Tuesday, April 27, 2010

विपरीत प्रस्थितिओ में भी जो व्यक्ति अपनी संतुलन बनाये रखते हैं , वे सचमुच धन्य हैं ...

विपरीत प्रस्थितिओ में भी जो व्यक्ति अपनी संतुलन बनाये रखते हैं , वे सचमुच धन्य हैं !!!!
किसी अप्रत्याशित घटना के प्रति व्यक्ति की स्थिति को उसका आवेश कहा जाता है. इस स्थिति में व्यक्ति का प्रतिक्रिया करना आवश्यक नहीं होता तथापि वह मानसिक स्तर पर उन्मुक्त नहीं होता.
किसी विशेष परिस्थिति अथवा अन्य व्यक्ति द्वारा प्रतिक्रिया करने को विवश होने की स्थिति को व्यक्ति का उद्वेग कहा जाता है जो आवेश के अतिरेक से उत्पन्न होता है. उद्वेग जनित प्रतिक्रिया व्यक्त करने अथवा तदनुसार कोई कार्य करने से व्यक्ति का मानसिक आवेश शांत हो जाता है किन्तु उसके द्वारा व्यक्त प्रतिक्रिया विवेकाधीन नहीं होती |
भावुकता दो प्रकार की होती है - मोहात्मक और द्वेषात्मक. किसी व्यक्ति, स्थान अथवा वस्तु के प्रति मोह, प्रेम, राग आदि के अतिरेक की स्थिति में प्रभावित व्यक्ति मस्तिष्क के माध्यम से स्वतंत्र चिंतन न करके, मन में उर्पन्न इन भावों के अधीन हो जाता है जिससे उसके निर्णय विवेकाधीन न होने के कारण दोषपूर्ण हो सकते हैं. यही स्थिति व्यक्ति, स्तन अथवा वस्तु के प्रति अनाकर्षण भाव उत्पन्न होने से होती है.
उपरोक्त तीनों भावों के अंतर्गत ही व्यक्ति अपना मानसिक संतुलन खोता है, अर्थात मानसिक संतुलन के लिए उपरोक्त भावातिरेकों से मुक्त रहना आवश्यक होता है. इस प्रकार के सभी अतिरेकों का स्रोत व्यक्ति का मन होता है, जबकि उसका विवेक मस्तिष्क के उपयोग से सक्रिय होता है. अतः मानसिक संतुलन बनाये रखने के लिए मस्तिष्क का उपयोग आवश्यक होता है जिसके माध्यम से व्यक्ति विकाराधीन विषय पर चिंतन करता है. इस प्रक्रिया में समय लगता है, जबकि भावातिरेकों के अंतर्गत प्रतिक्रियाएं त्वरित होती हैं. इसलिए किसी भी भावातिरेक को निष्प्रभावी करने के लिए प्रतिक्रिया में विलम्ब करना लाभकर होता है, जिस अवधि में व्यक्ति का मस्तिष्क चिंतन कर लेता है |
प्रबंधन चाहे व्यक्ति का हो अथवा संगटन का, यह कुशल तभी होता है जब इसके लिए चिंतन किया जाये अर्थात त्वरित प्रतिक्रिया से बचा जाये. मन पर मस्तिष्क का अधिकार सदैव बना रहे, इसके लिए अभ्यास की आवश्यकता होती है जिससे यह अधिकार व्यक्ति के स्वबाव में समाहित हो जाता है जिससे स्वस्थ व्यक्तित्व का निर्माण होता है. कुछ व्यक्ति स्वभाव-वत ही त्वरित निर्णय लेने में सक्षम होते हैं जिसका अर्थ यह नहीं है कि वे केवल मन के अधीन कार्य कर रहे होते हैं |
व्यक्तित्व के दो चरम बिंदु होते हैं - संवेदन-शीलता और सहिष्णुता. संवेदनशील व्यक्ति पूरी तरह मन के अधीन होते अं जबकि सहिष्णु व्यक्ति पूरी तरह मस्तिष्क के अधीन होने के कारण संवेदन-शून्य होते हैं. जन-साधारण की भाषा में इन्हें व्यक्ति के जोश और होश कहा जाता है. ये दोनों ही मानव जाति के प्राकृत गुण हैं किन्तु इनमें से किसी एक की शून्यता और दूसरे की बहुलता अमानवीयता को जन्म देती है. इसलिए दोनों का संतुलन ही मनुष्य को विवेकशील मानव बनाता है. यही संतुलन व्यक्ति का मानसिक संतुलन भी कहलाता है |
अमानवीय व्यभार कभी नहीं करे , कोई भी काम करने से पहले सोंचे तब बाते करे , बिना मतलब का कोई बात ना करे ..... कोई कोई अच्छे कवि या कवित्री लिखते हैं ..... "तुम्हारे घर के गिरेबान में कोई झाके तो माफ़ करके देखना , भाषण बाज़ी रखी रह जायेगी".......अरे भाई काहें का झाका झाँखी हम करेंगे , हम तो चिंतित हैं इस बात से कि आपकी मानसिक संतुलन को कैसे ठीक करू ... हम तो आपको भी अपने घर का ही गिरेबान समझते हैं .....लेकिन आपकी समझ गायब हैं ....सब नियति का खेल हैं ... आप समझने का प्रयास करे |


!!!!!!जियो ख़ुशी से गुडिया रानी और मुझे भी जीने दो ख़ुशी से !!!!!
आमोद कुमार

पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

No comments: