सर्प और दयालु किसान क़ी कहानी !!!!!!
गॉव से दूर एक किसान अकेला ही अपनी झोपड़ी में रहता था। वह अपने अच्छे बर्ताव एवं दयालु स्वभाव के लिए बहुत प्रसिद्ध था। एक दिन उसकी झोपड़ी में चलकर मेहमान आए। पहला मेहमान एक शेर था जो तेजी से दहाड़ता हुआ झोपड़ी की तरफ बढ़ गया। किसान शेर को देखकर पहले तो भयभीत हुआ किन्तु शेर की भूख का विचार आते ही उसे शेर पर दया आ गई और उसे भूख मिटाने का आश्वासन देते हुए उसके भोजन की तैयारी में जुट गया। शेर एक कोने में भोजन के इन्तजार में लेट गया।
दूसरे द्वार पर एक थका-प्यासा गया आया और भूख प्यास से व्याकुल स्वरों में शेर की तरफ बिना देखे किसान से थोड़ी सी घास खाने को माँगने लगा। किसान ने कहा- आओ मित्र ! मैं तुम्हें अपनी बकरी के लिए तैयार रखी घास खिलाता हूँ। जब किसान प्रेमपूर्वक गधे को घास खिला रहा था तभी झोपड़ी के अहाते में एक हरे रंग का लम्बा सर्प घुस आया जिसे देखते ही पहले तो भयभीत किसान ने उसे जहरीले जन्तु को मार डालना उचित समझा किन्तु शीघ्र ही सर्प को भूखा जानकर उस पर दया आ गई और यथावत् सभी के लिए भोजन जुटाने में लग गया कि इतने ही में झोपड़ी के द्वार पर चौथा मेहमान भूख-प्यास से व्याकुल एक मनुष्य आया जिसे देख किसान उसका स्वागत करते हुए बोला- आओ भाई ! तुम्हारे लिए भी मैं शीघ्र ही खाने-पीने का प्रबन्ध करता हूँ। इतना कहकर किसान ने बकरी का ताज़ा दूध निकाला और मनुष्य मेहमान को पिलाया। इसके बाद उसे घासफूस के बिस्तर पर आराम करने की सलाह दी और बकरी के पास खड़े होकर सोचने लगा- अन्य मेहमान भी भोजन की प्रतीक्षा कर रहे हैं, मुझे क्या करना चाहिये ? यह सोचते ही उसके दिमाग में एक विचार आया और उसने बिना विलम्ब किए सामने खड़ी बकरी के टुकड़े-टुकड़े कर डाले और अपने मेहमानों को क्रमशः शेर एवं सर्प को मांस के टुकड़े खिला दिये। अब किसान संतुष्ट था, इसलिये वह यह कहते हुए सुख की नींद सोने चला गया कि ‘कल का प्रबन्ध भगवान करेंगे।’ सभी मेहमान चैन से सोने चले गए।
सबेरा होते ही किसान अपने लिए कन्द-मूल की खोज में जंगल के लिए निकल पड़ा। सांझ होते ही ज्यों ही वह झोपड़ी के समीप पहुँचा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। जब उसने देखा कम से कम दस-पन्द्रह मोटी-ताजी बकरियों को उस रात वाले शेर ने गर्दन ऊँची उठाई और गर्व से किसान की तरफ देखा फिर गर्दन किसान के पैरों में झुकाई तथा किसान की दयालुता का अहसास जताते हुए अपनी पुँछ को धीरे-धीरे हिलाते हुए झोंपड़ी के बाहर निकल गया। अर्थात् किसान को एक बकरी के बदले इतनी सारी बकरियाँ मिल गई थी क्योंकि किसान ने शेर की भूख मिटाई थी।
इधर एक दिन एक बड़े व्यापारी ने जंगल से गुजरते हुए एक गधे को अकेला ही घास चरते देखा। गधे को बिना मालिक का समझकर व्यापारी ने ठाठ से अपना कीमती असबाब गधे की पीठ पर लाद दिया और अपने साथियों के साथ आगे बढ़ गया। कुछ देर तक तो गधा भी बहुत दूर चले जाने के कारण दिखाई नहीं दे रहा था और गधा इसी मौके की तलाश में ही था । उसने तेजी से छलाँग लगाई और तेज़ी से दौड़ना शुरु किया। दौड़ते-दौड़ते वह सीधा किसान की झोपड़ी पर पहुँचा और घुसते ही अपनी पीठ पर लदा असबाब किसान के सामने डाल दिया। किसान को यह सब देखकर बहुत गुस्सा आया। उधर गधा गर्दन को किसान के चरणों में झुकाए खड़ा था। वह उसका रात को आभार प्रकट कर रहा था जब किसान ने अपने बकरी के लिए तैयार घास गधे को खिलाई थी।
किसान का तीसरा मनुष्य मेहमान उस रात बकरी का दूध पीकर सुबह होते ही झोपड़ी के बाहर एक पेड़ के नीचे आँखें मूंदकर सोने का बहाना कर लेट गया तथा योजना बनाई की जो भी कोई व्यापारी इस जंगल में भटक जाएगा उसे किसान अवश्य ही दया जताते हुए अपनी झोपड़ी में ले जाएगा। तब मैं उसकी हत्या करके माल-असबाब छीन लूँगा और इस तरह चैन की ज़िंदगी बिताऊँगा । मनुष्य मेहमान को गधे द्वारा किसान के यहाँ माल-असबाब उतारे जाने की बात पता लग गई थी और वह मौके की तलाश में था ही कि संयोगवश तीन चोर भी ऐसी ही योजना बनाकर उधर से निकले। मनुष्य मेहमान अब इनके साथ ही किसान की झोपड़ी की तरफ चल दिया। चारों ने झोपड़ी का दरवाजा तोड़कर भीतर घुसने का प्रयास किया। उसी समय दरवाजे के पीछ आराम कर रहे लम्बे सर्प ने एक-एक करके चारों चोरों को चारों खाने चित्त कर दिया और इस प्रकाश वफ़ादार पहरेदार के रूप में किसान की जान बचाते हुए अपना कर्त्तव्य निभाया।
भोर होते ही किसान ने सारा दृश्य देखा तब सर्प अपना फन गर्व से ऊंचा उठाए किसान के सामने आ खड़ा हुआ । किसान को स्थिति समझते देर नहीं लगी कि सर्प ने ही किसान की जान बचाई थी वरना चोर किसान को जान से मार देने के लिए ही झोपड़ी में घुसे थे किन्तु वफादार सर्व ने दयालु किसान की जान बचाकर उस रात का कर्ज चुकाया जिस रात किसान ने सर्प को अपनी बकरी काट कर मांस खिलाया था। हरा-लम्बा, वफादार सर्प अपनी वफादारी की खुशी में गर्व से धरती पर रेंगता, फुफकारता और सीटी की ध्वनि निकालता हुआ झोपड़ी के बाहर ओझल हो गया था।
[दयालु मनुष्य की सब सहायता करते हैं और दयालु के उपकार का ऋण अवश्य ही चुकाया जाता है ]आमोद कुमार
पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

No comments:
Post a Comment