Monday, May 31, 2010

आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ ..........

एक दिन की बात हैं  ,जैसे ही रात में पिताजी घर आये माँ से बोले जल्दी से खाना दीजिये , माँ ने कहा क्या बात हैं आपके साथ हमेशा से विश्वासघात कुछ लोग करते आ रहे हैं और अभी भी किये हैं , और तब भी आप इतना खुश हैं , पिताजी ने माँ से कहा अरे आप क्या बात करती हैं , विश्वासघात किसी ने हमारे साथ किया हैं हमने नहीं , इस लिये आज तो मैं और भी खुश हूँ की किसी की दी हुई प्रतिष्ठा से तो हमको उस व्यक्ति का गुलाम बनकर जीना पड़ता , इस लिये आप भी खुश हो जाईये ... हम कमसे काम गुलाम बनने से तो बचे . हम भी सीढ़ी के पास से सुन रहे थे ,मेरा भी मन पिताजी का जबाब सुनकर खुश हो गया ........
हम हमेशा किसी भी गल्ती में अपने आपको ही भगवान के सामने दोषी ठहराते हैं की जरूर हम कोई पाप किये होंगे तभी तो जो चीज चाहते हैं नहीं मिलता हैं ...लेकिन जब भी सोंचने बैठते हैं तो पता ही नहीं चलता हैं कि आखिर ऐसा कौन सा अपराध हम किये हैं भाई समझ में ही नहीं आता हैं , जो लोग ना जाने कितने सारे भयंकर नरसंघार के प्रणेता हैं, हत्या, अपराध, अपहरण, बलात्कार जिनके लिये बहुत ही आम बात हैं , वे लोग जनता के रहबर बने घूम रहे हैं , और मेरे जैसा आदमी बैठकर कबीरदास जी की कही बातो प़र अपने अन्दर अपनी ही बुराई तलाशते रहते हैं ....But I think Time is Over ......हमने ऐसा कोई भी छोटी या बड़ी गलती नहीं की हैं की इतना गहन चिंतन करे ...हां एक गल्ती

की हैं जिसको शायद पुरा जीवन करते रहूँगा ... आदमी भी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ , जिसकी सजा निर्दयी मनुष्य लोग हमें देते हैं .....और जो मनुष्य हैं ही नहीं उनकी बात करना भी बेकार !
बस यही अपराध मैं, हर बार करता हूँ

आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ


एक खिलौना बन गया दुनिया के मेले में
कोई खेले भीड़ में ,कोई अकेले में
मुस्कुरा कर भेंट हर स्वीकार करता हूँ
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ


हूँ बहुत नादान करता हूँ ये नादानी
बेच कर खुशियाँ ,खरीदूं आँख का पानी
हाथ खाली हैं मगर, व्यापार करता हूँ
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ


मैं बसाना चाहता हूँ ,स्वर्ग धरती प़र
आदमी जिस में रहे, बस आदमी बन कर
उस नगर की हर गली ,तैयार करता हूँ
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ .....और करता रहूँगा आजीवन !!!!!!
सब नियति का खेल हैं ...यह जो एक विराट खेल चल रहा है,उसमें हमारी स्थिति बहुत गौण और दयनीय है। बिल्कुल शतरंज के मोहरों के जैसे जहाँ खेल खेलने वालों की इच्छाओं के हम सिर्फ साधन मात्र हैं। इस बात का ज्ञान उसे भी है,जो ये खेल खेल रहा हैं। और उसे यह भी पता है कि यदि हम यहाँ केवल कष्ट ही कष्ट पाते रहे तो बहुत जल्द ही थककर बैठ जाएंगें या फिर मैदान छोडकर भाग जाएंगें। इसलिए हमारे उत्साह को बनाए रखने के लिए प्रलोभन के रूप में समय समय पर कुछ न कुछ थोडा बहुत सुख भी हमें दे दिया जाता है। प्रलोभन के चक्कर में हम पड़ते भी नहीं हैं , क्योंकि हम जानते हैं , जो खुद सब कुछ रहते हुए भिखारी हैं , हमें क्या दे सकता हैं ?
......आमोद कुमार,
 पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

Sunday, May 30, 2010

मेरी नजरो में , निर्दयी मनुष्य का ही दूसरा नाम राक्षस हैं .......

मेरी नजरो में , निर्दयी मनुष्य का ही दूसरा नाम राक्षस हैं ....... जो मनुष्य मानवीय व्यवहार का हैं वह मनुष्य हैं और जो मनुष्य अमानवीय व्यवहार का हैं वह राक्षस हैं !यहाँ कुछ मनुष्य बिल्कुल राक्षस बने हुए और इतना बड़ा राक्षस की पुछिये मत , शायद राक्षस जाति भी इतनी गई गुजरी तो नहीं होगी.........
श्रीमद् भगवदगीता – ग्यारहवाँ अध्याय का माहात्म्य
श्री महादेवजी कहते हैं – प्रिये ! गीता के वर्णन से सम्बन्ध रखने वाली कथा और विश्वरूप अध्याय के पावन माहात्म्य को श्रवण करो। विशाल नेत्रों वाली पार्वती ! इस अध्याय के माहात्म्य का पूरा-पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता। इसके सम्बन्ध में सहस्रों कथाएँ हैं। उनमें से एक यहाँ कही जाती है। प्रणीता नदी के तट पर मेघंकर नाम से विख्यात एक बहुत बड़ा नगर है। उसके प्राकार (चारदीवारी) और गोपुर (द्वार) बहुत ऊँचे हैं। वहाँ बड़ी-बड़ी विश्रामशालाएँ हैं, जिनमें सोने के खम्भे शोभा दे रहे हैं। उस नगर में श्रीमान, सुखी, शान्त, सदाचारी तथा जितेन्द्रिय मनुष्यों का निवास है। वहाँ हाथ में शारंग नामक धनुष धारण करने वाले जगदीश्वर भगवान विष्णु विराजमान हैं। वे परब्रह्म के साकार स्वरूप हैं, संसार के नेत्रों को जीवन प्रदान करने वाले हैं। उनका गौरवपूर्ण श्रीविग्रह भगवती लक्ष्मी के नेत्र-कमलों द्वारा पूजित होता है। भगवान की वह झाँकी वामन-अवतार की है। मेघ के समान उनका श्यामवर्ण तथा कोमल आकृति है। वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न शोभा पाता है। वे कमल और वनमाला से सुशोभित हैं। अनेक प्रकार के आभूषणों से सुशोभित हो भगवान वामन रत्नयुक्त समुद्र के सदृश जान पड़ते हैं। पीताम्बर से उनके श्याम विग्रह की कान्ति ऐसी प्रतीत होती है, मानो चमकती हुई बिजली से घिरा हुआ स्निग्ध मेघ शोभा पा रहा हो। उन भगवान वामन का दर्शन करके जीव जन्म और संसार के बन्धन से मुक्त हो जाता है। उस नगर में मेखला नामक महान तीर्थ है, जिसमें स्नान करके मनुष्य शाश्वत वैकुण्ठधाम को प्राप्त होता है। वहाँ जगत के स्वामी करुणासागर भगवान नृसिंह का दर्शन करने से मनुष्य के सात जन्मों के किये हुए घोर पाप से छुटकारा पा जाता है। जो मनुष्य मेखला में गणेशजी का दर्शन करता है, वह सदा दुस्तर विघ्नों से पार हो जाता है।
उसी मेघंकर नगर में कोई श्रेष्ठ ब्राह्मण थे, जो ब्रह्मचर्यपरायण, ममता और अहंकार से रहित, वेद शास्त्रों में प्रवीण, जितेन्द्रिय तथा भगवान वासुदेव के शरणागत थे। उनका नाम सुनन्द था। प्रिये ! वे शारंग धनुष धारण करने वाले भगवान के पास गीता के ग्यारहवें अध्याय-विश्वरूपदर्शनयोग का पाठ किया करते थे। उस अध्याय के प्रभाव से उन्हें ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हो गयी थी। परमानन्द-संदोह से पूर्ण उत्तम ज्ञानमयी समाधी के द्वारा इन्द्रियों के अन्तर्मुख हो जाने के कारण वे निश्चल स्थिति को प्राप्त हो गये थे और सदा जीवन्मुक्त योगी की स्थिति में रहते थे। एक समय जब बृहस्पति सिंह राशि पर स्थित थे, महायोगी सुनन्द ने गोदावरी तीर्थ की यात्रा आरम्भ की। वे क्रमशः विरजतीर्थ, तारातीर्थ, कपिलासंगम, अष्टतीर्थ, कपिलाद्वार, नृसिंहवन, अम्बिकापुरी तथा करस्थानपुर आदि क्षेत्रों में स्नान और दर्शन करते हुए विवादमण्डप नामक नगर में आये। वहाँ उन्होंने प्रत्येक घर में जाकर अपने ठहरने के लिए स्थान माँगा, परन्तु कहीं भी उन्हें स्थान नहीं मिला। अन्त में गाँव के मुखिया ने उन्हें बहुत बड़ी धर्मशाला दिखा दी। ब्राह्मण ने साथियों सहित उसके भीतर जाकर रात में निवास किया। सबेरा होने पर उन्होंने अपने को तो धर्मशाला के बाहर पाया, किंतु उनके और साथी नहीं दिखाई दिये। वे उन्हें खोजने के लिए चले, इतने में ही ग्रामपाल (मुखिये) से उनकी भेंट हो गयी। ग्रामपाल ने कहाः "मुनिश्रेष्ठ ! तुम सब प्रकार से दीर्घायु जान पड़ते हो। सौभाग्यशाली तथा पुण्यवान पुरुषों में तुम सबसे पवित्र हो। तुम्हारे भीतर कोई लोकोत्तर प्रभाव विद्यमान है। तुम्हारे साथी कहाँ गये? कैसे इस भवन से बाहर हुए? इसका पता लगाओ। मैं तुम्हारे सामने इतना ही कहता हूँ कि तुम्हारे जैसा तपस्वी मुझे दूसरा कोई दिखाई नहीं देता। विप्रवर ! तुम्हें किस महामन्त्र का ज्ञान है? किस विद्या का आश्रय लेते हो तथा किस देवता की दया से तुम्हे अलौकिक शक्ति प्राप्त हो गयी हैं? भगवन ! कृपा करके इस गाँव में रहो। मैं तुम्हारी सब प्रकार से सेवा-सुश्रूषा करूँगा।
यह कहकर ग्रामपाल ने मुनीश्वर सुनन्द को अपने गाँव में ठहरा लिया। वह दिन रात बड़ी भक्ति से उसकी सेवा टहल करने लगा। जब सात-आठ दिन बीत गये, तब एक दिन प्रातःकाल आकर वह बहुत दुःखी हो महात्मा के सामने रोने लगा और बोलाः "हाय ! आज रात में राक्षस ने मुझ भाग्यहीन को बेटे को चबा लिया है। मेरा पुत्र बड़ा ही गुणवान और भक्तिमान था।" ग्रामपाल के इस प्रकार कहने पर योगी सुनन्द ने पूछाः "कहाँ है वह राक्षस? और किस प्रकार उसने तुम्हारे पुत्र का भक्षण किया है?"
ग्रामपाल बोलाः ब्रह्मण ! इस नगर में एक बड़ा भयंकर नरभक्षी राक्षस रहता है। वह प्रतिदिन आकर इस नगर में मनुष्यों को खा लिया करता था। तब एक दिन समस्त नगरवासियों ने मिलकर उससे प्रार्थना कीः "राक्षस ! तुम हम सब लोगों की रक्षा करो। हम तुम्हारे लिए भोजन की व्यवस्था किये देते हैं। यहाँ बाहर के जो पथिक रात में आकर नींद लेंगे, उनको खा जाना।" इस प्रकार नागरिक मनुष्यों ने गाँव के (मुझ) मुखिया द्वारा इस धर्मशाला में भेजे हुए पथिकों को ही राक्षस का आहार निश्चित किया। अपने प्राणों की रक्षा करने के लिए उन्हें ऐसा करना पड़ा। आप भी अन्य राहगीरों के साथ इस घर में आकर सोये थे, किंतु राक्षस ने उन सब को तो खा लिया, केवल तुम्हें छोड़ दिया है। द्विजोतम ! तुममें ऐसा क्या प्रभाव है, इस बात को तुम्हीं जानते हो। इस समय मेरे पुत्र का एक मित्र आया था, किंतु मैं उसे पहचान न सका। वह मेरे पुत्र को बहुत ही प्रिय था, किंतु अन्य राहगीरों के साथ उसे भी मैंने उसी धर्मशाला में भेज दिया। मेरे पुत्र ने जब सुना कि मेरा मित्र भी उसमें प्रवेश कर गया है, तब वह उसे वहाँ से ले आने के लिए गया, परन्तु राक्षस ने उसे भी खा लिया। आज सवेरे मैंने बहुत दुःखी होकर उस पिशाच से पूछाः "ओ दुष्टात्मन् ! तूने रात में मेरे पुत्र को भी खा लिया। तेरे पेट में पड़ा हुआ मेरा पुत्र जिससे जीवित हो सके, ऐसा कोई उपाय यदि हो तो बता।"
राक्षस ने कहाः ग्रामपाल ! धर्मशाला के भीतर घुसे हुए तुम्हारे पुत्र को न जानने के कारण मैंने भक्षण किया है। अन्य पथिकों के साथ तुम्हारा पुत्र भी अनजाने में ही मेरा ग्रास बन गया है। वह मेरे उदर में जिस प्रकार जीवित और रक्षित रह सकता है, वह उपाय स्वयं विधाता ने ही कर दिया है। जो ब्राह्मण सदा गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करता हो, उसके प्रभाव से मेरी मुक्ति होगी और मरे हुओं को पुनः जीवन प्राप्त होगा। यहाँ कोई ब्राह्मण रहते हैं, जिनको मैंने एक दिन धर्मशाला से बाहर कर दिया था। वे निरन्तर गीता के ग्यारहवें अध्याय का जप किया करते हैं। इस अध्याय के मंत्र से सात बार अभिमन्त्रित करके यदि वे मेरे ऊपर जल का छींटा दें तो निःसंदेह मेरा शाप से उद्धार हो जाएगा। इस प्रकार उस राक्षस का संदेश पाकर मैं तुम्हारे निकट आया हूँ।
ग्रामपाल बोलाः ब्रह्मण ! पहले इस गाँव में कोई किसान ब्राह्मण रहता था। एक दिन वह अगहनी के खेत की क्यारियों की रक्षा करने में लगा था। वहाँ से थोड़ी ही दूर पर एक बहुत बड़ा गिद्ध किसी राही को मार कर खा रहा था। उसी समय एक तपस्वी कहीं से आ निकले, जो उस राही को लिए दूर से ही दया दिखाते आ रहे थे। गिद्ध उस राही को खाकर आकाश में उड़ गया। तब उस तपस्वी ने उस किसान से कहाः "ओ दुष्ट हलवाहे ! तुझे धिक्कार है ! तू बड़ा ही कठोर और निर्दयी है। दूसरे की रक्षा से मुँह मोड़कर केवल पेट पालने के धंधे में लगा है। तेरा जीवन नष्टप्राय है। अरे ! शक्ति होते हुए भी जो चोर, दाढ़वाले जीव, सर्प, शत्रु, अग्नि, विष, जल, गीध, राक्षस, भूत तथा बेताल आदि के द्वारा घायल हुए मनुष्यों की उपेक्षा करता है, वह उनके वध का फल पाता है। जो शक्तिशाली होकर भी चोर आदि के चंगुल में फँसे हुए ब्राह्मण को छुड़ाने की चेष्टा नहीं करता, वह घोर नरक में पड़ता है और पुनः भेड़िये की योनि में जन्म लेता है। जो वन में मारे जाते हुए तथा गिद्ध और व्याघ्र की दृष्टि में पड़े हुए जीव की रक्षा के लिए 'छोड़ो....छोड़ो...' की पुकार करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है। जो मनुष्य गौओं की रक्षा के लिए व्याघ्र, भील तथा दुष्ट राजाओं के हाथ से मारे जाते हैं, वे भगवान विष्णु के परम पद को प्राप्त होते हैं जो योगियों के लिए भी दुर्लभ है। सहस्र अश्वमेध और सौ वाजपेय यज्ञ मिलकर शरणागत-रक्षा की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं हो सकते। दीन तथा भयभीत जीव की उपेक्षा करने से पुण्यवान पुरुष भी समय आने पर कुम्भीपाक नामक नरक में पकाया जाता है। तूने दुष्ट गिद्ध के द्वारा खाये जाते हुए राही को देखकर उसे बचाने में समर्थ होते हुए भी जो उसकी रक्षा नहीं की, इससे तू निर्दयी जान पड़ता है, अतः तू राक्षस हो जा।
हलवाहा बोलाः महात्मन् ! मैं यहाँ उपस्थित अवश्य था, किंतु मेरे नेत्र बहुत देर से खेत की रक्षा में लगे थे, अतः पास होने पर भी गिद्ध के द्वारा मारे जाते हुए इस मनुष्य को मैं नहीं जान सका। अतः मुझ दीन पर आपको अनुग्रह करना चाहिए।
तपस्वी ब्राह्मण ने कहाः जो प्रतिदिन गीता के ग्यारहवें अध्याय का जप करता है, उस मनुष्य के द्वारा अभिमन्त्रित जल जब तुम्हारे मस्तक पर पड़ेगा, उस समय तुम्हे शाप से छुटकारा मिल जायेगा।
यह कहकर तपस्वी ब्राह्मण चले गये और वह हलवाहा राक्षस हो गया। अतः द्विजश्रेष्ठ ! तुम चलो और ग्यारहवें अध्याय से तीर्थ के जल को अभिमन्त्रित करो फिल अपने ही हाथ से उस राक्षस के मस्तक पर उसे छिड़क दो।
ग्रामपाल की यह सारी प्रार्थना सुनकर ब्राह्मण के हृदय में करुणा भर आयी। वे 'बहुत अच्छा' कहकर उसके साथ राक्षस के निकट गये। वे ब्राह्मण योगी थे। उन्होंने विश्वरूपदर्शन नामक ग्यारहवें अध्याय से जल अभिमन्त्रित करके उस राक्षस के मस्तक पर डाला। गीता के ग्यारहवें अध्याय के प्रभाव से वह शाप से मुक्त हो गया। उसने राक्षस-देह का परित्याग करके चतुर्भुजरूप धारण कर लिया तथा उसने जिन सहस्रों प्राणियों का भक्षण किया था, वे भी शंख, चक्र और गदा धारण किये हुए चतुर्भुजरूप हो गये। तत्पश्चात् वे सभी विमान पर आरूढ़ हुए। इतने में ही ग्रामपाल ने राक्षस से कहाः "निशाचर ! मेरा पुत्र कौन है? उसे दिखाओ।" उसके यों कहने पर दिव्य बुद्धिवाले राक्षस ने कहाः 'ये जो तमाल के समान श्याम, चार भुजाधारी, माणिक्यमय मुकुट से सुशोभित तथा दिव्य मणियों के बने हुए कुण्डलों से अलंकृत हैं, हार पहनने के कारण जिनके कन्धे मनोहर प्रतीत होते हैं, जो सोने के भुजबंदों से विभूषित, कमल के समान नेत्रवाले, स्निग्धरूप तथा हाथ में कमल लिए हुए हैं और दिव्य विमान पर बैठकर देवत्व के प्राप्त हो चुके हैं, इन्हीं को अपना पुत्र समझो।' यह सुनकर ग्रामपाल ने उसी रूप में अपने पुत्र को देखा और उसे अपने घर ले जाना चाहा। यह देख उसका पुत्र हँस पड़ा और इस प्रकार कहने लगा।

