सरलता ही मन की विशुद्धि...
सरलता ही मन की विशुद्धि है। कुटिलता मलीनता है। मलीनता अनर्थकारिणी है, विशुद्धता सर्वार्थ-साधिनी। कुटिलता सर्व-हित-नाशिनी है, तो सरलता सर्व-हितकारिणी। न केवल अपने, बल्कि सबके हित-सुख साधन के लिए सरलता अपनाएँ, कुटिलता त्यागें।
नैसर्गिक स्वच्छ मन स्वभाव से ही सरल होता है। सरलता गई तो समझो स्वच्छता गई। सरलता खोने के तीन प्रमुख कारण हैं, जिनसे हमें सावधान रहकर बचना चाहिए। कौन-से तीन? तृष्णा, अहन्मयता और दार्शनिक दृष्टियाँ। 'तण्हा-मान-दिठ्ठी।' इन तीनों में से किसी एक के प्रति मन में जब जितनी आसक्ति उत्पन्न होती है, तब हम उतनी ही सरलता खो बैठते हैं, उतनी ही स्वच्छता गँवा बैठते हैं, उतने मलीन हो जाते हैं, उतने सुख-शांतिविहीन हो जाते हैं, उतने दुःखी हो जाते हैं।
जब किसी वस्तु, व्यक्ति अथवा स्थिति के प्रति तृष्णा जागती है और आसक्ति बढ़ती है, तब उसे प्राप्त करने के लिए अथवा प्राप्त हुई हो तो अधिकार में रखने के लिए हम बुरे-से बुरा तरीका अपनाने पर उतारू हो जाते हैं। चोरी-डकैती, झूठ-फरेब, छल-छद्म, प्रपंच-प्रवंचन, धोखाधड़ी आदि सब कुछ अपनाते हैं। अपने पागलपन में मन की सरलता खो देते हैं। साध्य हासिल करने की आतुरता में साधनों की पवित्रता खो देते हैं।
प्रिय के प्रति अनुरोध ही अप्रिय के प्रति विरोध उत्पन्न करता है। इससे हम इतने प्रमत्त हो उठते हैं कि तृष्णा-पूर्ति में जो बाधक बनता है, उसे दूर करने के लिए असीम क्रोध और दुर्भावनाओं का प्रजनन करने लगते हैं और परिणामस्वरूप अपनी सुख-शांति भंग कर लेते हैं। मन की सरलता नष्ट कर लेते हैं।
इसी प्रकार 'मैं-मेरे' के प्रति आसक्ति बढ़ती है, तो उस मिथ्या कल्पित 'मैं-मेरे' की मिथ्या सुरक्षा और मिथ्या हित-सुख के लिए जिन्हें 'मैं-मेरा' नहीं मानते, उनकी बड़ी-से-बड़ी हानि करने पर तुल जाते हैं। ऐसा कर वस्तुतः अपनी ही अधिक हानि करते हैं। अपने मन की सरलता की हत्या करते हैं, अपनी आंतरिक स्वच्छता खो बैठते हैं, अपनी सुख-शांति गँवा बैठते हैं औरों को ठगने के उपक्रम में स्वयं ही ठगे जाते हैं।
इसके विपरीत मन जब सहज-सरल रहता है, तो मृदु-मधुर, सौम्य-स्वच्छ, शीतल-शांत रहता है। शरीर भी हल्का-फुल्का और पुलक-रोमांच से भरा रहता है। परिणामतः हम प्रीति-प्रमोद और सुख-सौहार्द से भर उठते हैं। हमारा आंतरिक प्रीति-सुख मैत्री और करुणा के रूप में बाहर प्रकट होता है, और इस प्रकार हम अपनी सुख-शांति औरों को बाँटते हैं। आसपास के सारे वायुमंडल को प्रसन्नता से भरते हैं।
विपश्यना साधना हमें सरल मन बनाने में मदद करती है। विपश्यना साधने के द्वारा साधक पाता है कि उसका मन सरलता को अपनाने लगा है। इसलिए आत्महित और सर्वहित के लिए कुटिलता त्यागें, सरलता अपनाएँ। कुटिलता में महा-अमंगल है, सरलता में महा-मंगल...।
...आमोद कुमार
पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान
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