परमात्मा ने हमें ऐसी शक्तियां दी हैं, सामर्थ्य दिए हैं, ऐसी प्रतिभा प्रदान की है, जिसे हम दूसरों के कल्याण के लिए भी प्रयोग कर सकते हैं। हमारे अकेले प्रयत्नों से हमारे अपने जीवन में भी पूर्ण प्रगति और विकास संभव नहीं है। केवल हम अपने भले की चिंता कर लें, दूसरों से हमें कोई मतलब नहीं हो, इससे स्वार्थ की गंध आती है। यदि कोई व्यक्ति सिर्फ अपने ही प्रयत्नों से अपना भला कर पाता तो संसार का प्रत्येक मानव अच्छी हालत में होता, क्योंकि कोई भी मनुष्य बुरी हालत में नहीं रहना चाहता। हम सब अमीर होने के साथ विद्वान और वर्चस्वशाली होने की आकांक्षा करते हैं, परंतु अधिकांश लोगों की आकांक्षा पूरी नहीं होती।
बिना दूसरों का सहयोग पाए कोई भी व्यक्ति औसत स्तर से ऊंचा नहीं उठ सकता। न केवल व्यक्ति, वरन यह मानव समाज भी आगे नहीं बढ़ सकता। यदि सिर्फ अपने ही लिए सोचा जाए, तो कोई खोजकर्ता ज्ञान की खोज में अपना सारा जीवन क्यों लगाए? संसार का सारा ज्ञान-विज्ञान इसी कारण विकसित हो सका है कि उनका विकास करने वालों ने अपने स्वार्थ की उपेक्षा की और समूची मानवता के कल्याण का दृष्टिकोण अपनाया। जब दूसरों के हित- अहित की परवाह की जाती है, तब अपना लाभ- अलाभ गौण हो जाता है। तभी समाज में उन्नति और प्रगति की संभावनाएं बनती हैं। परोपकार ही हमारी उन्नति का मूल कारण है और जब भी इस देव वृत्ति को छोड़ कर स्वार्थपूर्ति को अपनाया जाता है, तो समाज में पतन के चिह्न दिखाई पड़ते हैं।
बिना दूसरों का सहयोग पाए कोई भी व्यक्ति औसत स्तर से ऊंचा नहीं उठ सकता। न केवल व्यक्ति, वरन यह मानव समाज भी आगे नहीं बढ़ सकता। यदि सिर्फ अपने ही लिए सोचा जाए, तो कोई खोजकर्ता ज्ञान की खोज में अपना सारा जीवन क्यों लगाए? संसार का सारा ज्ञान-विज्ञान इसी कारण विकसित हो सका है कि उनका विकास करने वालों ने अपने स्वार्थ की उपेक्षा की और समूची मानवता के कल्याण का दृष्टिकोण अपनाया। जब दूसरों के हित- अहित की परवाह की जाती है, तब अपना लाभ- अलाभ गौण हो जाता है। तभी समाज में उन्नति और प्रगति की संभावनाएं बनती हैं। परोपकार ही हमारी उन्नति का मूल कारण है और जब भी इस देव वृत्ति को छोड़ कर स्वार्थपूर्ति को अपनाया जाता है, तो समाज में पतन के चिह्न दिखाई पड़ते हैं।
प्रकृति के कण-कण में इस देव वृत्ति का परिचय मिलता है। नदियां अपने तटवर्ती इलाकों को सींचती और प्राणियों की प्यास बुझाती हैं, पर अपना पानी स्वयं नहीं पीतीं। वृक्ष अपने फलों का स्वाद कभी नहीं चखते, वे उन्हें दूसरों की क्षुधा पूरी करने के लिए समर्पित कर देते हैं। गाय अपना दूध स्वयं नहीं पीती। जब कोई वैज्ञानिक अपनी प्रतिभा द्वारा नए-नए आविष्कार करता है, तो वह स्वयं इतना लाभ नहीं उठाता, जितना कि दूसरे लाभान्वित होते हैं। परोपकार करने वाला जितना सुखी और संतुष्ट रहता है, उतना संतुष्ट वह व्यक्ति नहीं रहता जो सिर्फ अपने लाभ या प्रयोजन की दृष्टि से जीवन जीता है। वैसे तो संसार में एक से बढ़ कर एक सम्पन्न व्यक्ति मिल जाएंगे, पर वे सुख और संतोष से कोसों दूर होंगे। संसार में सब प्रकार के सुख मिल जाएं और संतोष प्राप्त न हो तो सभी सुख व्यर्थ हैं।
परोपकार से हमारी आत्मा को संतोष मिलता है। परोपकार की प्रवृत्ति अपना कर हम विश्वव्यापी आत्मा की सेवा करते हैं और उससे आत्म संतोष के रूप में जो तृप्ति मिलती है-वही हमारी संपत्तियों को सार्थक करती है। परोपकार की आध्यात्मिक उपयोगिता यह है कि हम दूसरों की आत्मा को सुख पहुंचा कर अपनी आत्मा को सुखी बनाते हैं।
परोपकार से हमारी आत्मा को संतोष मिलता है। परोपकार की प्रवृत्ति अपना कर हम विश्वव्यापी आत्मा की सेवा करते हैं और उससे आत्म संतोष के रूप में जो तृप्ति मिलती है-वही हमारी संपत्तियों को सार्थक करती है। परोपकार की आध्यात्मिक उपयोगिता यह है कि हम दूसरों की आत्मा को सुख पहुंचा कर अपनी आत्मा को सुखी बनाते हैं।