पुत्र बोलाः ग्रामपाल ! कई बार तुम भी मेरे पुत्र हो चुके हो। पहले मैं तुम्हारा पुत्र था, किंतु अब देवता हो गया हूँ। इन ब्राह्मण देवता के प्रसाद से वैकुण्ठधाम को जाऊँगा। देखो, यह निशाचर भी चतुर्भुजरूप को प्राप्त हो गया। ग्यारहवें अध्याय के माहात्म्य से यह सब लोगों के साथ श्रीविष्णुधाम को जा रहा है। अतः तुम भी इन ब्राह्मणदेव से गीता के ग्यारहवें अध्याय का अध्ययन करो और निरन्तर उसका जप करते रहो। इसमें सन्देह नहीं कि तुम्हारी भी ऐसी ही उत्तम गति होगी। तात ! मनुष्यों के लिए साधु पुरुषों का संग सर्वथा दुर्लभ है। वह भी इस समय तुम्हें प्राप्त है। अतः अपना अभीष्ट सिद्ध करो। धन, भोग, दान, यज्ञ, तपस्या और पूर्वकर्मों से क्या लेना है? विश्वरूपाध्याय के पाठ से ही परम कल्याण की प्राप्त हो जाती है।
पूर्णानन्दसंदोहस्वरूप श्रीकृष्ण नामक ब्रह्म के मुख से कुरुक्षेत्र में अपने मित्र अर्जुन के प्रति जो अमृतमय उपदेश निकला था, वही श्रीविष्णु का परम तात्त्विक रूप है। तुम उसी का चिन्तन करो। वह मोक्ष के लिए प्रसिद्ध रसायन। संसार-भय से डरे हुए मनुष्यों की आधि-व्याधि का विनाशक तथा अनेक जन्म के दुःखों का नाश करने वाला है। मैं उसके सिवा दूसरे किसी साधन को ऐसा नहीं देखता, अतः उसी का अभ्यास करो।
श्री महादेव कहते हैं – यह कहकर वह सबके साथ श्रीविष्णु के परम धाम को चला गया। तब ग्रामपाल ने ब्राह्मण के मुख से उस अध्याय को पढ़ा फिर वे दोनों ही उसके माहात्म्य से विष्णुधाम को चले गये। पार्वती ! इस प्रकार तुम्हें ग्यारहवें अध्याय की माहात्म्य की कथा सुनायी है। इसके श्रवणमात्र से महान पातकों का नाश हो जाता है।
......मोकुमा ,
पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

Saturday, May 29, 2010

बच्चों में समझ और संस्कार अभिभावक ही पैदा कर सकते हैं !!!!!!!

किसी भी बच्चे को समाज से जुड़ कर चलने की प्रेरणा अभिभावकगण ही दे सकते हैं। अगर यह दुनिया खुशनुमा होगी, तो बच्चों के चेहरे पर मुसकान खिली रहेगी। बच्चे कभी एक-दूसरे के हाथों में हाथ डाले खेलते हैं, तो कभी पतंग उड़ाते हैं, कभी गुब्बारों से मन बहलाते हैं, तो कभी तोते और पिल्ले के साथ खेलते हैं।  इनकी इसी मुस्कान को बनाए रखने के लिए अभिभावकगण को आगे आना चाहिए।
अभिभावक ही बच्चों को संस्कार दे सकते है। बच्चों का समग्र विकास तब होगा, जब अभिभावक अपने पुत्र पुत्रियों में संस्कार का संचय स्वंम करेंगे |
प्रत्येक अभिभावक का यह परम पुनीत धर्म र्कत्तव्य है कि बालक को जन्म देने के साथ-साथ आई हुई जिम्मेदारियों में से भोजन, वस्त्र आदि की शारीरिक आवश्यकताओं की की पूर्ति होने प़र उनकी अच्छी शिक्षा का प्रबंध करे !
आदर्श देना, संस्कारित करना और शिक्षाएं देना ये काम तो हर समाज के अभिभावक करते हैं. शैली हर एक की अलग अलग होती है. क्या सिखा रहे हो ये तो महत्व का है ही कैसे सिखा रहे हो वह भी कम महत्व का नही है.
बहुत से अभिभावक मित्रों का सा बर्ताव रखते हैं – जैसे वो और उनके बच्चे एक ही टीम हैं जिसके वो कप्तान हैं. मौका आने पर छोटी-मोटी जिम्मेदारियों के बहाने कप्तानी का भार छोटों पर डालना और उन से करवा कर सिखाना – आदर्श और संस्कार एक क्रियात्मक तरीके से एक प्रक्रिया के माध्यम से देना. फ़ंडे पिलाना या पास बैठा कर भाषण या उपदेश झिलवाना नहीं. ऐसे मे दिए गए संस्कार ज्यादा टिकाऊ साबित होते हैं. क्योंकि आप खुद एक उदाहरण प्रस्तुत करते हो और व्यव्हारिक पक्ष मजबूत रहता है.
अपने बच्चो को हमेशा बताये की अहिंसा एक सुंदर आदर्श है लेकिन आत्मरक्षा के गुर भी सिखाये . आत्मरक्षा के बिना अहिंसा एक सुंदर आदर्श की अति है , इस बात को भी हमेशा ध्यान में रखे |
......आमोद कुमार,
 पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

Friday, May 28, 2010

देश के विकास के लिये युवावर्ग अतीत की अच्छाइयों को भी स्वीकार करना सीखे ...

आज विश्व की सभी संस्*तियों में विघटन चल रहा है। भारतीय संस्*ति भी इससे अछूती नहीं है। परिवर्तन प्रत्येक संस्*ति की अनिवार्य आवश्यकता है। लेकिन इतना परिवर्तन भी तो हानिकारक है कि जिससे आफ नैतिक मूल्य ही समूल नष्ट होने लगे। यही हुआ है आज के वर्तमान भारत में। वर्तमान परिवेश में आधुनिकता के नाम पर हमारी संस्*ति में पाश्चात्य प्रभाव को ग्रहण किया जा रहा है। अर्थात् भारतीय समाज में आधुनिकीकरण के नाम पर पाश्चात्यीकरण हो रहा है। इस क्रम में समाज की अनेक जड परम्पराओं को उखाड फेंका और नवीन मूल्य स्थापित होने लगे। इन नये मूल्यों में अधिकांशतः पश्चिम के जीवन मूल्यों की झलक देखने को मिली। यहीं से मूल्य संघर्ष प्रारम्भ हुआ।
युवा वर्ग जिम्मेदारियों से कतराता है इसलिये ऐसे रिश्ते का निर्माण करता है। जहाँ तक भारतीय परिवेश का प्रश्न है यह व्यवस्था न तो युवा वर्ग के लिए और न भारतीयों के लिए श्रेष्ठ है। पश्चिम की इस दूषित व्यवस्था ने न केवल भारतीय समाज को दूषित किया है अपितु भटकाया भी है। जहाँ तक भारतीय विवाह संस्कार का प्रश्न है वह जग-जाहिर है। माना कि आज देश और दुनिया बदल रही है, इसके साथ-साथ मूल्य भी बदल रहे हैं, मगर इसका अर्थ यह नहीं है कि हम स्वतंत्र्ता के नाम पर हमारी सनातन परम्पराओं एवं नैतिक मूल्यों को तिलांजलि दें।
वर्तमान परिवेश में समय के साथ-साथ व्यवस्थित विवाहों के स्थान पर आज समाज में प्रेम विवाह होने लगे हैं। वैश्वीकरण व पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव के कारण एक नई शुरुआत होती नजर आ रही है। आज बडे-बडे महानगरों में युवक-युवतियों ने विवाह जैसी पुरानी मान्यता को छोडकर एक नई जीवन शैली की शुरुआत की है। वे एक-दूसरे के साथ बिना विवाह किए साथ-साथ रहने लगे हैं। इस आयातित प्रणाली को अपनाने में युवक-युवतियों ने अपने-अपने तर्क भी दिये हैं। इसके पक्षधरों का कहना है कि इस नये कानून में स्वतंत्र्ता ही स्वतंत्र्ता है। किसी प्रकार का कोई उत्तरदायित्व या जवाबदेही नहीं है। युवकों के विचारानुरूप ऐसा करने से वे दहेज उत्पीडन जैसे कानूनी दाँवपेंच जिनका आज महिलाएँ ज्यादातर दुरुपयोग कर रही हैं, उस प्रपंच से बच जाएँगे। इसी विषय पर युवतियों की मान्यता है कि इस तरह प्रणाली अपनाने से वे जब तक लडके के साथ रहना चाहती है, रहेगी। तलाक लेने की लम्बी व उबाऊ प्रक्रिया में से होकर गुजरने की उसे जरूरत नहीं पडेगी।
भाषा तभी विकसित हो सकती है जबकि इसका सूत्र् जनता के हाथ में दे दिया जाये। पाठ्यपुस्तकों में काम ली जाने वाली भाषा इतनी क्लिष्ट होती है कि अच्छे खासे हिन्दी के जानकार को भी समझ में नहीं आती है। इसी कारण तकनीकी क्षेत्र् के विद्यार्थी हिन्दी के बजाय अंग्रेजी की पुस्तकों को पढना श्रेष्ठ मानते हैं। इसी प्रकार बैंक व दफ्तरों आदि में आवेदन के साथ प्रारूप ऐसी हिन्दी में बनाये जाते हैं कि कोई समझ नहीं पाता है। ऐसी हिन्दी ने हिन्दी को नुकसान पहुँचाया है। भाषा कभी भी स्थाई नहीं होती है तथा वह लोक द्वारा निरन्तर परिवर्तित और समृद्ध होती है।
अभी जरूरत हैं देश के सभी युवा वर्ग को कि नक्सलवादी नक्सली माओवादियो संगठनों  के खिलाफ एकजुट होकर ख़त्म करना , ताकि देश विकास की ओर बढे !

समाज को जात पात के आधार प़र बाटकर लम्बे समय तक शासन करनेवाले नेतागण से दूर रहे, वे देशहित और जनहित का कार्य कैसे करते हैं सभी लोगो ने देखा हैं , वैसे लोगो के कारण सभी अच्छे लोग को भी लोग गलत श्रेणी में ही देखते हैं !

......आमो कुमार,

पालिपुत्र , बिहार , हिंदुस्ता

Thursday, May 27, 2010

अच्छे अच्छे लोगो की अच्छी अच्छी बातें हमेशा ध्यान में रखे ........

 यह संसार कर्म की कसौटी है। यहाँ मनुष्य की पहचान उसके कर्मों से होती है।
दुष्ट चिंतन आग में खेलने की तरह है।
जो अपनी राह बनाता है वह सफलता के शिखर पर चढ़ता है; पर जो औरों की राह ताकता है सफलता उसकी मुँह ताकती रहती है।
जीवनोद्देश्य की खोज ही सबसे बड़ा सौभाग्य है। उसे और कहीं ढूँढ़ने की अपेक्षा अपने हृदय में ढूँढ़ना चाहिए।
वह मनुष्य विवेकवान्‌ है, जो भविष्य से न तो आशा रखता है और न भयभीत ही होता है।
बुद्धिमान्‌ बनने का तरीका यह है कि आज हम जितना जानते हैं भविष्य में उससे अधिक जानने के लिए प्रयत्नशील रहें।
जीवन उसी का धन्य है जो अनेकों को प्रकाश दे। प्रभाव उसी का धन्य है जिसके द्वारा अनेकों में आशा जाग्रत हो।
तुम्हारा प्रत्येक छल सत्य के उस स्वच्छ प्रकाश में एक बाधा है जिसे तुम्हारे द्वारा उसी प्रकार प्रकाशित होना चाहिए जैसे साफ शीशे के द्वारा सूर्य का प्रकाश प्रकाशित होता है।

मनुष्य जीवन का पूरा विकास गलत स्थानों, गलत विचारों और गलत दृष्टिकोणों से मन और शरीर को बचाकर उचित मार्ग पर आरूढ़ कराने से होता है।
जीवन एक परख और कसौटी है जिसमें अपनी सामथ्र्य का परिचय देने पर ही कुछ पा सकना संभव होता है।
सेवा का मार्ग ज्ञान, तप, योग आदि के मार्ग से भी ऊँचा है।
अधिक इच्छाएँ प्रसन्नता की सबसे बड़ी शत्रु हैं।
मस्तिष्क में जिस प्रकार के विचार भरे रहते हैं वस्तुत: उसका संग्रह ही सच्ची परिस्थिति है। उसी के प्रभाव से जीवन की दिशाएँ बनती और मुड़ती रहती हैं।

संघर्ष ही जीवन है। संघर्ष से बचे रह सकना किसी के लिए भी संभव नहीं।
अपने हित की अपेक्षा जब परहित को अधिक महत्त्व मिलेगा तभी सच्चा सतयुग प्रकट होगा।
सत्य, प्रेम और न्याय को आचरण में प्रमुख स्थान देने वाला नर ही नारायण को अति प्रिय है।
ज्ञान और आचरण में बोध और विवेक में जो सामञ्जस्य पैदा कर सके उसे ही विद्या कहते हैं।
संसार में हर वस्तु में अच्छे और बुरे दो पहलू हैं, जो अच्छा पहलू देखते हैं वे अच्छाई और जिन्हें केवल बुरा पहलू देखना आता है वह बुराई संग्रह करते हैं।
सलाह सबकी सुनो पर करो वह जिसके लिए तुम्हारा साहस और विवेक समर्थन करे।
फल के लिए प्रयत्न करो, परन्तु दुविधा में खड़े न रह जाओ। कोई भी कार्य ऐसा नहीं जिसे खोज और प्रयत्न से पूर्ण न कर सको।
अपने दोषों की ओर से अनभिज्ञ रहने से बड़ा प्रमाद इस संसार में और कोई नहीं हो सकता।
वही उन्नति कर सकता है, जो स्वयं को उपदेश देता है।
स्वार्थ, अहंकार और लापरवाही की मात्रा बढ़ जाना ही किसी व्यक्ति के पतन का कारण होता है।
अवसर की प्रतीक्षा में मत बैठो। आज का अवसर ही सर्वोत्तम है।
पाप अपने साथ रोग, शोक, पतन और संकट भी लेकर आता है।
ईमानदार होने का अर्थ है-हजार मनकों में अलग चमकने वाला हीरा।
वही जीवित है, जिसका मस्तिष्क ठंडा, रक्त गरम, हृदय कोमल और पुरुषार्थ प्रखर है।
सद्‌गुणों के विकास में किया हुआ कोई भी त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता।
जो आलस्य और कुकर्म से जितना बचता है, वह ईश्वर का उतना ही बड़ा भक्त है।
सत्कर्म की प्रेरणा देने से बढ़कर और कोई पुण्य हो ही नहीं सकता।
नरक कोई स्थान नहीं, संकीर्ण स्वार्थपरता की और निकृष्ट दृष्टिकोण की प्रतिक्रिया मात्र है।
सद्‌भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों से जिनका जीवन जितना ओतप्रोत है, वह ईश्वर के उतना ही निकट है।
असत्‌ से सत्‌ की ओर, अंधकार से आलोक की ओर तथा विनाश से विकास की ओर बढ़ने का नाम ही साधना है।
सच्चाई, ईमानदारी, सज्जनता और सौजन्य जैसे गुणों के बिना कोई मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं हो सकता।
किसी आदर्श के लिए हँसते-हँसते जीवन का उत्सर्ग कर देना सबसे बड़ी बहादुरी है।
उदारता, सेवा, सहानुभूति और मधुरता का व्यवहार ही परमार्थ का सार है।
गायत्री उपासना का अधिकर हर किसी को है। मनुष्य मात्र बिना किसी भेदभाव के उसे कर सकता है।
 भगवान्‌ को घट-घट वासी और न्यायकारी मानकर पापों से हर घड़ी बचते रहना ही सच्ची भक्ति है।
अस्त-व्यस्त रीति से समय गँवाना अपने ही पैरों कुल्हाड़ी मारना है।
 अपने गुण, कर्म, स्वभाव का शोधन और जीवन विकास के उच्च गुणों का अभ्यास करना ही साधना है।
जो टूटे को बनाना, रूठे को मनाना जानता है, वही बुद्धिमान है।
समाज का मार्गदर्शन करना एक गुरुतर दायित्व है, जिसका निर्वाह कर कोई नहीं कर सकता।
नेतृत्व पहले विशुद्ध रूप से सेवा का मार्ग था। एक कष्ट साध्य कार्य जिसे थोड़े से सक्षम व्यक्ति ही कर पाते थे।
सारी शक्तियाँ लोभ, मोह और अहंता के लिए वासना, तृष्णा और प्रदर्शन के लिए नहीं खपनी चाहिए।
निश्चित रूप से ध्वंस सरल होता है और निर्माण कठिन है।
अपने देश का यह दुर्भाग्य है कि आजादी के बाद देश और समाज के लिए नि:स्वार्थ भाव से खपने वाले सृजेताओं की कमी रही है।
उच्चस्तरीय महत्त्वाकांक्षा एक ही है कि अपने को इस स्तर तक सुविस्तृत बनाया जाय कि दूसरों का मार्गदर्शन कर सकना संभव हो सके।
शक्ति उनमें होती है, जिनकी कथनी और करनी एक हो, जो प्रतिपादन करें, उनके पीछे मन, वचन और कर्म का त्रिविध समावेश हो।
व्यक्ति का चिंतन और चरित्र इतना ढीला हो गया है कि स्वार्थ के लिए अनर्थ करने में व्यक्ति चूकता नहीं।
संसार का सबसे बड़ानेता है-सूर्य। वह आजीवन व्रतशील तपस्वी की तरह निरंतर नियमित रूप से अपने सेवा कार्य में संलग्न रहता है।
 नेतृत्व ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान है, क्योंकि वह प्रामाणिकता, उदारता और साहसिकता के बदले खरीदा जाता है।

