Sunday, May 9, 2010

कौन कहता हैं की एक अकेला व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता हैं ?

मेरा यह लेख खासकर उन बच्चो के लिये हैं जो अभी वयस्क नहीं हुए है !नर एवं नारी प्रकृति की मानव समाज को ईश्वर द्वारा बख्शी गई सबसे श्रेष्ठ एवम अतुलनीय मानस कृति है ,नर एवं नारी सम्पूर्ण कायनात है अपने आप में एक सम्पूर्ण संसार है !
ईश्वर ने सभी को अपार शक्ति दी हैं , अब कुछ लोग इसका उपयोग करते हैं तो कुछ लोग दुरूपयोग , जब कभी विपरीत स्थिति का सामना करना होता हैं , "सीधा बोल देंगे ' हम एक अकेला क्या कर सकते हैं ", यह बात कह कर वे अपनी कायरता का प्रदर्शन करते हैं ! मेरी यह स्पष्ट समझ हैं की कोई व्यक्ति कायर तभी बनता हैं जब वह गलत प्रविर्ती के लोगो के साथ रहना शुरू कर देता हैं |अपने जीवन में कोई नई शुरुआत करने के लिए जल्दबाजी में कोई भी फैसला लेना ठीक नहीं होता हैं , यह मेरा भी मानना हैं !लेकिन निरर्थक सोंचना भी अहितकर होता हैं |
हर काम के लिए व्यक्ति के अंदर शक्ति का होना आवश्यक है। शक्ति दो प्रकार की होती है। शारीरिक तथा मानसिक। जो व्यक्ति जीवन में सफल होना चाहता है उसके शरीर और मन दोनों में शक्ति होना आवश्यक है। शरीर की शक्ति आती है शरीर को स्वस्थ रखने से और शरीर को स्वस्थ रखने से और मन की शक्ति आती है सत्य के आचरण से। शरीर और मन दोनों की शक्तियाँ जब तक व्यक्ति में हों तभी तक वह सच्चे अर्थों में शक्तिशाली कहलाने का दावा कर सकता है। दोनों में से केवल एक ही शक्ति रखने वाला व्यक्ति अपने जीवन में सफल नहीं हो सकता।
शारीरिक और मानसिक बल एक-दूसरे के बिना निरर्थक हैं। शरीर में बल प्राप्त करने के लिए उसकी देखभाल बहुत आवश्यक है। जब तक बच्चा छोटा रहता है, उसका स्वास्थ्य की जिम्मेदारी उसके माता-पिता पर रहती है। बड़े होने पर अपने शरीर की देखभाल स्वयं करना बहुत आवश्यक है। आरंभ से ही ठीक आदतें डालनी चाहिए। समय से खानापीना, सोना, खेलना शरीर के स्वास्‍थ्‍य के लिए अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त भोजन को रुचि तथा प्रेम से करना भी बहुत आवश्यक है।

जो व्यक्ति शरीर की देखभाल नहीं करते, वे बहुत बड़ी भूल करते हैं। शरीर की देखभाल का स्थान प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति की दिनचर्या में होना नितांत आवश्यक है। स्वस्थ शरीर के बिना सफल जीवन की कामना करना व्यर्थ है। शरीर की शक्ति ही मन की विविध शक्तियों को कार्य रूप देने में सफल हो सकती है। स्वस्थ जीवन बल यही शरीर की एकमात्र शक्ति है, किंतु इसके विपरीत मन की शक्तियाँ ही कई प्रकार की होती हैं। उनके नाम हैं बुद्धि, दृढ़ता और कल्पना। ये शक्तियाँ सब व्यक्तियों में समान रूप से निहित नहीं होतीं, लेकिन न्यूनाधिक मात्रा में हर एक के पास विद्यमान रहती हैं। स्वस्थ मन वाला व्यक्ति यदि चाहे तो इनका और अधिक विकास भी सहज ही कर सकता है।

