बचपन से ही मेरी सोच, शैली अभिव्यक्ति और प्रस्तुति सब सहज एवं स्वाभाविक रहे हैं। शायद इसी कारण से मुझे भरपूर स्नेह सभी जगह मिला ........ मेरे "स्वाभाविक" शब्द कहने का अर्थ हैं कि किसी भी व्यक्ति को अपना स्वभाव को हमेशा सरल , सहज , स्नेहपूर्ण अपने अंतर आत्मा के अनुशार व्यक्त होने देने चाहिए ना कि परिवर्तित करके ! ऐसा करने से आप हमेशा चिंता रहित , झूठ रहित रहेंगे , आपके अन्दर जो स्वाभाविक शैली रहेगी , हमेशा आगे बढ़ने में सहयोग करेगी , यह अलग बात हैं लोग हमको बहुत पिछड़ा व्यक्ति समझते हैं और उनका पिछड़ा व्यक्ति समझना भी लाजिमी हैं , क्योंकि पिछड़ा व्यक्ति को पिछड़ा व्यक्ति ही कहा जायेगा ना .......लेकिन हम सच कह रहे हैं , लोगो कि बात से हमको कोई फर्क नहीं पड़ता हैं |
आज भी कोई व्यक्ति जब हमसे पूछते हैं कि यार तुमको कहाँ रहना अच्छा लगता हैं तो मेरा स्पष्ट उतर रहता हैं कि अपने घर में गाँव में और अपने देश में ! अभी इस प़र हम लिखेंगे ,,,,,,,after some time....
गलतियों का ज्ञान तब मिलता है जब हम मासूम और स्वभाविक होते हैं। जो गलती हो जाती हैं उसके लिए मैं अपने को पापी समझता हूँ क्योंकि उस वर्तमान क्षण में मैं अपने आप को फिर से नवीन, शुद्ध , स्पष्ट और स्वभाविक बनाता हूँ ,भूतकाल की गलतियां भूतकाल हैं। जब यह ज्ञान मिल जाता है तो मैं फिर से परिपूर्ण हो जाता हूँ |
गलतियों को सुधारने के लिए सभी व्यक्ति को अधिकार और प्रेम की आवश्यकता होती है। अधिकार और प्रेम एक-दूसरे के विरोधाभासी हैं परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। अधिकार के बिना प्रेम दम घुटने जैसा है। प्रेम के बिना अधिकार उथले जैसा है। एक मित्र के पास अधिकार और प्रेम दोनों होना चाहिए परन्तु वह सही मेल में होना चाहिए। यह सिर्फ तब हो सकता है जब आप पूर्णत: आवेगहीन और केन्द्रित होंगे।
गलतियों को सुधारने के लिए सभी व्यक्ति को अधिकार और प्रेम की आवश्यकता होती है। अधिकार और प्रेम एक-दूसरे के विरोधाभासी हैं परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। अधिकार के बिना प्रेम दम घुटने जैसा है। प्रेम के बिना अधिकार उथले जैसा है। एक मित्र के पास अधिकार और प्रेम दोनों होना चाहिए परन्तु वह सही मेल में होना चाहिए। यह सिर्फ तब हो सकता है जब आप पूर्णत: आवेगहीन और केन्द्रित होंगे।
किसी व्यक्ति को उस गलती के बारे में मत बताआ॓ जो उसे पता है, उसने की है। ऐसा करके आप उसे और अधिक अपराधी बना देंगे। एक महान व्यक्ति दूसरों की गलतियों को नहीं पकड़ेगा और उन्हें अपराधी महसूस नहीं होने देगा। वह उन्हें आवेग और देखरेख के साथ ठीक करेगा। जब आप दया दिखाते हैं तो आपका सही स्वभाव सामने आता है। क्या आपने दया के कुछ कृत्य किये हैं किसी से बिना अपेक्षा के? हमारी सेवा बुद्धिहीन नहीं होनी चाहिए। दया के कृत्य के लिए योजना नहीं बनानी चाहिए। जब आप यादृच्छिक दया के कृत्य करते हैं तो अपने सही स्वभाव में आ जाते हैं। अनायास कुछ करें और स्वाभाविक रहें।
......आमोद कुमार,
पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान
2 comments:
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