किसी का अमंगल चाहने पर स्वयं पहले अपना अमंगल होता है।
 महात्मा वह है, जिसके सामान्य शरीर में असामान्य आत्मा निवास करती है।
 जिसका हृदय पवित्र है, उसे अपवित्रता छू तक नहीं सकता।
 स्वर्ग और मुक्ति का द्वार मनुष्य का हृदय ही है।
यथार्थ को समझना ही सत्य है। इसी को विवेक कहते हैं।
 अहंकार के स्थान पर आत्मबल बढ़ाने में लगें, तो समझना चाहिए कि ज्ञान की उपलब्धि हो गयी।
समय को नियमितता के बंधनों में बाँधा जाना चाहिए।
अपनापन ही प्यारा लगता है। यह आत्मीयता जिस पदार्थ अथवा प्राणी के साथ जुड़ जाती है, वह आत्मीय, परम प्रिय लगने लगती है।
चेतना के भावपक्ष को उच्चस्तरीय उत्कृष्टता के साथ एकात्म कर देने को 'योग' कहते हैं।
कुकर्मी से बढ़कर अभागा कोई नहीं, क्योंकि विपत्ति में उसका कोई साथी नहीं रहता। जिसने जीवन में स्नेह, सौजन्य का समुचित समावेश कर लिया, सचमुच वही सबसे बड़ा कलाकार है।
अपने को मनुष्य बनाने का प्रयत्न करो, यदि उसमें सफल हो गये, तो हर काम में सफलता मिलेगी।
जीवन का अर्थ है समय। जो जीवन से प्यार करते हों, वे आलस्य में समय न गँवाएँ।
 जो बच्चों को सिखाते हैं, उन पर बड़े खुद अमल करें, तो यह संसार स्वर्ग बन जाय।
बुराई मनुष्य के बुरे कर्मों की नहीं, वरन्‌ बुरे विचारों की देन होती है।
सब कुछ होने पर भी यदि मनुष्य के पास स्वास्थ्य नहीं, तो समझो उसके पास कुछ है ही नहीं।
 अपनी विकृत आकांक्षाओं से बढ़कर अकल्याणकारी साथी दुनिया में और कोई दूसरा नहीं।
 सत्य एक ऐसी आध्यात्मिक शक्ति है, जो देश, काल, पात्र अथवा परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होती।
सत्य ही वह सार्वकालिक और सार्वदेशिक तथ्य है, जो सूर्य के समान हर स्थान पर समान रूप से चमकता रहता है।
 जो प्रेरणा पाप बनकर अपने लिए भयानक हो उठे, उसका परित्याग कर देना ही उचित है।
 कोई भी साधना कितनी ही ऊँची क्यों न हो, सत्य के बिना सफल नहीं हो सकती।
 उतावला आदमी सफलता के अवसरों को बहुधा हाथ से गँवा ही देता है।
ज्ञान अक्षय है। उसकी प्राप्ति मनुष्य शय्या तक बन पड़े तो भी उस अवसर को हाथ से न जाने देना चाहिए।
अवांछनीय कमाई से बनाई हुई खुशहाली की अपेक्षा ईमानदारी के आधार पर गरीबों जैसा जीवन बनाये रहना कहीं अच्छा है।
आवेश जीवन विकास के मार्ग का भयानक रोड़ा है, जिसको मनुष्य स्वयं ही अपने हाथ अटकाया करता है।
 मनुष्यता सबसे अधिक मूल्यवान्‌ है। उसकी रक्षा करना प्रत्येक जागरूक व्यक्ति का परम कत्र्तव्य है।
ज्ञान ही धन और ज्ञान ही जीवन है। उसके लिए किया गया कोई भी बलिदान व्यर्थ नहींं जाता।
असफलता केवल यह सिद्ध करती है कि सफलता का प्रयास पूरे मन से नहीं हुआ।
गृहस्थ एक तपोवन है, जिसमें संयम, सेवा और सहिष्णुता की साधना करनी पड़ती है।
 असत्य से धन कमाया जा सकता है, पर जीवन का आनन्द, पवित्रता और लक्ष्य नहीं प्राप्त किया जा सकता।
 शालीनता बिना मूल्य मिलती है, पर उससे सब कुछ खरीदा जा सकता है।
मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं, वह उनका निर्माता, नियंत्रणकत्र्ता और स्वामी है।
जिन्हें लम्बी जिन्दगी जीना हो, वे बिना कड़ी भूख लगे कुछ भी न खाने की आदत डालें।
कायर मृत्यु से पूर्व अनेकों बार मर चुकता है, जबकि बहादुर को मरने के दिन ही मरना पड़ता है।
आय से अधिक खर्च करने वाले तिरस्कार सहते और कष्ट भोगते हैं।
 दु:ख का मूल है पाप। पाप का परिणाम है-पतन, दु:ख, कष्ट, कलह और विषाद। यह सब अनीति के अवश्यंभावी परिणाम हैं।
अस्वस्थ मन से उत्पन्न कार्य भी अस्वस्थ होंगे।
आसक्ति संकुचित वृत्ति है।
समान भाव से आत्मीयता पूर्वक कत्र्तव्य-कर्मों का पालन किया जाना मनुष्य का धर्म है।
 पाप की एक शाखा है-असावधानी।
जब तक मनुष्य का लक्ष्य भोग रहेगा, तब तक पाप की जड़ें भी विकसित होती रहेंगी।
मनुष्य को आध्यात्मिक ज्ञान और आत्म-विज्ञान की जानकारी हुए बिना यह संभव नहीं है कि मनुष्य दुष्कर्मों का परित्याग करे।
ईश्वर अर्थात्‌ मानवी गरिमा के अनुरूप अपने को ढालने के लिए विवश करने की व्यवस्था।
मनुष्य बुद्धिमानी का गर्व करता है, पर किस काम की वह बुद्धिमानी-जिससे जीवन की साधारण कला हँस-खेल कर जीने की प्रक्रिया भी हाथ न आए।
जब अंतराल हुलसता है, तो तर्कवादी के कुतर्की विचार भी ठण्डे पड़ जाते हैं।
मनुष्य के भावों में प्रबल रचना शक्ति है, वे अपनी दुनिया आप बसा लेते हैं।
पग-पग पर शिक्षक मौजूद हैं, पर आज सीखना कौन चाहता है?
 इस संसार में अनेक विचार, अनेक आदर्श, अनेक प्रलोभन और अनेक भ्रम भरे पड़े हैं।
पादरी, मौलवी और महंत भी जब तक एक तरह की बात नहीं कहते, तो दो व्यक्तियों में एकमत की आशा की ही कैसे जाए?
जीवन की सफलता के लिए यह नितांत आवश्यक है कि हम विवेकशील और दूरदर्शी बनें।
 विवेकशील व्यक्ति उचित अनुचित पर विचार करता है और अनुचित को किसी भी मूल्य पर स्वीकार नहीं करता।
 धर्मवान्‌ बनने का विशुद्ध अर्थ बुद्धिमान, दूरदर्शी, विवेकशील एवं सुरुचि सम्पन्न बनना ही है।
 मानव जीवन की सफलता का श्रेय जिस महानता पर निर्भर है, उसे एक शब्द में धार्मिकता कह सकते हैं।
मांसाहार मानवता को त्यागकर ही किया जा सकता है।
परमार्थ मानव जीवन का सच्चा स्वार्थ है।
समय उस मनुष्य का विनाश कर देता है, जो उसे नष्ट करता रहता है।
अश£ील, अभद्र अथवा भोगप्रदधान मनोरंजन पतनकारी होते हैं।
परोपकार से बढ़कर और निरापत दूसरा कोई ध्धर्म नहीं।
परावलम्बी जीवित तो रहते हैं, पर मृत तुल्य ही।
अंध श्रद्धा का अर्थ है, बिना सोचे-समझे, आँख मूँदकर किसी पर भी विश्वास।
एकांगी अथवा पक्षपाती मस्तिष्क कभी भी अच्छा मित्र नहीं रहता।
 सबसे बड़ा दीन दुर्बल वह है, जिसका अपने ऊपर नियंत्रण नहीं।
 जो जैसा सोचता है और करता है, वह वैसा ही बन जाता है।
भगवान्‌ की दण्ड संहिता में असामाजिक प्रवृत्ति भी अपराध है।
करना तो बड़ा काम, नहीं तो बैठे रहना, यह दुराग्रह मूर्खतापूर्ण है।
डरपोक और शक्तिहीन मनुष्य भाग्य के पीछे चलता है।
मानवता की सेवा से बढ़कर और कोई बड़ा काम नहीं हो सकता।
प्रकृतित: हर मनुष्य अपने आप में सुयोग्य एवं समर्थ है।
 व्यक्तित्व की अपनी वाणी है, जो जीभ या कलम का इस्तेमाल किये बिना भी लोगों के अंतराल को छूती है।
 प्रस्तुत उलझनें और दुष्प्रवृत्तियाँ कहीं आसमान से नहीं टपकीं। वे मनुष्य की अपनी बोयी, उगाई और बढ़ाई हुई हैं।
 दीनता वस्तुत: मानसिक हीनता का ही प्रतिफल है।
जीवनी शक्ति पेड़ों की जड़ों की तरह भीतर से ही उपजती है।
 सत्कर्मों का आत्मसात होना ही उपासना, साधना और आराधना का सारभूत तत्व है।
 जनसंख्या की अभिवृद्धि हजार समस्याओं की जन्मदात्री है।
अंतरंग बदलते ही बहिरंग के उलटने में देर नहीं लगती है।
 सद्‌विचार तब तक मधुर कल्पना भर बने रहते हैं, जब तक उन्हें कार्य रूप में परिणत नहीं किया जाय।