स्वस्थ मन वह है जिसकी बुद्धि हमेशा अच्छी बातों की प्रेरणा देती है तथा निरंतर ज्ञान के पथ पर अग्रसर होने की चेष्टा करती है। स्वस्थ मन की दृढ़ता व्यक्ति को उत्साहित रखती है और उसे अपने हर काम को पूरा करने में मदद देती है। स्वस्थ मन की कल्पना व्यक्ति को ऊँचा उठाने और अधिक अच्‍छा बनने में सतत सहायता करती है।
अस्वस्थ मन को बुद्धि बुरी दिशा की तरफ ले जाती है। अस्वस्थ मन में दृढ़ता होती ही नहीं और अस्वस्थ मन की कल्पना सदा भयावह होती है। बुद्धि दूसरों की बुराई सोचती है। दृढ़ता न रहने के कारण अस्वस्थ मन वाला व्यक्ति कोई भी काम नहीं कर पाता। उसकी कल्पना उसे असफलता तथा पतन की तस्वीरें ही उसके आगे प्रस्तुत करती है।
मन को स्वस्थ रखने के लिए दो बातें बिल्कुल ही आवश्यक हैं। भगवान में दृढ़ विश्वास और सत्य का आचरण। भगवान में विश्वास न रहने पर व्यक्ति का जीवन अव्यवस्थित हो उठता है। उसे पता नहीं चलता कि वह जीवित ही क्यों है? ऐसे प्रश्न मन में उठकर उसे अशांत बना देते हैं और उसकी बुद्धि उद्‍भ्रांत-सी रहती है।
आत्मा भगवान का ही एक अंश है। भगवान ने उसे संसार में एक खास उद्‍देश्य से भेजा है - वह सुखी रहे, ज्ञान प्राप्त करे और अपने प्राप्त किए हुए ज्ञान को संसार को अच्छा करने में काम में लाए। ऐसा सोचने वाले व्यक्ति का मन सदा प्रसन्न, सदा शांत रहता है और अपने आप में वह शक्ति का अनुभव करता है। जो व्यक्ति यह जान लेता है कि वह एक उद्‍देश्य से संसार में आया है वह कभी भी बुरा आचरण नहीं करता है। सत्य को अपने जीवन की धुरी बनाकर वह हमेशा कठिन काम करता है।अपना कर्तव्य भली-भाँति निभाता है और उसका मन सशक्त और प्रफुल्ल रहता है। मन में शक्ति रहने के कारण वह व्यक्ति समाज में सदा प्रतिष्ठित रहता है। दूसरे लोगों का श्रद्धा-पात्र रहता है।
मन को स्वस्थ रखने के लिए मन पर नियंत्रण रखना भी बहुत आवश्यक है। आज के संसार में बहुत सारे व्यक्ति ऐसे मिलेंगे जो यह कहते हैं कि यदि भगवान ने हमें इच्छा, अभिलाषा, भावनाएँ, अनुभूतियाँ दी हैं तो हम उन्हें ‍छिपाकर क्यों रखें? मन जो कहे वही करना उचित है। ऐसा करने वाले लोग मन और प्रवृत्तियों के अंतर को स्पष्ट नहीं समझ सकते हैं।
सोंचता हूँ बिचार आदमी को क्या से क्या बना देता है , लाखो करोड़ों लोगों में से किसी एक के अन्दर सामाजिक परिवेश देखते हुए बिरोध स्वरुप मन में बिचार आता है ! अक्सर  बिरोध घर से शुरु होता है ,लेकिन हमारे साथ ऐसा नहीं है ! लोग , मित्र अक्सर  उपहास का पात्र बनाते हैं ,-कहते हैं एक अकेला ब्यक्ति कुछ नहीं कर सकता ! ---क्यों नहीं कर सकता ???????
अगर उद्देश्य सही हो तो रास्ते में कितनी हीं बाधाएँ आये ब्यक्ति आगे हीं जायेगा ! जब मन में लगन हो और कार्य के प्रति इमानदार हो तो क्यों नहीं कर सकता ?
महात्मा बुद्ध स्वामी दयानंद सरस्वती ऐसे महा पुरुषों के सामने जीवन भर कस्ट आया तो वो भी तो अकेले हीं थे , क्या वो लोग वो नहीं कर दिखाए जो वो चाहते थे ?आज देश एक जटिल समस्याओ  से घिरा हुआ है जरुरत है वैसे हीं एक दिब्य पुरुष की !उस समय तो साधन नहीं हुआ करता था तब बहुत साधक थे , और आज जब साधन हीं साधन है --तो कोई साधक हीं नहीं मिलता,जो ईमानदारी और समर्पित भाव से देश की सेवा के बारे में सोंचे !
पक्का जूनून और विचारों से बड़ा कोई ब्रम्हास्त्र नहीं होता ,मंजिल खुद व खुद मिल जाएगी जरुरत है तो सिर्फ धैर्य की ,आज बोलने वाले बहुत हैं सुनने वाला कोई नहीं ! छोटे विषयों पर हीं अधिक बोलते हैं ,इंसानियत की बात तो कोई बोलता नहीं ,सत्य बात कोई करता नहीं , क्योकि आज सत्य यह है की लोगों को पैसा कमाने के अलावा कुछ नहीं सूझता !!!
