Monday, April 26, 2010

लोक नायक जय प्रकाश नारायण क्रान्ति का सूत्रपात गांव से करना चाहते थे....



लोक नायक जयप्रकाश नारायण क्रान्ति का सूत्रपात गांव से करना चाहते थे..
लोक नायक जय प्रकाश नारायण का मानना था कि गांव की हर एक समस्या का चिन्तन ही सम्पूर्ण या समग्र क्रान्ति का पहलू है। इसलिए रचना, संघर्ष, शिक्षण और संगठन की चतुर्विधि प्रक्रिया से वो गांवों को बदलना चाहते थे। उनका कहना था कि जब गांव बदलेंगे तो शहर भी बदले बिना नहीं रहेंगे।
1977 के छात्र आन्दोलन का नेतृत्व जब लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने संभाला तब यह आन्दोलन व्यवस्था परिवर्तन के आन्दोलन में बदल गया। यह अलग बात है कि जे.पी. आन्दोलन के गर्भ से निकले छात्र नेता सत्ता की चकाचौंध में इस तरह से डूबे कि जे.पी. की सम्पूर्ण क्रान्ति को भूल गए। इन तत्कालीन ‘छात्र नेताओं’ ने सम्पूर्ण क्रान्ति की सम्पूर्ण हत्या कर दी।


जे.पी. ने कोई पद स्वीकार नहीं किया था |सम्पूर्ण क्रान्ति का नारा जनता के लिए है। उसका मोर्चा हर गांव, शहर, कार्यालय, विद्यालय और कारखाने में है, यहां तक की हर परिवार में है। जे.पी. इस क्रान्ति के माध्यम से सरकार, समाज, शिक्षा, चुनाव, बाजार और विकास की योजना, हर चीज में परिवर्तन चाहते थे। वे दहेज, छुआछूत, ऊंच-नीच के भेदभाव को दूर कर खुदगर्जी के स्थान पर पारस्परिक सहयोग स्थापित करना चाहते थे। जे.पी. की मान्यता थी कि क्रान्ति सरकारी शक्ति से नहीं जन शक्ति से होगी।इसलिए उन्होंने लोक शक्ति को सामाजिक परिवर्तन का साधन बनाया था |

जे.पी. क्रान्ति के माध्यम से समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति का विकास चाहते थे तथा विकास की प्रक्रिया की शुरूआत भी उसी अंतिम व्यक्ति से करना चाहते थे।जो सबसे गरीब और असहाय है उसकी चिन्ता पहले की जाए और उसका उदय सबसे पहले हो। ताकि वो भी अपनी पीठ सीधी कर सके। अपने अधिकारों की मांग कर सके। उसके लिए लड़ सके।

जे.पी. का मानना था कि मनुष्य के गुण, कर्म और चरित्र के अनुसार उसकी इज्जत होनी चाहिए, न कि जाति के अनुसार।जातिवाद के साथ जुड़ी हुई सभी परम्पराओं का उन्मूलन करना होगा। वे समाज में समरसता लाने के लिए ब्राह्मण- हरिजन सहभोज और अन्तर्जातीय विवाह आदि पर बहुत जोर देते थे।उन्होंने दहेज का भी कड़ा विरोध किया जो आज परिवार की प्रतिष्ठा और कुल की मर्यादा का अंग बन गया है। वे अफसोस के साथ कहते थे कि शादी-विवाह के पवित्र संस्कार आज बाजारू बन गए हैं। उन्होंने दहेज का बहिष्कार करने की शपथ भी युवाओं को दिलाई थी। वे उनसे कहते थे कि तुम लोग बैल, घोड़े या अन्य जानवर नहीं हो, जिसको बाजार में बेचा जाए।
राजनीतिक क्षेत्र में जे.पी. सत्ता के विकेन्द्रीकरण के प्रबल पक्षधर थे। वे चाहते थे कि प्रत्याशियों का चयन तथा राजसत्ता पर नियंत्रण जनता के द्वारा होना चाहिए। वे लोक चेतना के द्वारा जनता को जगाकर उसे लोकतंत्र का प्रहरी बनाना चाहते थे ताकि नीचे के कर्मचारी से लेकर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक सबके काम काज पर निगरानी रखी जा सके। वे चाहते थे कि जन प्रतिनिधियों को समय से पूर्व वापस बुलाने का अधिकार उस क्षेत्र की जनता को मिले ताकि जन प्रतिनिधियों को अपने निर्वाचन क्षेत्र के प्रति जवाबदेह बनाया जा सके।
वास्तव में जे.पी. मूलत: राजनीतिज्ञ नहीं बल्कि एक राजनीतिक दार्शनिक थे। शायद यही कारण था कि वे अपने चेलों को अच्छी तरह पहचान नहीं पाए। वे अपने साथ ऐसे लोगों को नहीं जोड़ पाए जो उनके आदर्श को आगे बढ़ाने का काम करते। अगर उन्होंने ऐसा कर लिया होता तो संपूर्ण क्रांति का उनका नारा आज केवल नारा नहीं होता। बल्कि उसका असर हम आज अपने चारों ओर दिखायी देता। खैर जो अभी तक नहीं हुआ वह आगे भी नहीं होगा, यह जरूरी नहीं। देश की युवा पीढ़ी को उनके सपनों को पूरा करने के लिए आगे आना होगा।
आमोद कुमार

पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

8 comments:

HBMedia said...

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Deepak said...

आज लोकनायक का जन्मदिवस है. साथ ही साथ अमिताभ बच्चन का भी जन्मदिवस है. मीडिया अमिताभ के जन्म दिन को ऐसे मनाता है जैसे ये कोई युगपुरुष हैं और लोकनायक को याद तक नहीं किया जाता है. मेरी उम्र के अधिकतर लोगों को जयप्रकाश के बारे में कुछ मालूम ही नहीं है. क्या ये जेपी के राजनितिक उताराधिकारियों के लिए शर्म की बात नहीं है? जब तक चंद्रशेखर और जगदीश भाई जैसे लोग जिन्दा थे सिताबदियारा में हर साल जेपी का जन्मदिन मनाया जाता था, लेकिन पता नहीं अब वह भी कुछ होता है की नहीं,पता नहीं चलता है. लोकनायक का आन्दोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ था, तानाशाही के खिलाफ था, सर्वोदय के लिया था,लेकिन क्या ये सच नहीं है की उनके उत्तराधिकारियों ने ही उनके बिचारों के साथ सबसे ज्यादा खिलवाड़ किया. चाहे वो लालू जी हों या नितीश जी हों या शरद यादव जी हों. जेपी तो चले गए लेकिन उनकी आत्मा इनकी करतूतों से हर रोज मरती होगी.

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