Tuesday, April 6, 2010

शांत और सुरक्षित - मौन रहो तुम ...आमोद

ऋषि भास्कलिने एक बार अपने गुरु से पूछा- भगवनब्रह्म ज्ञान कैसे प्राप्त किया जा सकता है? शिष्य की इस जिज्ञासा का गुरु ने कोई उत्तर नहीं दिया। भास्कलिने सात बार यही प्रश्न दोहराया, किन्तु गुरु हर बार चुप रहे। अंत में गुरु ने कहा- वत्स, मैंने हर बार तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दिया है, पर तुम उसे समझ नहीं पाएं। ब्रह्मज्ञान को वाणी से नहीं कहा जा सकता, उसे मौन होकर ही समझा जा सकता है।
मौन से प्राण शक्ति और नई स्फूर्ति मिलती है। दरअसल, संसार के प्रत्येक प्राणी की पहचान उसकी वाणी है तथा मौन है उसकी आत्मा की भाषा। ऐसा माना जाता है कि मानव जीवन दो विराट मौन बिंदुओं के मध्य मर्यादित स्वर लहरी है। वास्तव में, मौन प्रकट वाणी से भी प्रबल होता है। वाणी की अपनी सीमा होती है, लेकिन मौन को किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता। मौन शाश्वत शांति का प्रतीक है। सच तो यह है कि मानव शांति यानी आनंद की खोज में भटकता रहता है, किन्तु इसे वन-उपवन और गुफाओंमें प्राप्त करना असंभव है। तन-मन-वचन से मौन धारण करने पर ही चिर आनन्द मिलता है। यदि हम अपनी वाणी का दुष्प्रयोग करते हैं, तो इससे हमारी आंतरिक शक्ति क्षीण होती है।
यह सच है कि वाणी द्वारा ही हम किसी को मित्र या शत्रु बनाते हैं। इसलिए यदि हम किसी व्यक्ति के प्रति गलत वाणी का प्रयोग करते हैं, तो इसका मतलब यह हुआ कि हम अपने शत्रुओं की संख्या में वृद्धि कर रहे हैं। वाक् सिद्धि का सही प्रयोजन मौन अभ्यास से ही सफल होता है। अनवरत बोलते रहने से वाणी का प्रभाव क्षीण होने लगता है। महात्मा गांधी सप्ताह में एक दिन मौन रहा करते थे।
मौन आंतरिक आनन्द लुटाता है। दरअसल, मौन हमारी आत्मा की आवाज है। मौन साधना से हमें वे सभी सिद्धियां मिल जाती हैं, जो अन्य कठिन योग साधनाओं से भी नहीं प्राप्त हो पाती हैं।
वाणी और मौन में संबंध:
वाणी चार प्रकार की होती है। नाभि में परावाणी,हृदय में पश्यन्ति,मध्यमा वाणी कंठ में और बैखरीवाणी मुख में निवास करती है। हम शब्दों की उत्पत्ति परावाणीमें करते हैं, परंतु जब शब्द स्थूल रूप धारण करता है, तब मुख में स्थित वैखरी वाणी द्वारा बाहर निकलता है। इनमें परा और पश्यन्तिसूक्ष्म तथा मध्यमा व वैखरी स्थूल हैं। वास्तव में हम मनुष्यों के लिए अनावश्यक वाणी को अपने मुंह से नहीं निकालना एवं आवश्यक कथन में भी वाणी का संयम बहुत बडी साधना है। हमारे योग साहित्य में भी दो प्रकार के मौन का उल्लेख किया गया है। प्रथम मौन का सीधा संबंध वाणी से है, जो बहिमरैनकहलाता है। अपनी वाणी को वश में करना, न बोलना बहिमरैनके अंतर्गत आता है। दूसरा मौन आत्मा से जुडा है, जो अंतमरैनकहलाता है। ईष्र्या-द्वेष या अपवित्र विचारों को अपने मन से निकाल कर आत्मोन्मुखीबनना अंतमरैनहै। दूसरों के हित के लिए कहा गया कथन भी मौन के अंतर्गत ही आएगा।

आमोद कुमार

पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

4 comments:

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