Thursday, April 15, 2010

मानव सेवा ही भगवान की पूजा है......

प्रतिभाशाली व्यक्ति कोई भी कार्य को करते हैं ,अपने प्रतिभा से...
मानव सेवा ही भगवान की पूजा है......

भगवान के प्रति हमारा यह भाव है कि आपने अमूल्य जीवन हमें दिया, हम सेवकों के लिए इस सुंदर सृष्टि की रचना की और हमें अपने निकट आने का अवसर दिया। ऐसी कृपा हम पर सदैव बनाए रखिएगा।

हम भगवान को स्वामी मानकर उसके सेवक रूप में स्वयं को प्रस्तुत करते हैं। जब हम भगवान की सेवा सेवक भाव से करते हैं तो इससे हमारे अहंकार का भी नाश होता है और मन निर्मल होता जाता है। प्रतिमाओं की सेवा हमें प्राणी सेवा के लिए भी प्रेरित करती है और हमारे मन में स्वत: मानव सेवा का भाव आने लगता है।

माता-पिता की सच्ची सेवा ही भगवान की पूजा हैं ।

हम तो आज लिखेंगे ही , क्योंकि भगवान की पूजा मंदिर में जाकर कही से सही प्रतीत मेरे विचार में नहीं होता हैं .......यह धारणा हमें जे.पी. क्रान्ति के समय से ही हैं,मेरी माँ बहुत ही भगवान की पूजा मंदिर में जाकर करती थी , चुकि मेरे नाना जी तो सुबह नहाकर ही रामायण का पाठ करना शुरू हो जाते थे, इस लिए माँ आज भी , नाना जी का अनुशरण करते हुए भगवान की पूजा करती है , लेकिन जे.पी. क्रान्ति के समय हमको सब कुछ रहते हुए भी भूके रहना पड़ता था , बिना चप्पल के एक देहात के विधालय में जाना पड़ता था ....विद्यालय में चना खाने के लिए भी पैसा नहीं रहता था ....,

क्योंकि माँ भगवान की पूजा करती थी और बेचारी को खुद भी मकई का दर्रा खाकर सोना पड़ता था और हमको भी .....क्या भगवान अगर रहते तो येही दुर्दशा होती क्या ?????

मेरा भी अच्छा दिन लौटा , सब कुछ कर्म और समय के साथ ठीक हो गया .....लेकिन मैं ना कभी मंदिर जाता हूँ , ना कभी आराम से ईश्वर क़ि पूजा करता हूँ , क्योंकि हमारी यह साफ समझ हैं जो कर्म करेंगे उसी का फल मिलेगा ना क़ि मंदिर, मस्जिद से कुछ मिलेगा ..
जब हम आठवी वर्ग के छात्र थे तो माँ बोली , हम हमेशा श्रावण के महीने में पैदल जल लेकर भगवान शंकर को चढाने जाते है , इस बार तुमको भी चलना हैं .....हम बोले माँ हम नहीं जायेंगे , माँ ऐसा ना गुस्सा हुई क़ि हमको भी जल लेकर जाना पड़ा ......वहां तीन दिन पैदल कावर लेकर चलते हुए गये भी ..... वहां माँ बोली चलो अब गंगाजल भगवान प़र चढाने तो हम बोले देखो माँ ,तुम बोली तो चले आये हैं , चुकि तुम ऐसा ना समझो क़ि हम पैदल थकने के चलते नहीं आ रहे थे इस लिए हमने तुमको दिखाया की नहीं माँ हम भी पैदल चल सकते हैं , अब यहाँ जिद मत करो , माँ ने फिर गुस्सा करना शुरू कर दिया और हमको मजबूरन मंदिर के अंदर गंगाजल लेकर जाना भी पड़ा .... भिर इतनी थी की पुछिये मत , अंदर तो हम चले गये , और गंगाजल डालना था भगवान शंकर प़र लेकिन हम चुपके से अपने उपर ही ड़ाल लिए , माँ को पता भी नहीं चला और माँ भी खुश हो गयीं ....गर्मी का दिन था गंगाजल हम अपने उपर ड़ाल लिए तो हमें भी बहुत ठंडक मिली .....कारण मेरा गुस्सा था जो हम पूर्व में झेले थे ..... और आज भी वो ही रूप बरक़रार रखता हूँ और आगे भी रखूंगा ..... मैं चन्दन रोज लगाता हूँ जाकर आईना के सामने चुकि मुझे अच्छा लगता हैं .....रास्ते चलते हुए प्रणाम हमेशा करते हैं भगवान को यह एक आदत पता नहीं कैसे बनी हुई हैं ???????
हमारे बहुत मित्र बोलते भी हैं की भाई क्या बात हैं आमोद खूब पूजा करते हो ????? लेकिन हम भगवान की क्यों करे पूजा , भगवान तो सबसे बड़ा पापी हमही को समझता हैं तो समझे , हम कर भी क्या सकते हैं ?
हम खाना तो एक शाम ही खाते हैं आज भी लेकिन कोई विश्वाश ही नहीं करता हैं ,और हम विश्वाश दिलाना भी नहीं चाहते हैं , हमको खाना भी देहाती ही अच्छा लगता हैं .....हम लोगो का मन रखने के लिए बड़े बड़े होटलों में भी खा लेते हैं , क्योंकि कभी भी जीवन में अन्न का अनादर करना भी नहीं चाहिए , क्योंकि इसी खाना के लिए हम तरसे हैं , तरपे हैं , यह शायद हम जीवन भर भूल नहीं पाएंगे ..... हम जहाँ नौकरी में थे वहाँ तो पूछिए मत , लगभग सबके सब बड़े बड़े होटलों और क्लबओ में ही खाना, खाना पसंद करते हैं ....खैर यह तो अपनी अपनी पसंद हैं |
मेरे अपने घर में सबको अरवा चावल खाना अच्छा लगता हैं , और मुझे शुद्ध उसना चावल , वह भी अगर देहाती मिल गया तो क्या बात हैं ....खैर पसंद अपनी अपनी , इसमें हमको बुड़ा भी नहीं लगता हैं ......

