Monday, May 10, 2010

प्रतिभाशाली व्यक्ति किसी भी कार्य को सफलता पूर्वक करते है, अपनी प्रतिभा से !!!!!!!

प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति सत्यवृत्ति युक्त व आत्म सम्मानी होता है, अपने इन दो गुणों के कारण उसकी किसी से भी नहीं बनती है। और शायद इसिलिये ही वह अव्यवहारिक लोगों में गिना जाता है। इस प्रकार वह जीवन भर व्यथित रहता है और शायद उसकी इस व्यथा के कारण ही उसके दिमाग में सदा उधेड़ -बुन लगी रहती है।
कुछ लोग कहते भी हैं क़ि प्रतिभा सम्पन्न को अन्तर्मन में क्या मिलता है, यह तो वहीं जाने, किन्तु भौतिक संसार में उसे दुत्कार, तिरस्कार के सिवाय कुछ भी नहीं मिलता देखा गया है।
यहाँ प़र मेरा उन लोगो से मेरा मतभेद हो जाता हैं , क्योंकि हमें यह हैं मालूम हैं क़ि प्रतिभाशाली व्यक्ति एक ना एक दिन जरूर अपने प्रतिभा से दुनिया को प्रभावित करते हैं और देर सबेर उनकी जीत होती हैं , इसलिये किसी ने ठीक ही कहा हैं क़ि ....बुझी हुई शमा फ़िर से जल सकती है , तुफानो में घिरी कश्ती फ़िर से किनारे लग सकती है ! मायूस ना हो , इरादे ना बदल, ज़िन्दगी में दोस्त, ये किस्मत है, कभी भी बदल सकती है!!!!!!!प्रतिभावान व्यक्ति अपने प्रतिभा से हमेशा नया ईतिहास लिखते हैं , अपने धैर्य और साहस का परिचय देते हुए |
यह भी शाश्वत है कि संसार में दार्शनिक, आविष्कारक, वैज्ञानिक, इंजीनियर भले ही संसार का भला करते हो पर वें होते ही हैं गाली खाने, प्रताड़ऩा और उपेक्षा सहने के लिये। यह अलग बात हैं क़ि लोग यह भूल जाते हैं क़ि प्रतिभावान व्यक्ति,   गाली खाने, प्रताड़ऩा और उपेक्षा सहने में अपार सुखद अनुभूति पाते हैं !प्रतिभावान व्यक्ति उस सूरज के समान है, जिसे हर हालत में अपनी रोशनी बिखेरनी ही है !
मुस्कुराना ही ज़िन्दगी है,मुस्कुराते हुए हर गम को भुलाना ही ज़िन्दगी है, मेरे दोस्त ,दूसरों को खुशियाँ बाँटना ही ज़िन्दगी है,हारकर भी मुस्कुराना ही ज़िन्दगी है ! मेरे दोस्त !
आज दुनिया में जो स्वर्ग सरीखी सुख सुविधाएँ मौजूद हैं, वे हजारों बरस की इतिहास यात्रा में मेहनतकश हाथों से निर्मित की गयीं हैं.लेकिन उन्ही मेहनतकशों को उस स्वर्ग से बेदखल कर दिया गया है. यह मनुष्य का उस की सृजनात्मकता से यानी उस की मनुष्यता से अलगाव है.यही मनुष्य की सबसे बड़ी यातना और अपमान है. सामंतो और पूंजीशाहों ने मनुष्य के बनाये स्वर्ग को छीन कर उसे नरक में धकेल दिया है.