नेतृत्व का अर्थ है वह वर्चस्व जिसके सहारे परिचितों और अपरिचितों को अंकुश में रखा जा सके, अनुशासन में चलाया जा सके।
 आत्मानुभूति यह भी होनी चाहिए कि सबसे बड़ी पदवी इस संसार में मार्गदर्शक की है।
 नेता शिक्षित और सुयोग्य ही नहीं, प्रखर संकल्प वाला भी होना चाहिए, जो अपनी कथनी और करनी को एकरूप में रख सके।
 सफल नेता की शिवत्व भावना-सबका भला 'बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय' से प्रेरित होती है।
 जो व्यक्ति कभी कुछ कभी कुछ करते हैं, वे अन्तत: कहीं भी नहीं पहुँच पाते।
विपरीत प्रतिकूलताएँ नेता के आत्म विश्वास को चमका देती हैं।
 सच्चे नेता आध्यात्मिक सिद्धियों द्वारा आत्म विश्वास फैलाते हैं। वही फैलकर अपना प्रभाव मुहल्ला, ग्राम, शहर, प्रांत और देश भर में व्याप्त हो जाता है।
 सफल नेतृत्व के लिए मिलनसारी, सहानुभूति और कृतज्ञता जैसे दिव्य गुणों की अतीव आवश्यकता है।
हर व्यक्ति जाने या अनजाने में अपनी परिस्थितियों का निर्माण आप करता है।
अनीति अपनाने से बढ़कर जीवन का तिरस्कार और कुछ हो ही नहीं सकता।
 काम छोटा हो या बड़ा, उसकी उत्कृष्टता ही करने वाले का गौरव है।
 निरंकुश स्वतंत्रता जहाँ बच्चों के विकास में बाधा बनती है, वहीं कठोर अनुशासन भी उनकी प्रतिभा को कुंठित करता है।
दिल खोलकर हँसना और मुस्कराते रहना चित्त को प्रफुल्लित रखने की एक अचूक औषधि है।
 नास्तिकता ईश्वर की अस्वीकृति को नहीं, आदर्शों की अवहेलना को कहते हैं।
 श्रेष्ठ मार्ग पर कदम बढ़ाने के लिए ईश्वर विश्वास एक सुयोग्य साथी की तरह सहायक सिद्ध होता है।
 मरते वे हैं, जो शरीर के सुख और इन्दि्रय वासनाओं की तृप्ति के लिए रात-दिन खपते रहते हैं।
 राष्ट्र के उत्थान हेतु मनीषी आगे आयें।
 राष्ट्र निर्माण जागरूक बुद्धिजीवियों से ही संभव है।
 राष्ट्रोत्कर्ष हेतु संत समाज का योगदान अपेक्षित है।
 राष्ट्र का विकास, बिना आत्म बलिदान के नहीं हो सकता।
 राष्ट्र को समृद्ध और शक्तिशाली बनाने के लिए आदर्शवाद, नैतिकता, मानवता, परमार्थ, देश भक्ति एवं समाज निष्ठा की भावना की जागृति नितान्त आवश्यक है।
 सामाजिक, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में जो विकृतियाँ, विपन्नताएँ दृष्टिगोचर हो रही हैं, वे कहीं आकाश से नहीं टपकी हैं, वरन्‌ हमारे अग्रणी, बुद्धिजीवी एवं प्रतिभा सम्पन्न लोगों की भावनात्मक विकृतियों ने उन्हें उत्पन्न किया है।
 राष्ट्रीय स्तर की व्यापक समस्याएँ नैतिक दृष्टि धूमिल होने और निकृष्टता की मात्रा बढ़ जाने के कारण ही उत्पन्न होती है।
राष्ट्र के नव निर्माण में अनेकों घटकों का योगदान होता है। प्रगति एवं उत्कर्ष के लिए विभिन्न प्रकार के प्रयास चलते और उसके अनुरूप सफलता-असफलताएँ भी मिलती हैं।
राष्ट्रों, राज्यों और जातियों के जीवन में आदिकाल से उल्लेखनीय धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक क्रान्तियाँ हुई हैं। उन परिस्थितियों में श्रेय भले ही एक व्यक्ति या वर्ग को मार्गदर्शन को मिला हो, सच्ची बात यह रही है कि बुद्धिजीवियों, विचारवान्‌ व्यक्तियों ने उन क्रान्तियों को पैदा किया, जन-जन तक फैलाया और सफल बनाया।
धर्म का मार्ग फूलों की सेज नहीं है। इसमें बड़े-बड़े कष्ट सहन करने पड़ते हैं।
अवसर उनकी सहायता कभी नहीं करता, जो अपनी सहायता नहीं करते।
ज्ञान के नेत्र हमें अपनी दुर्बलता से परिचित कराने आते हैं। जब तक इंद्रियों में सुख दीखता है, तब तक आँखों पर पर्दा हुआ मानना चाहिए।
जो सच्चाई के मार्ग पर चलता है, वह भटकता नहीं।
किसी का मनोबल बढ़ाने से बढ़कर और अनुदान इस संसार में नहीं है।
 बड़प्पन सुविधा संवर्धन का नहीं, सद्‌गुण संवर्धन का नाम है।
 संसार का सबसे बड़ा दीवालिया वह है, जिसने उत्साह खो दिया।
 मनुष्य की संकल्प शक्ति संसार का सबसे बड़ा चमत्कार है।
 अपने दोषों से सावधान रहो; क्योंकि यही ऐसे दुश्मन है, जो छिपकर वार करते हैं। आत्मविश्वासी कभी हारता नहीं, कभी थकता नहीं, कभी गिरता नहीं और कभी मरता नहीं।
 उनकी प्रशंसा करो जो धर्म पर दृढ़ हैं। उनके गुणगान न करो, जिनने अनीति से सफलता प्राप्त की।
जिनके अंदर ऐय्याशी, फिजूलखर्ची और विलासिता की कुर्बानी देने की हिम्मत नहीं, वे अध्यात्म से कोसों दूर हैं।
ऊँचे सिद्धान्तों को अपने जीवन में धारण करने की हिम्मत का नाम है-अध्यात्म।
स्वाधीन मन मनुष्य का सच्चा सहायक होता है।
प्रतिभावान्‌ व्यक्तित्व अर्जित कर लेना, धनाध्यक्ष बनने की तुलना में कहीं अधिक श्रेष्ठ और श्रेयस्कर है।
दरिद्रता कोई दैवी प्रकोप नहीं, उसे आलस्य, प्रमाद, अपव्यय एवं दुर्गुणों के एकत्रीकरण का प्रतिफल ही करना चाहिए।
शत्रु की घात विफल हो सकती है, किन्तु आस्तीन के साँप बने मित्र की घात विफल नहीं होती।
अंध परम्पराएँ मनुष्य को अविवेकी बनाती हैं।
जब हम किसी पशु-पक्षी की आत्मा को दु:ख पहुँचाते हैं, तो स्वयं अपनी आत्मा को दु:ख पहुँचाते हैं।
हम आमोद-प्रमोद मनाते चलें और आस-पास का समाज आँसुओं से भीगता रहे, ऐसी हमारी हँसी-खुशी को धिक्कार है।
दूसरों की सबसे बड़ी सहायता यही की जा सकती है कि उनके सोचने में जो त्रुटि है, उसे सुधार दिया जाए।
 ठगना बुरी बात है, पर ठगाना उससे कम बुरा नहीं है।
प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से जागती है और उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है।
 संकल्प जीवन की उत्कृष्टता का मंत्र है, उसका प्रयोग मनुष्य जीवन के गुण विकास के लिए होना चाहिए।
पुण्य की जय-पाप की भी जय ऐसा समदर्शन तो व्यक्ति को दार्शनिक भूल-भुलैयों में उलझा कर संसार का सर्वनाश ही कर देगा।
 अपने दोषों की ओर से अनभिज्ञ रहने से बड़ा प्रमाद इस संसार में और कोई दूसरा नहीं हो सकता।
 अव्यवस्थित जीवन, जीवन का ऐसा दुरुपयोग है, जो दरिद्रता की वृद्धि कर देता है। काम को कल के लिए टालते रहना और आज का दिन आलस्य में बिताना एक बहुत बड़ी भूल है। आरामतलबी और निष्कि्रयता से बढ़कर अनैतिक बात और दूसरी कोई नहीं हो सकती।
 किसी समाज, देश या व्यक्ति का गौरव अन्याय के विरुद्ध लड़ने में ही परखा जा सकता है।
 दुष्कर्म स्वत: ही एक अभिशाप है, जो कत्र्ता को भस्म किये बिना नहीं रहता।
 कत्र्तव्य पालन करते हुए मौत मिलना मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी सफलता और सार्थकता है।
 बड़प्पन बड़े आदमियों के संपर्क से नहीं, अपने गुण, कर्म और स्वभाव की निर्मलता से मिला करता है।
पुण्य-परमार्थ का कोई भी अवसर टालना नहीं चाहिए। अगले क्षण यह देह रहे या न रह ेक्या ठिकाना?
शुभ कार्यो को कल के लिए मत टालिए, क्योंकि कल कभी आता नहीं।
......मोकुमार,
 पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्ता

