संघर्ष और चुनौती से ही तीक्ष्ण होती है बुद्धि, जीवन में संघर्ष, प्रतिकूलता और चुनौतियों के मौकों पर मनुष्य की बुद्धि और मंझ जाती है। जो लोग ऐसी परिस्थितियों से वंचित हैं, वे बुद्धिहीन रह जाएं इसमें आश्चर्य नहीं होगा। अपनी इंद्रियों द्वारा विषयों का भोग जो हम करते हैं उसकी स्वीकृति, अस्वीकृति, अनुभूति बुद्धि कराती है।
खुद के भीतर गहरे उतरने से ही मिटेगा अहंकार, विद्वत्ता का गहना है विनम्रता। ज्ञान का खतरा अहंकार और भक्ति का खतरा आलस्य है। कुछ लोग अहंकार से मुक्ति के लिए विनम्रता को अपना लेते हैं। मनुष्य के भीतर जो ‘मैं’ का भाव होता है, अहंकार उसी को हृष्ट-पुष्ट करता है।
जीवन में खतरे तो उठाने ही पड़ते हैं. बिना खतरों के जीवन भी कैसा जीवन! जीवन में खतरे नहीं उठाने पर दुःख-दर्द को कुछ दूर रखा जा सकता है लेकिन कुछ भी नया सीखने, महसूस करने, बदलने, बढ़ने, प्यार पाने, और जीने के लिए खतरे उठाने पड़ते हैं !
हंसने में मूर्ख समझ लिए जाने का खतरा है.
रोयें तो भावुक मान लिए जाने का खतरा है. उंगली थमा दें तो हाथ जकड़े जाने का खतरा है.
अपनी बात रखें तो चुप कराये जाने का खतरा है.
किसी का कुछ ज़ाहिर कर दें तो अपने राज़ उभर आने का खतरा है.
अपनी सोच दुनिया तो बताएं तो सपनों के चोरी हो जाने का खतरा है.
प्यार तह-ए-दिल से करें तो बेवफाई का खतरा है.
जीने में मरने का खतरा है.
उम्मीदें पालें तो मायूसी का खतरा है.
कोशिश करें तो नाकामयाबी का खतरा है.
क्योंकि खतरा शब्द ही एक स्वतः स्पष्ट खतरा हैं , और सबसे गंभीर खतरा हैं कि खतरा प़र ही हमेशा सचेत रहना !!!!!खतरा जैसे शब्दों प़र ना ध्यान देने वाले व्यक्ति ही सच्चे इंसान होते हैं और असली बहादुर कहलाते हैं !!!!!!!!!!
केवल इस डर से वनों की ओर भाग जाना कि कहीं भौतिक आकर्षण उन्हें फँसा न ले, कायरता के अतिरिक्त कुछ नहीं है। यह पलायन है, सन्यास नहीं। यह उसी प्रकार है जैसे शिकारी के डर से हिरन जंगल में भाग जाते हैं। वास्तव में वीर पुरुष तो वे हैं जो प्रबल भावोद्वेगों के बावजूद दृढता से सन्मार्ग पर चलते रहते हैं।
सच्चा महात्मा वही है जिसने सांसारिक सुखों को विष के समान त्याग दिया है। विवेक द्वारा उत्पन्न वैराग्य के फलस्वरूप जिसकी इच्छायें समाप्त हो गई हैं तथा वह सतत् आत्मस्वरूप के आनन्द में मग्न रहता है। ऐसे आत्मज्ञानी पुरुष चाहे जहाँ और जिस अवस्था में रहें, वह सर्वत्र उसी एक आत्मस्वरूप के दर्शन करता रहता है। उसे फिर न तो कोई आकर्षण लुभा पाता है और न कोई बन्धन बाँध सकता है। यदि किसी साधक का मन उत्तेजनाओं और प्रलोभनों के मध्य भी शान्त व स्थिर बना रहता है तो वह निश्चित ही दूसरे साधारण व्यक्तिय से भिन्न होगा और इससे कोई फर्क नहीं पडेगा कि वह घर-परिवार में रह रहा है या वन में। ऐसा साधक सदैव प्रसन्नचित, निर्भय और अविचल रहता है। इस स्थिति को प्राप्त साधक ही समाधि के योग्य हैं।
तप का अर्थ है दु: ख व कष्टों में भी आनन्द का अनुभव करना । फिर कोई सच्चा साधक क्यों दु:ख व कष्टों से दूर भागेगा।
मनुष्य के लिये निष्क्रिय बैठना किसी भी दृष्टि से उत्तम नहीं है। मनुष्य को सदैव सजग व सक्रिय होकर जीवन व्यतीत करना चाहिये।
......आमोद कुमार पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान
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6 comments:
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