Thursday, May 20, 2010

आस्था रखना हो तो किसी अच्छे व्यक्ति में रखिये , वहां प़र ही ईश्वर रहते हैं !

अपने को ज्ञानी और परोपकारी प्रमाणित करना मूर्खो का काम हैं, क्योंकि शिक्षा जीवन पर्यंत चलने वाली एक अंतहीन प्रक्रिया है।बिना बात के कलह करना मूर्खो का कार्य है। जिसको मुर्ख लोग बड़े ही सफलतापूर्वक करते हैं !और अपने कार्यो में सफल भी होते हैं ....ज्ञानी तो ज्ञान अर्जित करने में साफ़ तौर से भौतिक सुख से अलग रहते हैं , क्योंकि उनके पास समय का अभाव रहता हैं , उनके दिमाग में हर  समय कोई ना कोई नयी चीज जानने की ललक बनी रहती हैं , सामान्यतः लोग, ऐसे लोगो को मजाक उड़ाते हैं, और बहुत ही खुश हो जाते हैं ! लेकिन ज्ञानी लोग उनके अच्छे ज्ञान को देखकर नजर अंदाज कर जाते हैं !
आज के दौर में शिक्षा का उद्देश्य विद्याधन अर्जित करना नहीं बल्कि धन अर्जित करना हो गया हैं ! यह बड़ा ही चिंता का विषय हैं ! तुरंत लोग परीक्षा की डिग्री लेने में बेचैन रहते हैं , वो भी नक़ल से , और शुरू हो जाते हैं , अपनी हैसियत से ज्यादा अपने आप कि प्रदर्शित करने में .....और पढ़ा लिखा व्यक्ति को मुर्ख साबित भी कर देते हैं !क्योंकि परीक्षा के समय तो वे शिक्षा के बदले कैसे नक़ल से पास किया जाये इस बात की शिक्षा लेने में व्यस्त रहते हैं   !
सुख और दुःख की परिभाषा यह है कि जहाँ तक आप सह सकते हो वहां तक तो सुख है, जहाँ से सहना मुश्किल हो जाता है, वहाँ से दुःख शुरू हो जाता है, और यह सहने की शक्ति सबकी अलग-अलग है। कोई थोड़े दुःख में घबरा जाता है, कोई बहुत दुःख आये तो भी नहीं घबराते हैं।
जिन्दगी का गुजारा करना एक बात है और ज़िन्दगी को जीना आना दूसरी बात है .....
दौलत, संपत्ति और पद जब मिलते हैं, तो मनुष्‍य अंधा हो जाता है, और जब ये छिनते हैं तो मनुष्‍य पागल हो जाता है यानि उसका दास गुलाम होकर पगलाया फिरता है ...ज्ञान मार्ग में विघ्न बाधाएं बहुत हैं, परन्तु आनंद अपार हैं !!!
सभ्य समाज में रहने वाले व्यक्ति की पहचान के लिए उसका संस्कारवान होना आवश्यक है। अच्छे संस्कार ही पर्याय है सभ्यता का। यदि हम देखने में सुंदर हैं, लेकिन संस्कारों से शून्य अर्थात दरिद्र है तो हमारी सुंदरता का कोई मूल्य नहीं है।
सज्जनता हमें अपने आचरण से दीर्घकाल तक जीवित रखती है। संस्कारवान व्यक्ति जीवन में आने वाली समस्याओं का सामना करने की सामर्थ्य रखता है। इसके साथ ही हर व्यक्ति भी सुस्कारित मानव को ही पसंद करते है नैतिकता का सीधा संबंध आत्मबल से है जो संस्कारों से ही निर्मित होती है। हमारे गुण, कर्म, स्वभाव में घुले-मिले कुसंस्कारों को हमारे द्वारा अर्जित संस्कारों की शक्ति ही उन्हें अप्रभावित करती है। आत्मा परमात्मा का ही स्वरूप है, जो हमारे शरीर रूपी मंदिर में सदैव विराजमान रहते हैं। हमारा कर्तव्य है कि हम अपने आचरण से किसी भी तरह आत्मा को कलुषित न होने दें। हमसे जुडी हुई हमारी सामाजिक जिम्मेदारियां भी है जिनका निर्वहन भी हम अपने प्रभावशाली व्यक्तित्व के माध्यम से करने में तभी समर्थ होंगे जब हम सुसंस्कारिता के क्षेत्र में संपन्न होंगे। संस्कार हमारे आत्मबल का निर्माण करते हैं। शालीनता, सज्जनता, सहृदयता, उदारता, दयालुता जैसे सद्गुण सुसंस्कारिता