Wednesday, May 26, 2010

जो स्वाभाविक है वही होना चाहिए ......

बचपन से ही मेरी सोच, शैली अभिव्यक्ति और प्रस्तुति सब सहज एवं स्वाभाविक रहे हैं। शायद इसी कारण से मुझे भरपूर स्नेह सभी जगह मिला ........ मेरे "स्वाभाविक" शब्द कहने का अर्थ हैं कि किसी भी व्यक्ति को अपना स्वभाव को हमेशा सरल , सहज , स्नेहपूर्ण अपने अंतर आत्मा के अनुशार व्यक्त होने देने चाहिए ना कि परिवर्तित करके ! ऐसा करने से आप हमेशा चिंता रहित , झूठ रहित रहेंगे , आपके अन्दर जो स्वाभाविक शैली रहेगी , हमेशा आगे बढ़ने में सहयोग करेगी , यह अलग बात हैं लोग हमको बहुत पिछड़ा व्यक्ति समझते हैं और उनका पिछड़ा व्यक्ति समझना भी लाजिमी हैं , क्योंकि पिछड़ा व्यक्ति को पिछड़ा व्यक्ति ही कहा जायेगा ना .......लेकिन हम सच कह रहे हैं , लोगो कि बात से हमको कोई फर्क नहीं पड़ता हैं |
आज भी कोई व्यक्ति जब हमसे  पूछते हैं कि यार तुमको कहाँ रहना अच्छा लगता हैं तो मेरा स्पष्ट उतर रहता हैं कि अपने घर में गाँव में और अपने देश में ! अभी इस प़र हम लिखेंगे ,,,,,,,after some time....
गलतियों का ज्ञान तब मिलता है जब हम मासूम और स्वभाविक होते हैं। जो गलती हो जाती हैं उसके लिए मैं अपने को पापी समझता हूँ क्योंकि उस वर्तमान क्षण में मैं अपने आप को फिर से नवीन, शुद्ध , स्पष्ट और स्वभाविक बनाता हूँ ,भूतकाल की गलतियां भूतकाल हैं। जब यह ज्ञान मिल जाता है तो मैं फिर से परिपूर्ण हो जाता हूँ |
गलतियों को सुधारने के लिए सभी व्यक्ति को अधिकार और प्रेम की आवश्यकता होती है। अधिकार और प्रेम एक-दूसरे के विरोधाभासी हैं परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। अधिकार के बिना प्रेम दम घुटने जैसा है। प्रेम के बिना अधिकार उथले जैसा है। एक मित्र के पास अधिकार और प्रेम दोनों होना चाहिए परन्तु वह सही मेल में होना चाहिए। यह सिर्फ तब हो सकता है जब आप पूर्णत: आवेगहीन और केन्द्रित होंगे।
किसी व्यक्ति को उस गलती के बारे में मत बताआ॓ जो उसे पता है, उसने की है। ऐसा करके आप उसे और अधिक अपराधी बना देंगे। एक महान व्यक्ति दूसरों की गलतियों को नहीं पकड़ेगा और उन्हें अपराधी महसूस नहीं होने देगा। वह उन्हें आवेग और देखरेख के साथ ठीक करेगा। जब आप दया दिखाते हैं तो आपका सही स्वभाव सामने आता है। क्या आपने दया के कुछ कृत्य किये हैं किसी से बिना अपेक्षा के? हमारी सेवा बुद्धिहीन नहीं होनी चाहिए। दया के कृत्य के लिए योजना नहीं बनानी चाहिए। जब आप यादृच्छिक दया के कृत्य करते हैं तो अपने सही स्वभाव में आ जाते हैं। अनायास कुछ करें और स्वाभाविक रहें।
......आमोद कुमार,
 पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

Tuesday, May 25, 2010

सर्वोत्तम आत्मबल को अर्जित करना ही जीवन का सबसे बड़ा धन हैं !!!!!!