जिन्हें अपने श्रम पर विश्वास नहीं वो कोई नया परिवर्तन नहीं ला सकता !!!
समय का चक्र बहुत ही तेजी से घूमता हैं , इस लिये हमेशा समय का ध्यान रखना बहुत ही आवस्यक हैं ! आज पुरा समाज संवेदनहीन हो गया है । और जाहिर है हम भी उससे अलग नही । आख़िर हमारी जिम्मेदारी किसके प्रति ?समाज के प्रति या फिर समय के ?
अच्छे दिन आने पर वे मुँह छिपाने वाले ही मुँह दिखाई के लिए खुद उसके घर आने लगते हैं और हर तरह की मदद को तत्पर रहते हैं। तभी तो कहते हैं कि बुरे दिन हमें बताते हैं कि क्या अच्छा है और बुरा क्या, कौन वाकई में हमारा मददगार है और कौन स्वार्थी।
वैसे भी अच्छे और बुरे दिन एक चक्र की तरह घूमते रहते हैं। यदि बुरे दिन में अपने प्रति लोगों के गलत व्यवहार को देखकर आप भी दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करने लगेंगे तो आपके बुरे दिन टलेंगे कैसे? तब तो आपके बुरे दिनों की अवधि और बढ़ जाएगी। लेकिन यदि आप अच्छे बने रहकर अपने सामर्थ्य से जरूरतमंदों की मदद करते रहेंगे तो ईश्वर आपकी मदद करेगा और बुरे दिनों की तय अवधि को घटा देगा जैसा कि जिनदत्त के साथ हुआ।
दूसरी ओर, अच्छे दिन आ जाने पर भी अच्छे कर्म करना न छोड़ें। अच्छे समय में भी आपकी मति नहीं फिरना चाहिए वर्ना फिर दिन फिरने में समय नहीं लगेगा। इसलिए यदि आप अच्छे दिनों की अवधि बढ़ाना चाहते हैं तो अच्छे कर्म करते रहें। यदि आप ऐसा करते रहेंगे तो आपको पता ही नहीं चलेगा कि कब दिन अच्छे आए, कम बुरे।
कब परिस्थितियाँ अनुकूल हुईं, कब प्रतिकूल, क्योंकि आपका मन, आपकी मति जो स्थिर रहेंगे और इसकी वजह से आपको बदलते समय का अहसास ही नहीं होगा।
महान संत कबीरदास जी ने कहा हैं क़ि "बुरा जो देखन मैं चला , बुरा ना मिलया कोए जो मुनं खोजा अपना , तो मुझसे बुरा ना कोए " ....इस बात से मैं असहमत हूँ , क्योंकि इतना भी ज्यादा अपने अंदर बुराई खोजने में ना  लगिए क़ि आप हिन् भावना के शिकार हो जाये |
 अच्छे विचार , अच्छे संस्कार , रखने का हमेशा प्रयास करे , जिससे क़ि एक स्वस्थ्य समाज का निर्माण हो सके |
बच्चा जब तब बच्चा है तब तक बिलकुल सच्चा है !!!!!!!!!!!!!! इसलिये हमेशा बच्चा बने रहने का प्रयास करे | 
अगर आपके अंदर डर की भावना हैं , तो यह मेरी स्पष्ट समझ हैं , की जरूर आपने किसी गलत कार्य को किया होगा !
अपने  आप में संतुष्ट होने का प्रयास करे ! चारो तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ मिलेगी !
अपने मन के अंदर क्रोध कभी ना आने दे , लाये तो सिर्फ खुशियाँ ही खुशियाँ !










भगवान से भी नहीं डरना हैं, डरना हैं तो डरिये गलत कार्य करने से !
लड़ना हैं तो लड़िये  अपने मन के अंदर छिपी हुई पाप से ! इन्सान से नहीं !
खुश रहना हैं तो देखिये अपने आपको की कौन सी कमी हैं , दूसरो की ख़ुशी में आग कभी ना डाले !
अपनी ख़ुशी से बहुत उत्साहित कभी ना हो , हमेशा उत्साहित करे दूसरो को अच्छा कार्य करने के लिये !
अपनी मोबाइल का समुचित उपयोग करे , अनावश्यक में कभी दूसरो को तंग ना करे !
कुछ अच्छा कैसे करे उसपर अपना ध्यान केन्द्रित करे ना की मोबाइल प़र हां हां ही ही करे |
कायर बनने से अच्छा हैं कही जाकर सो जाये ! नहीं तो आपको देखकर दूसरे भी कायर बनने लगेंगे !




ख़ुशी बाटने की चीज हैं , इसलिये हमेशा बाटकर खाना सीखे , दुःख पचाने की चीज है , इसलिये दुःख को हमेशा अपने अंदर पचाने का प्रयतन करे |




अब कल लिखेंगे ........
आमोद कुमार
पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

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