ऊपरी तबकों के नेताओं को छोटी-मोटी रियायतों व समझौतों के जरिये लुभाकर अपनी तरफ करने और इस तरह संघर्षशील जन समुदाय के बीच कुछ समय के लिये निराशा पैदा करने की कोशिश करती है तथा इसमें कामयाब हो जाती है, तो भी इसकी परवाह न करो। हमारा जंग जारी रहेगा। अलग-अलग समय पर यह अलग-अलग रूप ले सकता है। यह कभी खुला तो कभी गुप्त, कभी पूर्णतया उत्साहजनक या कभी जीवन-मौत का घमासान संघर्ष हो सकता है। रास्ता खूनी होगा या कुछ हद तक शांतिपूर्ण, इसका चयन आपके हाथ में है। जैसा भी जरूरी समझते हो, वैसा करो। परन्तु वह जंग निरंतर चलेगा, नयी ताकत, ज्यादा बहादुरी और अडिग संकल्प के साथ, जब तक समाजवादी गणराज्य की स्थापना न होती। जब तक वर्तमान सामाजिक व्यवस्था की जगह पर एक नयी सामाजिक व्यवस्था पूरी तरह स्थापित नहीं हो जाती, जो सामाजिक खुशहाली पर आधारित हो और इस तरह हर प्रकार का शोषण खत्म हो जाये तथा मानव जाति सच्ची व स्थायी शान्ति के युग में प्रवेश कर ले। पूंजीवादी और साम्राज्यवादी शोषण के दिन अब पूरे होने वाले हैं। यह जंग न तो हमारे साथ शुरु हुआ था और न ही यह हमारे जीवनों के साथ खत्म होगा।यह जाहिर है कि जो व्यवस्था प्रगतिरोधक बन गयी है, उसके दिन पूरे हो चुके हैं। उसे खत्म करना होगा। और इसके लिये आज भी नौजवानों को फिर से आगे आना होगा।
राष्टवाद एक भावनात्मक जुड़ाव है जो संस्क्रति के प्रति महसूस होने वाले गौरव के रक्षIर्थ स्वत उत्पन्न होता है, ये बाध्यता नहीं है परन्तु आस्तित्व का संघर्ष है ,अतः राष्ट वादिता के विराट स्वरूप को किसी गीत संगीत या दलगत राजनीति के मानको में ढालना उचित नहीं है, राष्टवाद आस्तित्व की पहिचान है,जो जाति समाज वर्ग, धर्म और संघ से ऊपर उठी हुई त्याग की एक भावना है जो पूर्णता पुष्ट होने पर बलिदान में परिवर्तित हो जाती है,राष्टवाद की उस श्रेष्ठता में पहुचने पर व्यक्तिगत आबश्यकताये व्यक्तिगत पहिचान , और व्यक्ति विषेयक सारे नियम राष्ट के हित में तिरोहित हो जाते है यही प्रखर राष्टवाद की अति है, जो धर्म जाति और वर्ग संघर्ष से ऊपर है ,राष्ट वादिता में जो एक चीज मुख्य रूप से दिखाई देती है वो है आत्म त्याग की निस्वार्थ भावना ,, क्यूँ की इसके न रहते हुए राष्टवाद की बात नहीं की जा सकती ,, जहा राष्ट जन के सम्मान पहिचान और गौरव के लिए उत्तरदायी होता है,, और जहाँ जन राष्ट के इतिहास प्रगति और उत्थान से गौरव पाते है,,वही राष्ट की सांस्क्रतिक विरासत को बनाये रखना और राष्ट को निरंतर प्रगति के पथ पर बढ़ाये रखना प्रत्येक जन का परम कर्तव्य होता है || 
"जिस व्यक्ति के अन्दर अपनी संस्क्रति सभ्यता और इतिहास को सजोने की क्षमताऔर प्रगति के नित नए आयाम स्थापित करने की तत्परता नहीं है वो न तो राष्टवादी है और न ही प्रगति वादी है वो निरे पशु के सिवा कुछ भी नहीं है "
लड़ना अच्छी बात नहीं हैं , लेकिन कायरता भी कोई गौरव करने वाली बात नहीं हैं , अत्याचारी के साथ लगातार होने वाली मुठभेड़ों से भरे हैं हमारे अनुभव ! हिंदुस्तान में न जाने कितने लोग ऐसे हैं, जो प्रतिभा सम्पन्न होने के बाद भी जहाँ हैं, वहाँ से एक इंच भी आगे नहीं बढ़ पाए हैं. पर कुछ ऐसे भी हैं, जिनमें प्रतिभा न होते हुए भी अपनी वाक् पटुता, अपराधिक चरित्र के कारण बहुत आगे हैं !
जीवन है यातना के बावजूद उम्मीद. अँधेरे हैं , अत्याचार है, कुरूपताएं हैं , लेकिन यही अंतिम सच्चाई नहीं है.इन से बड़ी सच्चाईयां हैं- उजाला, प्यार और सुन्दरता . सपने और उम्मीदें. इन सच्चाईयों का भरोसा ही संघर्ष के संकल्प को जन्म देता है और ज़िंदा रखता है |
प्रतिभा और  प्रबंधन अपने आप में कोई संसाधन नहीं अपितु संसाधनों के कुशलतम प्रयोग को प्रोत्साहित करने वाली प्रेरणा है। प्रतिभाशाली व्यक्ति हमें सिखाता है, कैसे न्यूनतम संसाधनों के उपयोग के द्वारा अधिकतम संतुष्टि प्राप्त की जा सकती है।प्रतिभाशाली व्यक्ति के प्रबंधन का प्रयोग न केवल भौतिक विकास के लिए किया जाय बल्कि जीवन के संपूर्ण विकास के हेतु प्रबंधन का प्रयोग करने के लिए इसको व्यवहारिक व समयानुकूल बनाया जाय तथा प्राथमिक व अनिवार्य शिक्षा के द्वारा इसको जन-जन तक पहुँचाया जाय ताकि मानव संपूर्णता में विकास कर सके। आज हम व्यवहारिक धरातल पर देखें तो हमारे पास संसाधनों की इतनी कमी नहीं है कि हम अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति भी न कर सकें।
आमोद कुमार
पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान