Thursday, May 13, 2010

जहाँ सत्य कहनेवालों के सीस उतारे जायें.......

एक बुध्दिमान पिता अपने लड़कों को समझाया करते हैं कि बेटा, विद्या सीखो, संसार के धन-धाम पर भरोसा न रक्खो, तुम्हारा अधिकार तुम्हारे देश के बाहर काम नहीं दे सकता और धन के चले जाने का सदा डर रहता है चाहे उसे एक बारगी चोर ले जाय या धीरे-धीरे खर्च हो जाय परन्तु विद्या धन का अटूट स्रोत है और यदि कोई विद्वान निर्धान हो जाय तो भी दु:खी न होगा क्योंकि उसके पास विद्यारूपी द्रव्य मौजूद है। सन्मार्ग पर चलते हुए अगर लोग बुरा कहें तो यह उससे अच्छा है कि कुमार्ग पर चलते हुए लोग तुम्हारी प्रशंसा करें , के चक्कर में भी नहीं पड़ना हैं ,हमेशा सन्मार्ग प़र ही चलना हैं !

कोई काम अगर नहीं हैं तो जाकर दिनकर जी की कविता पढ़े !शत्रु को कभी दुर्बल न समझना चाहिये।


समर निंद्य है धर्मराज, पर,
कहो, शान्ति वह क्या है,
जो अनीति पर स्थित होकर भी
बनी हुई सरला है?
सुख-समृद्धि क विपुल कोष
संचित कर कल, बल, छल से,
किसी क्षुधित क ग्रास छीन,
धन लूट किसी निर्बल से।
सब समेट, प्रहरी बिठला कर
कहती कुछ मत बोलो,
शान्ति-सुधा बह रही, न इसमें
गरल क्रान्ति का घोलो।
हिलो-डुलो मत, हृदय-रक्त
अपना मुझको पीने दो,
अचल रहे साम्रज्य शान्ति का,
जियो और जीने दो।
सच है, सत्ता सिमट-सिमट
जिनके हाथों में आयी,
शान्तिभक्त वे साधु पुरुष
क्यों चाहें कभी लड़ाई?
सुख का सम्यक्-रूप विभाजन
जहाँ नीति से, नय से
संभव नहीं; अशान्ति दबी हो
जहाँ खड्ग के भय से,
जहाँ पालते हों अनीति-पद्धति
को सत्ताधारी,
जहाँ सुत्रधर हों समाज के
अन्यायी, अविचारी;
समय की प्रवाह नहीं हैं , आँधी तूफ़ान की तरह चलते जाना हैं , परिणाम की चिंता नहीं करना हैं !
नीतियुक्त प्रस्ताव सन्धि के
जहाँ न आदर पायें;
जहाँ सत्य कहनेवालों के
सीस उतारे जायें;
जहाँ खड्ग-बल एकमात्र
आधार बने शासन का;
दबे क्रोध से भभक रहा हो
हृदय जहाँ जन-जन का;
सहते-सहते अनय जहाँ
मर रहा मनुज का मन हो;
समझ कापुरुष अपने को
धिक्कार रहा जन-जन हो;
अहंकार के साथ घृणा का
जहाँ द्वन्द्व हो जारी;
ऊपर शान्ति, तलातल में
हो छिटक रही चिनगारी;
आगामी विस्फोट काल के
मुख पर दमक रहा हो;
इंगित में अंगार विवश
भावों के चमक रहा हो;
पढ कर भी संकेत सजग हों
किन्तु, न सत्ताधारी;
दुर्मति और अनल में दें
आहुतियाँ बारी-बारी;

कभी नये शोषण से, कभी
उपेक्षा, कभी दमन से,
अपमानों से कभी, कभी
शर-वेधक व्यंग्य-वचन से।

दबे हुए आवेग वहाँ यदि
उबल किसी दिन फूटें,
संयम छोड़, काल बन मानव
अन्यायी पर टूटें;
कहो, कौन दायी होगा
उस दारुण जगद्दहन का
अहंकार य घृणा? कौन
दोषी होगा उस रण का?
उपरोक्त कविता के कवि श्री रामधारी सिंह "दिनकर" ....कुरुक्षेत्र .....तृतीय सर्ग

जहाँ सत्य कहनेवालों के सीस उतारे जायेंगे तो फिर से एक नया ईतिहास बनेंगे !!!!!!!
......आमोद कुमार

पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

2 comments:

Anonymous said...

उत्कृष्ट विचार आमोद जी.

Unknown said...

JAI HO SIR JEE KI