के लक्षण हैं। आधुनिकता के इस युग में संस्कारों की मजबूत लकीर धूमिल होती जा रही है, हमें इसे बचाना होगा। इस दिशा में विवेकशील लोगों को आगे आना होगा। यह मानवता, नैतिकता और समाज के विकास के लिए अति आवश्यकता है। सामाजिक संतुलन सुसंस्कारिता के आधार पर ही कायम रखा जा सकता है अन्यथा सर्वत्र अराजकता का ही बोल बाला हो जाएगा, जो एक सभ्य समाज के लिए असहनीय बात होगी, क्योंकि हर कोई सुख, शांति, प्रगति और सम्मान चाहता है जो संस्कारों के द्वारा ही संभव है। संस्कार हमें नैतिकता की शिक्षा देते हैं। मानवता इसी से पोषित होती है। चरित्र निर्माण के लिए संस्कारों की पृष्ठभूमि निर्मित करनी होती है। रहन-सहन का तरीका, जीवन जीने की कला, लोकव्यवहार आदि सदाचार से संबंधित बातें है जो हमें जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और प्रगति के मार्ग पर अग्रसर करती है। समाज में भाई चारा और आत्मीयता का विस्तार भी नैतिकता और मानवता के माध्यम से ही संभव है। यदि हम सुखी होंगे तो हमारे पडोसी भी सुखी होंगे इस भावना को यदि हम अपने परिवार से ही विकसित करेंगे तो निश्चय ही आत्मीयता का विस्तार होगा।
स्वामी ज्ञानानन्द जी का कहना हैं ' शाश्वत शांति की प्राप्ति के लिए शांति की इच्छा नहीं बल्कि आवश्यक है इच्छाओं की शांति'
मोहमाया है केवल धोखा , इसलिये मोहमाया को हम कहते हैं अनोखा !!!!
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यदि मनुष्य अपने भीतर गहराई से यह प्रश्न पूछे कि उसे किस चीज की तलाश है तो भीतर गहराई से एक ही उत्तर आएगा कि सुख व शांति की तलाश है। मनुष्य सोचता है कि ज्यादा धन कमा लूंगा तो मै सुखी हो जाऊंगा और ज्यादा यश कमा लूंगा तो मै सुखी हो जाऊंगा। बहुत कमा लेने पर भी जब वह सुख, शांति नही पाता तो मन कहता है कि सुख इसलिए नही मिला कि श्रम मे कही कमी थी और शक्ति से दौडो और धन इकट्ठा करो, जबकि केवल धन कमाने से ही सुख प्राप्त नही होता क्योंकी जिन वस्तुओ मे व्यक्ती सुख तलाश रहा है वहां सुख है ही नही। सांसारिक मोह माया तो केवल धोखा है।अगर हम भीतर से खुश है तो हमे रेगिस्तान मे भी फूल खिले हुए महसूस होगे और अगर हम दुखी है तो हमे फूलो के बगीचे मे चारों ओर कांटे ही कांटे नजर आएंगे। हम खुश है तो बाहर चिलचिलाती धूप भी अच्छी है और हम दुखी है तो बाहर का मौसम चाहे कितना खुशगवार हो तो भी हमे पतझड की तरह लगता है। क्योंकी जैसा हम भीतर से महसूस करते है, वैसा ही हमे संसार नजर आता है। इससे एक बात तो सिद्ध होती है कि सुख भीतर से आता है बाहर से नही।जब हम निद्रा से उठते है तो ताजगी अनुभव करते है क्योंकी धन कमाने की, यश मिलने की यात्रा ऊर्जा की बहिर्यात्रा है और निद्रा ऊर्जा की अंतर्यात्रा है। बाहर का जितना बडा ब्रह्माण्ड है उतना ही बडा भीतर का ब्रह्माण्ड है। हम मध्य मे खडे है। बाहर की तरफ यात्रा करेगे, तो केवल यात्रा ही यात्रा है पहुंचेगे कही नही क्योंकी मंजिल बाहर नही भीतर है।दूसरी बात हम सोचते है कि हम सुख की तलाश मे भटक रहे है पर यह गलत है। व्यक्ती को सुख की तलाश मे नही बल्कि उसे आनंद की तलाश मे भटकना चाहिए। चूंकि हमारा पंचभूतो से बना शरीर इंद्रियो से जुडा है इसलिए हम उसे ही सुख समझते है। यह देह तो केवल एक वस्त्र की भांति है परन्तु जैसे ही भीतर की यात्रा शुरू होती है वैसे-वैसे बाहर की परतें छूटती जाती है और हम अपने स्वरूप को पहचानने लगते है।
हर मनुष्य अच्छी सोच के साथ जीवन के लम्हों को जीना चाहता है केवल उसकी नकारात्मक और धनात्मक सोच ही उसके कल को बनाती है। “काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल मे प्रलय होयेगी बहुरी करेगा कब”
आस्था रखना हो तो किसी अच्छे व्यक्ति में रखिये , वहां प़र ही ईश्वर रहते हैं ! आस्था सचमुच वह सबसे महान चमत्कारी शक्ति है जिसकी कल्पना की जा सकती है। आस्था कभी किसी व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ती। हम तब असफल होते हैं जब हम अपनी आस्था का दामन छोड़ देते हैं।
सच्ची बात अच्छी नहीं लगती और अच्छी लगने वाली बात कभी सच्ची नहीं होती।अच्छाई कभी झगड़ा नहीं कराती और झगड़ा कभी अच्छा नहीं होता। बुद्धिमान कभी ज्यादा बकवाश नहीं करते और ज्यादा बकवाश करने वाले कभी बुद्धिवान नहीं होते।आलस्य अभावों और कष्टों का पिता है, आलस्य में जीवन बिताना आत्महत्या के समान है।
देखने में फूल खूब सुंदर हो, पर उसमें खुशबू न हो तो उसका होना, न होना बराबर है। उसी तरह जो आदमी बोलता तो बहुत मीठा है, पर जैसा बोलता है वैसा करता नहीं, उसकी मीठी वाणी व्यर्थ है।'समय बेशकीमती है। समय जीवन है। इसे न खरीदा जा सकता है, न उधार लिया जा सकता है। समय की बर्बादी जीवन की बर्बादी है। बीता हुआ कल सुधारा नहीं जा सकता। आने वाला कल शायद कभी न आए।आज ही हमारा है, इसका हम श्रेष्ठतम उपयोग करें। जो अतीत से नहीं सीखता, वह भविष्य द्वारा दंडित किया जाता है।'
माचिस की तीली का सिर होता है, पर दिमाग नहीँ, इसलिये वह थोड़े घर्षण से जल उठती है हमारे पास सिर भी है और दिमाग भी। फिर भी हम छोटी- सी बात पर उत्तेजित क्यों हो जाते हैं।किसी की तरक्की देखो तो उन को देख कर जलना नहीं, अपना सुख बरबाद मत करो, ख़ुद भी आगे बढ़ने की कोशिश करो !
"माटी कहें कुम्हार से, तु क्या रोदें मोय

एक दिन ऐसा आयेगा, मैं रौंदुंगी तोय"
ईमानदारी एक ऐसा गुण है जिसे जीवन में उतार लेने पर जीवन की सार्थकता पूर्ण हो जाती है। इससे न केवल मानव का बल्कि संपूर्ण समाज और राष्ट्र का परिवर्तन हो सकता है। व्यक्ति यदि अपने प्रत्येक कार्य ईमानदारी पूर्वक करता है तो, मानव जीवन अत्यंत पावन, सात्विक और महानता का पुंज बन सकता है । ईमानदारी स्थायी होती है। जीवन के हर क्षेत्र में लोग स्वयं चाहे जैसे हो परन्तु ईमानदार व्यक्ति के सामने शीश झुका देते हैं।
एक सीमा के बाद सहनशीलता गुण नहीं रह जाता है।एक मूर्ख व्यक्ति अपनी प्रशंसा के लिए एक अधिक मूर्ख की खोज करता है।घुटनों के बल झुककर जीवित रहने की अपेक्षा अपने पैरों पर खड़े-खड़े मरना अच्छा है। मूर्ख व मृत कभी भी अपनी राय नहीं बदलते।विपत्ति व्यक्ति को स्वयं से परिचित कराती है।आलस्य से बढ़कर अधिक घातक और समीपवर्ती शत्रु दूसरा नहीं।सदाचार और निर्मल जीवन सच्ची शिक्षा का आधार है।मानव का सच्चा जीवनसाथी विद्या है। इसी कारण वह विद्वान कहलाता है।
......आमोद कुमार ,पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

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