्थ जाती है। क्रोध अपनी इस सहायता के बदले में दया के यश को नहीं बाँटता। यद्यपि काम क्रोध करता है पर नाम दया का ही होता है। लोग यही कहते हैं उसने दया करके बचा लिया। क्रोध दया का साथ न दे तो दया अपने अनुकूल प्रमाण उपस्थित ही नहीं कर सकती। एक अघोरी हमारे सामने मक्खियाँ मार मारकर खा रहा है और हमें घिन लग रही है। हम उससे नम्रतापूर्वक हटने के लिए कह रहे हैं और वह नहीं सुन रहा है। चट हमें क्रोध आ जाता है और हम उसे बलात् हटाने में प्रवृत्त हो जाते हैं।
बैर क्रोध का अचार या मुरब्बा है। जिससे हमें दु:ख पहुँचा उसपर हमने जो क्रोध किया वह यदि हमारे हृदय में बहुत दिनों तक टिका रहा तो वह बैर कहलाता है। इस स्थायी रूप में टिक जाने के कारण क्रोध की क्षिप्रता और हड़बड़ी तो कम हो जाती है पर वह और धैर्य, विचार और युक्ति, के साथ दु:खदाता को पीड़ित करने की प्रेरणा बराबर बहुत काल तक किया करता है। क्रोध अपना बचाव करते हुए शत्रु को पीड़ित करने की युक्ति आदि सोचने का समय नहीं देता पर बैर इसके लिए बहुत समय देता है। वास्तव में क्रोध और बैर में केवल काल भेद है। दु:ख पहुँचने के साथ ही दु:खदाता को पीड़ित करने की प्रेरणा क्रोध और कुछ काल बीत जाने पर बैर है। किसी ने हमें गाली दी। यदि हमने उसी समय उसे मार दिया तो हमने क्रोध किया। अब मन लीजिए कि वह गाली देकर भाग गया और दो महीने बाद हमें कहीं मिला। अब यदि फिर बिना गाली दिए हमने उसे मिलने के साथ ही मार दिया तो यह हमारा बैर निकालना हुआ। इस विवरण से स्पष्ट है कि बैर उन्हीं प्राणियों में होता है जिनमें धारणा या भावों के संचय की शक्ति होती है। पशु और बच्चे किसी से बैर नहीं मनते। वे क्रोध करते हैं और थोड़ी देर के बाद भूल जाते हैं। क्रोध का यह स्थायी रूप भी आपदाओं की पहिचान करा कर उनसे बहुत काल तक बचाए रखने के लिए दिया गया है।
जिस प्रकार भौतिक जगत की वस्तुओं की प्राप्ति में मन के संकल्प का महत्व है, उसी तरह आत्मा में स्थित होने के लिए भी मन के संकल्प की जरूरत है। मन को इच्छा रहित करने का संकल्प अनिवार्य है। वैसे तो इच्छा रहित या संकल्प-विकल्परहित होना भी एक इच्छा है। मनुष्य इच्छा रहित स्थिति को प्राप्त करने में असमर्थ ही प्रतीत होता है, क्योंकि मन का स्वभाव तो नहीं बदला जा सकता। मन संकल्प-विकल्पात्मक है। उसमें कोई-न-कोई इच्छा या कामना तो अवश्य ही उत्पन्न होगी, चाहे उसकी तीव्रता अत्यन्त अल्प ही क्यों न हो। अशांत चित को शांत करने के लिए साधना की दृढता और अभ्यास की निरन्तरता पर जोर दिया जाता है। मन का वृत्ति-शून्य होना अथवा संकल्प-विकल्परहित होना आत्मतत्व की जागृति है।
अशुभ संकल्पों का परित्याग कर मन शुभ संकल्पों से युक्त हो जाए, तो भी वास्तविक मन की खोज की जा सकती है।
आमोद कुमार

पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

1 comment:

Unknown said...

मन का स्वभाव तो नहीं बदला जा सकता। मन संकल्प-विकल्पात्मक है।