सर्वोत्तम आत्मबल को अर्जित करना ही जीवन का सबसे बड़ा धन हैं !!!!!! किसी भी व्यक्ति के आत्मा में अथाह सामर्थ्य है। फिर भी बहुत सारे व्यक्ति अपने अन्दर निहित अथाह सामर्थ्य का उपयोग अपने आलशपन के कारण नहीं करते हैं , और दोष ईश्वर का देना शुरू कर देते हैं , जबकि किसी भी कार्य को दत्तचित्त होकर हर कोई को करना चाहिए |
निश्चिन्त जीवन तब होता है जब हम अच्छे कार्यो को करते हैं , और चिन्तित जीवन तब होता है जब हम बुरे कार्यो की ओर अग्रसर होते हैं ,जब मन शांत रहता हैं तो कोई भी बड़ा से बड़ा कार्य बहुत ही आसानी से हो जाता हैं , अपने अन्तःकरण की शुद्धता हमेसा बनाये रखे ! अपने जीवन में दिव्य विचार रखे , कभी भी किसी कार्य में चिन्ता ना करे , चिन्ता से बुद्धि संकीर्ण होती है। चिन्ता से बुद्धि का विनाश होता है। चिन्ता से बुद्धि कुण्ठित होती है। चिन्ता से विकार पैदा होते हैं। चिन्ता से चतुराई घटे ,दुख से घटे शरीर,पाप से लक्ष्मी घटे कहि गये दास कबीर , बहुत ही प्रेरक पंक्ति हैं ...... सभी व्यक्ति इस बात से परिचित हैं फिर भी चिंता के अथाह सागर में डूब जाते हैं !चिन्ता उन्हीं की होती है जिनके पास ठीक चिन्तन नहीं है। शरीर की आवश्यकता पूरी करने के लिए पुरूषार्थ करना हाथ-पैर चलाना, काम करना, इसकी मनाही नहीं है। लेकिन इसके पीछे अन्धी दौड़ लगाकर अपनी चिन्तनशक्ति नष्ट कर देना यह बहुत हानिकारक है।
कोई भी विचारवान पुरूष अपनी विचारशक्ति से विवेक-वैराग्य उत्पन्न करके वास्तव में जिसकी आवश्यकता है उसे पा लेगा। कोई भी मूर्ख आदमी जिसकी आवश्यकता है उसे समझ नहीं पायेगा और जिसकी आवश्यकता नहीं है उसको आवश्यकता मानकर अपना जीवन खो देगा। मूर्ख आदमी को चिन्ता होती है कि रूपये नहीं होंगे तो कैसे चलेगा, गाड़ी नहीं होगी तो कैसे चलेगा, अमुक वस्तु नहीं होगी तो कैसे चलेगा। मूर्खो के प्रति किसी तरह का प्रतिक्रिया देना भी महान मुर्खता हैं ,मूर्खो के लिये इस दुनियाँ में सबसे आसान काम किसी भी चीज में दोष निकालना हैं |
शमा जलती है प़र परवानों को आमंत्रण नहीं देती। परवाने अपने आप आ जाते हैं। ऐसे ही आपका जीवन अगर परहित के लिए खर्च होता है तो तुम्हारे आपके रूपी साधन के लिए आवश्यकताएँ, सुविधाएँ अपने आप आ जाती हैं। लोग नहीं देंगे तो लोकेश्वर उनको प्रेरित करके आपकी आवश्यकताएँ हाजिर कर देंगे।
किसी भी व्यक्ति का लौकिक व्यवहार, खान-पान, रहन सहन से ज्ञानी को नापा नहीं जाता। वेश-भूषा से ज्ञान का पता नहीं चलता। आप अपने आपको नाप सकते हैं अपनी मति के अनुसार परन्तु जिनकी मति मतिदाता से अभिन्न हुई है, मति-गति से पार परमात्म-स्वरूप में जो स्थित हैं ऐसे ज्ञानियों को नापना असम्भव है। आपकी मति जितनी ऊँची होगी उतना आपका उनके बारे में ऊँचा अनुमान और आदर होगा। मति जब नीची होगी तब उनके बारे में नीचा अनुमान और नीचा निर्णय होगा। जब तक मनुष्य को पूर्ण आत्म-साक्षात्कार नहीं होता तब तक पूर्ण पुरूषों के प्रति श्रद्धा, भक्ति, मति, गति में चढ़ाव-उतार होता ही रहता है। अतः जल्दी पूर्णता को पाए ....और पूर्ण पुरूष को पहचाने और पूर्ण हो जाये |
कई मूर्ख लोग सभ्य और बुद्धिमान व्यक्तियों को अहिंसक समझकर उनका अपमान करते हैं। उनके प्रति अपराध करते हुए उनको लगता है कि यह तो अहिंसक व्यक्ति है क्या कर लेगा? आजकल तो हिंसा के प्रति लोगों का मोह ऐसा बढ़ गया है कि लोग बुद्धिमान से अधिक बाहूबलियों का आसरा लेना पसंद करते हैं। एक सभ्य और बुद्धिमान युवक की बजाय लोग दादा टाईप के आदमी से मित्रता करने को अधिक तरजीह देते हैं। ऐसा करना लाभदायक नहीं है। बुद्धिमान व्यक्ति शारीरिक रूप से हिंसक नहीं होते पर उनकी बुद्धि इतनी तीक्ष्ण होती है कि उससे उनकी कार्य करने की क्षमता व्यापक होती है अर्थात उनकी बाहें लंबी होती है। अपने स्वयं ये मित्र के प्रति अपराध या अपमान किये जाने का समय आने पर वह बदला लेते हैं। हमें इसलिये बुद्धिमान लोगों से मित्रता करना चाहिये न कि उनके प्रति अपराध।
सपनों का भी एक अलग ही संसार है। अनेक बार हमें ऐसे सपने आते हैं जिनसे कोई लेना देना नहीं होता। कई बार अपने सपने में भयानक संकट देखते हैं जिसमें कोई हमारा गला दबा रहा है या हम कहीं ऐसी जगह फंस गये हैं जहां से निकलना कठिन है। तब इतना डर जाते हैं कि हमारी देह अचानक सक्रिय हो उठती है और नींद टूट जाती है। बहुत देर तक तो हम घबड़ाते हैं जब थोड़ा संभलते हैं तो पता लगता है कि हम तो व्यर्थ ही संकट झेल रहे थे।
कई बार सपनों में ऐसी खुशियां देखते हैं जिनकी कल्पना हमने दिन में जागते हुए नहीं की होती । ऐसे लोगों से संपर्क होता है जिनके पास जाने की हम सोच भी नहीं सकते। जागते हुए पुरानी साइकिल पर चलते हों पर सपने में किसी बड़ी गाड़ी पर घूमते हुए दिखाई देते हैं। ऐसे में जब खुशी चरम पर होती है और सपना टूट जाता है। आंखें खुलने पर भी ऐसा लगता है कि जैसे हम खुशियों के समंदर में गोता लगा रहे थे पर फिर जैसे धीरे धीरे होश आता है तो पता लगता है कि वह तो एक सपना था।
अर्थ यह है कि यह जीवन भी एक तरह से सपना ही है। इसमें दुःख और सुख भी एक भ्रम हैं। मनुष्य को यह देह इस संसार का आनंद लेने के लिये मिली है जिसके लिये यह जरूरी है कि भगवान भक्ति और ज्ञान प्राप्त कर मोक्ष प्राप्त किया जाये न कि विषयों में लिप्त होकर अपने को दुःख की अनुभूति कराई जाये। जीवन में कर्म सभी करते हैं पर ज्ञानी और भक्त लोग उसके फल में आसक्त नहीं होते इसलिये कभी निराशा उनके मन में घर नहीं करती। ऐसे ज्ञानी और भक्तजन दुःख और सुख के दिन और रात में दिखने वाले सपने से परे होकर शांति और परम आनंद के साथ जीवन व्यतीत करते हैं।
अगर हम भारतीय अध्यात्म संदेशों का अर्थ समझें तो दुःख और सुख जीवन में बर्फ में पानी के सदृश हैं। अर्थात दोनों की अनूभूतियां हैं बस और कुछ नहीं है। जिस तरह बर्फ दिखती है पर होता तो वह पानी ही है। उसी दुःख और सुख बस एक सपने की तरह है। जो इस तत्व ज्ञान को समझ लेना वह जीवन को आनंद के साथ जी सकता है।
भगवद् गीता में लिखा हैं कि 'जो योगी निरन्तर सन्तुष्ट है, मन इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किये हुए हैं और मुझमें दृढ़ निश्चयवाला है, वह मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है।'
अपने में से दोष निकालना अच्छा है। दोष निकालने के लिए गुण भरना अच्छा है। गुण प्रकृति में होते हैं। दोषी होने की अपेक्षा गुणवान होना ठीक है।अपना दिमागी संतुलन बनाये रखना चाहिए। किसी छोटे या बड़े काम को पूरी तरह से विचार कर प्रारंभ करना चाहिए। ऐसे काम में नाकाम होने पर भी दुःख नहीं होता। तब हमें इस बात का अफसोस नहीं होता कि हमने अपने कर्म में कोई कमी की। अगर बिना विचारे काम प्रारंभ किये जाते हैं तो उनमें शक्ति भी अधिक खर्च होती है और उनमें नाकामी मन को बहुत परेशान भी कर देती है।
किसी भी व्यक्ति का लक्ष्य जितना ऊँचा होता है उतने ही संकल्प शुद्ध होते हैं। ऊँचा लक्ष्य है मोक्ष, ऊँचा लक्ष्य है परमात्मा-प्राप्ति, ऊँचा लक्ष्य है, अनन्त ब्रह्माण्डनायक ईश्वर से मिलना। ऊँचा लक्ष्य तुच्छ संकल्पों को दूर कर देता है। ऊँचा संकल्प जितना दृढ़ होगा उतना ही तुच्छ संकल्पों को हटाने में सफलता मिलेगी। जितना तुच्छ संकल्पों को काट दिया जाएगा, भाग दिया जायगा उतना ही ऊँचा जीवन, ऊँची समझ, ऊँचा स्वास्थ्य, ऊँचा सुख, ऊँची शांति और ऊँचे में ऊँचे परमात्मा की प्राप्ति सुलभ होगी। साधक जब ऊँचे में ऊँचे पद को पाने में सफल हो जाता है तब वह साधक बन जाता है।
अगर आप अपने जीवन में आनन्द ही आनन्द चाहते है ... मंगल ही मंगल चाहते है.... कल्याण ही कल्याण चाहते है तो सदैवे उच्च विचार.... उच्च विचारों से भी पार, उच्च विचारों के भी साक्षी... नीच विचारों को निर्मूल करने में सदैव सतर्क रहे |
हमारा स्वरूप सनातन सत्य है। हमारा आत्मा सदैव शुद्ध, बुद्ध है। हम अपने शुद्ध, बुद्ध परमेश्वरीय स्वभाव में, अपने निर्भीक स्वभाव में, निर्विकारी स्वभाव में, अपने आनन्द स्वभाव में, अपने अकर्त्ता स्वभाव में, अपने अभोक्ता स्वरूप में, अपने भगवद् स्वभाव में सदैव टिककर निर्लेप भाव से इस शरीर का जीवन यापन करते जीवन की शाम होने से पहले जीवनदाता के स्वरूप में टिक जाएँगे।
बहुत लोग बहुत जल्दी सफलता हासिल करना चाहते हैं। काम में मन कम उससे होने वाली उपलब्धि पर अधिक दृष्टि रखते हैं यही कारण है कि उनको सफलता नहीं मिलती। भक्ति हो या सांसरिक काम उसमें मन लगाकर ही आदमी कोई उपलब्धि प्राप्त कर सकता है। अधिकतर लोग अपना काम करते हुए केवल इस बात की चिंता करते हैं कि उससे उनको क्या मिलेगा? जो भक्ति करते हैं वह सोचते हैं कि भगवान बस तत्काल उनका काम बना दें। मन भक्ति में कम अपने काम में अधिक होता है। न उनको इससे भक्ति का लाभ होता है और न काम बनने की संभावना होती है। भक्ति में काम का भाव और जो काम है उससे करने की बजाय भगवान की भक्ति में लगने से दोनों में उनकी सफलता संदिग्ध हो जाती है और फिर ऐसा करने वाले लोग अपनी नाकामी का दोष दूसरों को देते हैं। अगर मन लगाकर भक्ति या सांसरिक काम किया जाये तो उसमें सफलता मिलती है। आदमी क्या भगवान भी बस में किये जा सकते हैं।
......आमोद कुमार,
 पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान