Saturday, April 17, 2010

बच्चे शरारती होते हैं, ये तो ठीक है, पर मैं जरूरत से ज्यादा ही शरारती था और आज भी हूँ !

बच्चे शरारती होते हैं, ये तो ठीक है, पर मैं जरूरत से ज्यादा ही शरारती था और आज भी हूँ !
जो उचित है, उसे कहने का हममें साहस होना चाहिए, क्योंकि अंतत: विजय सत्य की ही होती है और वही सम्मान भी पाता है।

अकबर-बीरबल की पहली मुलाकात
अकबर को शिकार का बहुत शौक था. वे किसी भी तरह शिकार के लिए समय निकल ही लेते थे. बाद में वे अपने समय के बहुत ही अच्छे घुड़सवार और शिकरी भी कहलाये. एक बार राजा अकबर शिकार के लिए निकले, घोडे पर सरपट दौड़ते हुए उन्हें पता ही नहीं चला और केवल कुछ सिपाहियों को छोड़ कर बाकी सेना पीछे रह गई. शाम घिर आई थी, सभी भूखे और प्यासे थे, और समझ गए थे की वो रास्ता भटक गए हैं. राजा को समझ नहीं आ रहा था की वह किस तरफ़ जाएं.
कुछ दूर जाने पर उन्हें एक तिराहा नज़र आया. राजा बहुत खुश हुए चलो अब तो किसी तरह वे अपनी राजधानी पहुँच ही जायेंगे. लेकिन जाएं तो जायें किस तरफ़. राजा उलझन में थे. वे सभी सोच में थे किंतु कोई युक्ति नहीं सूझ रही थी. तभी उन्होंने देखा कि एक लड़का उन्हें सड़क के किनारे खड़ा-खडा घूर रहा है. सैनिकों ने यह देखा तो उसे पकड़ कर राजा के सामने पेश किया. राजा ने कड़कती आवाज़ में पूछा, “ऐ लड़के, आगरा के लिए कौन सी सड़क जाती है”? लड़का मुस्कुराया और कहा, “जनाब, ये सड़क चल नहीं सकती तो ये आगरा कैसे जायेगी”. महाराज जाना तो आपको ही पड़ेगा और यह कहकर वह खिलखिलाकर हंस पड़ा.
सभी सैनिक मौन खड़े थे, वे राजा के गुस्से से वाकिफ थे. लड़का फ़िर बोला,” जनाब, लोग चलते हैं, रास्ते नहीं”. यह सुनकर इस बार राजा मुस्कुराया और कहा,” नहीं, तुम ठीक कह रहे हो. तुम्हारा नाम क्या है, अकबर ने पूछा. मेरा नाम महेश दास है महाराज, लड़के ने उत्तर दिया, और आप कौन हैं? अकबर ने अपनी अंगूठी निकाल कर महेश दास को देते हुए कहा, “तुम महाराजा अकबर - हिंदुस्तान के सम्राट से बात कर रहे हो”. मुझे निडर लोग पसंद हैं. तुम मेरे दरबार में आना और मुझे ये अंगूठी दिखाना. ये अंगूठी देख कर मैं तुम्हें पहचान लूंगा. अब तुम मुझे बताओ कि मैं किस रास्ते पर चलूँ ताकि मैं आगरा पहुँच जाऊं.
महेश दास ने सिर झुका कर आगरा का रास्ता बताया और जाते हुए हिंदुस्तान के सम्राट को देखता रहा.और इस तरह अकबर भविष्य के बीरबल से मिले.
अकबर-बीरबल और ऊँट की गर्दन
अकबर बीरबल की हाज़िर जवाबी के बडे कायल थे. एक दिन दरबार में खुश होकर उन्होंने बीरबल को कुछ पुरस्कार देने की घोषणा की. लेकिन बहुत दिन गुजरने के बाद भी बीरबल को धनराशि (पुरस्कार) प्राप्त नहीं हुई. बीरबल बडी ही उलझन में थे कि महारज को याद दिलायें तो कैसे?
एक दिन महारजा अकबर यमुना नदी के किनारे शाम की सैर पर निकले. बीरबल उनके साथ था. अकबर ने वहाँ एक ऊँट को घुमते देखा. अकबर ने बीरबल से पूछा, “बीरबल बताओ, ऊँट की गर्दन मुडी क्यों होती है”?
बीरबल ने सोचा महाराज को उनका वादा याद दिलाने का यह सही समय है. उन्होंने जवाब दिया - महाराज यह ऊँट किसी से वादा करके भूल गया है, जिसके कारण ऊँट की गर्दन मुड गयी है. महाराज, कहते हैं कि जो भी अपना वादा भूल जाता है तो भगवान उनकी गर्दन ऊँट की तरह मोड देता है. यह एक तरह की सजा है.
तभी अकबर को ध्यान आता है कि वो भी तो बीरबल से किया अपना एक वादा भूल गये हैं. उन्होंने बीरबल से जल्दी से महल में चलने के लिये कहा. और महल में पहुँचते ही सबसे पहले बीरबल को पुरस्कार की धनराशी उसे सौंप दी, और बोले मेरी गर्दन तो ऊँट की तरह नहीं मुडेगी बीरबल. और यह कहकर अकबर अपनी हँसी नहीं रोक पाए.और इस तरह बीरबल ने अपनी चतुराई से बिना माँगे अपना पुरस्कार राजा से प्राप्त किया.
तोता ना खाता है ना पीता है…
एक बहेलीये को तोते में बडी ही दिलचस्पी थी. वह उन्हें पकडता, सिखाता और तोते के शौकीन लोगों को ऊँचे दामों में बेच देता था. एक बार एक बहुत ही सुन्दर तोता उसके हाथ लगा. उसने उस तोते को अच्छी-अच्छी बातें सिखायीं उसे तरह-तरह से बोलना सिखाया और उसे लेकर अकबर के दरबार में पहुँच गया. दरबार में बहेलिये ने तोते से पूछा – बताओ ये किसका दरबार है? तोता बोला, “यह जहाँपनाह अकबर का दरबार है”. सुनकर अकबर बडे ही खुश हुए. वह बहेलिये से बोले, “हमें यह तोता चाहिये, बोलो इसकी क्या कीमत माँगते हो”. बहेलीया बोला जहाँपनाह – सब कुछ आपका है आप जो दें वही मुझे मंजूर है. अकबर को जवाब पसंद आया और उन्होंने बहेलिये को अच्छी कीमत देकर उससे तोते को खरीद लिया.

महाराजा अकबर ने तोते के रहने के लिये बहुत खास इंतजाम किये. उन्होंने उस तोते को बहुत ही खास सुरक्षा के बीच रखा. और रखवालों को हिदायत दी कि इस तोते को कुछ नहीं होना चाहिये. यदि किसी ने भी मुझे इसकी मौत की खबर दी तो उसे फाँसी पर लटका दिया जायेगा. अब उस तोते का बडा ही ख्याल रखा जाने लगा. मगर विडंबना देखीये कि वह तोता कुछ ही दिनों बाद मर गया. अब उसकी सूचना महाराज को कौन दे?
रखवाले बडे परेशान थे. तभी उन्में से एक बोला कि बीरबल हमारी मदद कर सकता है. और यह कहकर उसने बीरबल को सारा वृतांत सुनाया तथा उससे मदद माँगी.
बीरबल ने एक क्षण कुछ सोचा और फिर रखवाले से बोला – ठीक है तुम घर जाओ महाराज को सूचना मैं दूँगा. बीरबल अगले दिन दरबार में पहुँचे और अकबर से कहा, “हुज़ूर आपका तोता…” अकबर ने पूछा – “हाँ-हाँ क्या हुआ मेरे तोते को?” बीरबल ने फिर डरते-डरते कहा – “आपका तोता जहाँपनाह…” हाँ-हाँ बोलो बीरबल क्या हुआ तोते को? “महाराज आपका तोता….” बीरबल बोला. “अरे खुदा के लिये कुछ तो कहो बीरबल मेरे तोते को क्या हुआ”, अकबर ने खीजते हुए कहा.
“जहाँपनाह, आपका तोता ना तो कुछ खाता है ना कुछ पीता है, ना कुछ बोलता है ना अपने पँख फडफडाता है, ना आँखे खोलता है और ना ही…” राज ने गुस्से में कहा – “अरे सीधा-सीधा क्यों नहीं बोलते की वो मर गया है”. बीरबल तपाक से बोला – “हुज़ूर मैंने मौत की खबर नहीं दी ब्लकि ऐसा आपने कहा है, मेरी जान बख्शी जाये”.
और महाराज निरूत्तर हो गये.
सम्राट अकबर ने श्रीपति को ढेरों पुरस्कार दिए
अकबर के दरबार में श्रीपति नाम का कवि था। दूसरे दरबारी अकबर की प्रशंसा करते थे, जबकि वह श्रीराम का ही गुणगान करता था। फिर भी अकबर उसे पुरस्कार देते थे। इससे दरबारी उससे जलने लगे थे।
सम्राट अकबर के दरबार में कई कवि, संगीतज्ञ और विद्वान थे लेकिन ब्रज के कवि श्रीपति का उनमें विशेष स्थान था। अन्य सभी कवि सदा अकबर का ही गुणगान करते थे किंतु श्रीपति राम और कृष्ण के अतिरिक्त और किसी का गुणगान नहीं करते थे।
फिर भी अकबर उन्हें सदैव पुरस्कार व भेंट देते थे। दूसरे दरबारी श्रीपति से बहुत ईष्र्या रखते थे क्योंकि वे अकबर का गुणगान करके भी उतना धन और सम्मान नहीं पाते थे, जितना श्रीपति राम का गुणगान कर पा रहे थे। एक दिन इन्हीं ईष्र्यालु कवियों व दरबारियों ने कवि सम्मेलन के लिए जानबूझकर यह शर्त रख डाली कि सब अकबर की ही प्रशंसा करें। इन लोगों ने सोचा कि अब तो श्रीपति को राम व कृष्ण के स्थान पर अकबर का गुणगान करना पड़ेगा अन्यथा अकबर उसे दंडित करेंगे।

निश्चित दिन कवि सम्मेलन हुआ। सभी कवियों ने अकबर की प्रशंसा में एक से बढ़कर एक कविताएं सुनाईं। अंत में श्रीपति की बारी आई। उन्होंने यह समस्या पूर्ति पढ़ी- एकहि छाड़ि के दूजो भजै, सो जरै रसना अस लबनर की, अब की दुनिया गुनिया जो बनी, यह बांधती फैंट आडंबर की।
कवि श्रीपति आसरों रामहिं को, हम फैंट गही बड़ जब्बर की, जिनको हरि में है प्रीति नहीं, सो करो सब आस अकबर की। यह सुनते ही दरबारी स्तब्ध रह गए। साथ ही ईष्र्यालु खुश हुए कि अकबर इसे अब अवश्य ही दंडित करेंगे, किंतु अकबर श्रीपति की निर्भीकता और सत्यनिष्ठा से इतने प्रसन्न हुए कि सर्वाधिक पुरस्कार उन्हें ही दिए।

सार यह है कि जो उचित है, उसे कहने का हममें साहस होना चाहिए, क्योंकि अंतत: विजय सत्य की ही होती है और वही सम्मान भी पाता है।
सुख-दुख दोनों है खास
बादशाह अकबर के दरबार के नवरत्नों में बीरबल का अलग स्थान था। बादशाह कैसा भी प्रश्न पूछते, बीरबल सही व सटीक उत्तर देकर उनकी जिज्ञासा शांत कर देते। एक बार उन्होंने कहा, कुछ ऐसा लिखो जिससे खुशी के वक्त पढ़ें तो गम याद आ जाए और गम के वक्त पढ़ें तो खुशी के पल याद आएँ। बीरबल ने कुछ देर सोचा, फिर कागज पर यह वाक्य लिखकर बादशाह को दिया- यह वक्त गुजर जाएगा। सच! इन चार शब्दों के वाक्य में जीवन की कितनी बड़ी सच्चाई छुपी है।
सभी जानते हैं कि सुख-दुख जीवन के दो पहलू हैं जिनका क्रमानुसार आना-जाना लगा ही रहता है। किंतु हम सब कुछ जानते-समझते हुए भी दोनों ही वक्त अपनी भावनाओं-संवेदनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाते। जब खुशियों के पल हमारी झोली में होते हैं तो उस समय हम स्वयं में ही इतने मग्न हो जाते हैं कि क्या अच्छा क्या बुरा, इस पर कभी विचार नहीं करते हैं।

अपनी किस्मत व भाग्य पर इठलाते हुए अन्य की तुलना में श्रेष्ठ समझते हैं और अहंकारवश कुछ ऐसे कार्य तक कर देते हैं जिनसे स्वयं का हित और दूसरे का अहित हो सकता है। इस क्षणिक सुख को स्थायी मानते हुए ही जीने लगते हैं और वास्तव में यही सोच अपना लेते हैं कि अब हमें क्या चाहिए, सब कुछ तो मिल गया। बस! एक इसी भ्रांति के कारण स्वयं को उतने योग्य व सफल साबित नहीं कर पाते जितना कि कर सकते थे।
इसी तरह दुःखद घड़ी में भी अपना आपा खो बेसुध होकर सब भूल जाते हैं। छोटे-से छोटे दुःख तक में धैर्य-संयम नहीं रख पाते। बुद्धि-विवेक व आत्मबल होने के बावजूद स्वयं को इतना दयनीय, असहाय व बेचारा महसूस करते हैं कि आत्मसम्मान, स्वाभिमान तक से समझौता कर लेते हैं। यही कारण है कि सब कुछ होते हुए भी उम्रभर अयोग्य-असफल होने लगते हैं।
कहने का सार यह है कि जो भी छोटी-सी जिंदगी हमें मिली है उसमें सुख व दुख दोनों ही से हमारा वास्ता होगा, यही शाश्वत सत्य है। इस सच को हम जितनी जल्दी स्वीकार कर लेंगे उतना ही हमारे लिए अच्छा रहेगा, क्योंकि फिर ऐसा समय आने पर हम अपने संवेगों पर काबू कर उन्हें स्थिर रख सकेंगे।
आमोद कुमार

पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

1 comment:

Anonymous said...

When will you post again ? Been looking forward to this !