लेकिन मंदिर किसी ना किसी कारणवस , कभी कदाल जाना पड़ ही जाता हैं क्योंकि ...... जो मेरे लिए माता पिता तुल्य हैं [शायद उनसे भी बढ़कर] , जिनकी बात को काटने की हिम्मत हम 1000 जन्म लेकर भी नहीं कर सकते हैं ....
अब जब मंदिर में चले गये तब देखिये , वहाँ पूजा करना तो हमको आता नहीं हैं , हम तो चुप चाप बैठे हुए थे  , और मंदिर के पुजारीगण समझने लगते हैं की यह लड़का भगवान का बहुत बड़ा भक्त हैं , क्योंकि चन्दन का टीका जो लगाये हुए थे ..... हम मन ही मन खूब हस्ते भी थे  ....
अब हम तुझसे पूछते हैं, भगवान अगर तुम सचमुच हो तो मेरे भी प्रशन का उतर दो ? तब हम भी मान लेंगे , तुम्हारा अस्तित्व है ? और हम भी तेरे मंदिर में अपना माथा टेकते रहेंगे ?

1. मेरा कसूर येही हैं ना क़ि मैं नशा नहीं करता हूँ ?
2. मेरा कसूर येही हैं ना क़ि किसी भी लड़की या महिला प़र गलत नजर उठा कर नहीं देखता हूँ ?
3. मेरा कसूर येही हैं ना क़ि गरीब और कमजोर लोगो के घर जाता हूँ ?
4. मेरा कसूर येही हैं ना क़ि अमीरों और घमंडी लोगो के यहाँ कभी नहीं जाता हूँ ?
5. मेरा कसूर येही हैं ना क़ि किसी क़ी हत्या नहीं करता हूँ ?
6. मेरा कसूर येही हैं ना क़ि अपराधी लोग को देखते साथ भरक जाता हूँ और उनसे कभी बात नहीं करता हूँ ?
7. मेरा कसूर येही हैं ना क़ि किसी क़ी चमचई नहीं करता हूँ ?
8. मेरा कसूर येही हैं ना कि किसी को करवा से करवा जबाब , उसके मूह प़र तुरंत देता हूँ ?
9. मेरा कसूर येही हैं ना कि ईमानदारी क़ी रोटी बड़े प्यार से खाता हूँ ?
10. मेरा कसूर येही हैं ना कि इमानदार लोगो के साथ जीना चाहता हूँ ?
11. मेरा कसूर येही हैं ना कि अपने दुश्मन के साथ भी धोका नहीं करता हूँ ?
12. मेरा कसूर येही हैं ना कि मैं झूट बोलना पसंद नहीं करता हूँ ?
13. मेरा कसूर येही हैं ना कि मैं पान खाता हूँ ?
14. मेरा कसूर येही हैं ना कि मैं अपने दिल के दर्द को दिल में ही दफना देता हूँ ?
15. मेरा कसूर येही हैं ना कि मैं नौकरी नहीं करता हूँ ?
16. मेरा कसूर येही हैं ना कि कोई भी अच्छे काम को बड़ी ख़ुशी से करता हूँ ?
17. मेरा कसूर येही हैं ना कि मैं किसी भी लाचार व्यक्ति को जरूरत पड़ने पर तुरंत अपना खून भी दे देता हूँ ?
18. मेरा कसूर येही हैं ना कि मैं किसी पढ़े लिखे माता पिता का पुत्र हूँ ?

19. मेरा कसूर येही हैं ना कि MP-MLA बनने के लिए कोई बेचैनी नहीं हैं ?
20. मेरा कसूर येही हैं ना कि कोई मेरे गाड़ी में जबरदस्ती धक्का मारे तो भी शांत मन से बर्दास्त करता हूँ ?
21. मेरा कसूर येही हैं ना कि तुम्हारी मंदिर नहीं जाता हूँ ?
मेरे पास तुमसे पूछने के लिए कठोर प्रश्नों का एक लम्बा LIST है , पहले तुम इन आसान प्रश्नओ का उतर दो ? तब हमसे बात करना , रही जहाँ मंदिर जाने का सवाल तो , वहाँ तो मैं अपनी माँ के कारण , अपने अभिवावक के कारण जाता हूँ ., जिनसे मना करने की हिम्मत मुझमे नहीं है ........तुम यह भ्रम में मत रहना की , मैं तुम्हारे कारण वहाँ जाता हूँ ......अरे भगवान तुम्हारी औकात नहीं हैं की तू आमोद को मंदिर बुला ले ? अगर तू सचमुच हैं तो दिखा चमत्कार अपना और बुलाकर देख अपनी मंदिर में ? हां इतना याद रखना जिस किसी दिन भी मैं तेरी मंदिर आ गया ना , तो इतनी पूजा तेरी करूंगा , जो तुम्हारे अनगिनते भक्त भी नहीं करते होंगे ? अब जा रहां हूँ सोने नहीं तो तेरे चक्कर में नींद भी ख़राब हो जाएगी !!!!!!! प्रणाम !!!!!!
I will keep counting….....


मूल बात पर भी आयेंगे .......
आमोद कुमार

पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

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