इसीलिए हमारे मनीषियों ने सदा परामर्श दिया है कि अपने लिए जीने की वृत्ति छोड़कर उपलब्ध साधनों और अपनी क्षमताओं का एक अंश सदा परोपकार में लगाना चाहिए। जो परस्पर सहयोग, सेवा, सहायता और करुणा करते हैं, वही लोग समाज को प्राणवान और जीवंत बनाए रखने का काम करते हैं। हमें परोपकार को जीवन का एक अनिवार्य व्रत मान कर अंगीकार करना चाहिए।
पुराने जमाने की बात है। किसी राजा ने दूसरे राजा के पास एक पत्र और सुरमे की छोटी सी डिबिया भेजी। पत्र लिखा में था कि सुरमा भिजवा रहा हूं वह अत्यंत मूल्यवान है। इसे लगाने से अंधापन दूर हो जाता है। राजा सोच में पड़ गया। वह समझ नहीं पा रहा था कि इसे किस-किस को दें। उसके राज्य में नेत्रहीनों की संख्या अच्छी-खासी थी, पर सुरमे की मात्रा बस इतनी थी जिससे केवल दो आंखों की रोशनी लौट सके। तभी राजा को अचानक अपने एक वृद्ध मंत्री की स्मृति हो आई। वह मंत्री बहुत ही बुद्धिमान था, मगर आंखों की रोशनी चले जाने के कारण उसने राजकीय कामकाज से छुट्टी ले ली थी और घर पर ही रहता था। राजा ने सोचा कि अगर उसकी आंखों की ज्योति वापस आ गई तो उसे उस योग्य मंत्री की सेवाएं फिर से मिलने लगेगी। राजा ने मंत्री को बुलवाया और उसे सुरमे की डिबिया देते हुए कहा, 'इस सुरमे को आंखों में डालें, आपकी आंखों की रोशनी लौट आएगी। ध्यान रहे, यह केवल दो आंखों के लिए है।' मंत्री ने एक आंख में सुरमा डाला। उस आंख की रोशनी आ गई। उससे मंत्री को सब कुछ दिखने लगे। फिर उसने बचा-खुचा सुरमा अपनी जीभ पर डाल लिया। यह देखकर राजा चकित रह गया। उसने पूछा, 'यह आपने क्या किया? अब तो आपकी एक ही आंख में रोशनी आ पाएगी। लोग आपको काना कहेंगे।' मंत्री ने जवाब दिया, 'राजन् आप चिंता न करे। मैं काना नहीं रहूंगा। मैं यह सुरमा बनकर हजारों नेत्रहीनों को रोशनी दूंगा। मैंने इसे चखकर जान लिया है कि सुरमा किस चीज से बना है।' राजा मंत्री की समझदारी से अभिभूत हो गया। उसने मंत्री को गले लगाकर कहा, 'यह हमारा सौभाग्य है कि मुझे आप जैसा मंत्री मिला। अगर हर राज्य के मंत्री आप जैसे हो जाएं तो किसी को कोई दुख नहीं होगा।'
किसी विषय को समझना भी एक ................ पुराने जमाने की बात है। किसी राजा ने दूसरे राजा के पास एक पत्र और सुरमे की छोटी सी डिबिया भेजी। पत्र लिखा में था कि सुरमा भिजवा रहा हूं वह अत्यंत मूल्यवान है। इसे लगाने से अंधापन दूर हो जाता है। राजा सोच में पड़ गया। वह समझ नहीं पा रहा था कि इसे किस-किस को दें। उसके राज्य में नेत्रहीनों की संख्या अच्छी-खासी थी, पर सुरमे की मात्रा बस इतनी थी जिससे केवल दो आंखों की रोशनी लौट सके। तभी राजा को अचानक अपने एक वृद्ध मंत्री की स्मृति हो आई। वह मंत्री बहुत ही बुद्धिमान था, मगर आंखों की रोशनी चले जाने के कारण उसने राजकीय कामकाज से छुट्टी ले ली थी और घर पर ही रहता था। राजा ने सोचा कि अगर उसकी आंखों की ज्योति वापस आ गई तो उसे उस योग्य मंत्री की सेवाएं फिर से मिलने लगेगी। राजा ने मंत्री को बुलवाया और उसे सुरमे की डिबिया देते हुए कहा, 'इस सुरमे को आंखों में डालें, आपकी आंखों की रोशनी लौट आएगी। ध्यान रहे, यह केवल दो आंखों के लिए है।' मंत्री ने एक आंख में सुरमा डाला। उस आंख की रोशनी आ गई। उससे मंत्री को सब कुछ दिखने लगे। फिर उसने बचा-खुचा सुरमा अपनी जीभ पर डाल लिया। यह देखकर राजा चकित रह गया। उसने पूछा, 'यह आपने क्या किया? अब तो आपकी एक ही आंख में रोशनी आ पाएगी। लोग आपको काना कहेंगे।' मंत्री ने जवाब दिया, 'राजन् आप चिंता न करे। मैं काना नहीं रहूंगा। मैं यह सुरमा बनकर हजारों नेत्रहीनों को रोशनी दूंगा। मैंने इसे चखकर जान लिया है कि सुरमा किस चीज से बना है।' राजा मंत्री की समझदारी से अभिभूत हो गया। उसने मंत्री को गले लगाकर कहा, 'यह हमारा सौभाग्य है कि मुझे आप जैसा मंत्री मिला। अगर हर राज्य के मंत्री आप जैसे हो जाएं तो किसी को कोई दुख नहीं होगा।'
......आमोद कुमार ,
पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान
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