Tuesday, April 13, 2010

मनोरंजन संपूर्ण मानवजाति के हित के लिए है ....

.मनोरंजन संपूर्ण मानवजाति के हित के लिए है लेकिन मगर इसके दूसरे पहलू पर नजर डाली जाए तो ज्ञात होता है कि आज मनोरंजन का व्यवसायीकरण हो रहा है। मनोरंजन के लिए भले ही हजारों प्रकार के साधन उपलब्ध हो लेकिन एक गरीब तबके और आधुनिक मनोरंजन के बीच एक फर्क साफ तौर पर देखा जाँ सकता है। जो हमें यह अहसास कराता है कि मनोरंजन सर्वेत्र तो हो सकता है लेकिन हर एक वर्ग तक इसका पहुँच पाना संभव नजर नहीं आता है। मनोरंजन के लिए ईजाद किए गए टी.बी. कार्यक्रमों में व्यावसायीकरण साफ तौर पर नजर आता है, मनोरंजन के नाम पर गैर जिम्मेदाना तरीके से बसूली की जाती है। जो निशानी है कि आज मनोरंजन पूर्ण रूप से व्यावसाय का अड्डा बन गया है जो आत्मिक संतुष्टि के नाम पर लोगों की जेबों में सेध लगाने का कार्य कर रहा है।
मनोरंजन जगत ने हमें कई हुनरमंद शब्द दिए है जो छोटे पर्दे से होते हुए हम तक पहुँचे है लेकिन आज हुनरमंदी और मनोरंजन के नाम पर बिजनेस किया जा रहा है जो हमें आत्मिक संतुष्टि तो प्रदान नहीं करता बल्कि शारीरिक एवं मानसिक प्रताड़ना के लिए कुछ ठोस वजह जरूर छोड़ जाता है।
मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन सिनेमा आज शत् प्रतिशत बिकाऊ है। करोड़ों रूपये की लागत सें घटिया फिल्मों का निर्माण हो रहा है और मनोरंजन के नाम पर करोड़ों की लागत को दर्शकों पर थोपा जा रहा है। मनोरंजन का व्यावासायीकरण इसकी प्रबल तीव्रता से हजार गुना तीव्र गति से भाग रहा है। जिससे प्रत्येक क्षण हमें ज्ञात होता है कि मनोरंजन महज एक उच्च तबके की जागीर बन गया है, इसके पास नीचे तबके की जनजाति के लिए कुछ भी नही है, क्योंकि मनोरंजन की प्रथम नीव से लेकर संपूर्ण इमारत ही व्यावसायीकरण की विसात बन गयी है, जो कही ना कही चिंतनीय एवं गंभीर मुद्दा है।
मनोरंजन का संबंध प्रत्यक्ष एवं अप्रत्याक्ष रूप से संस्कृति से होता है। मनोरंजन के लिए उपलब्ध साधन प्रत्यक्ष रूप से संस्कृति को ठोस पहुँचाने में उसकी अवहेलना करने में जुटे है। मनोरंजन के लिए ब्लाॅग भी एक श्रेष्ट जरिया हुआ करते थे लेकिन आज इनका उपयोग ज्ञान और मनोरंजन के लिए ना होकर गाली गलौच एवं अपशब्दों के लिए हो रहा है, इस प्रकार यह कहना ही मुनासिव होगा की मनोरंजन संस्कृति को विकृति की ओर ले जा रहा है। मनोरंजन का सबसे लोकप्रिय साधन कहलाया जाने वाला संगीत आज फुहडपन और अश्लीलता की भेट चढ गया है जिसमें मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता और सेक्स को तवज्जों दी जा रही है जो कही ना कही यह अहसास कराता है कि सिनेमा मनोरंजन का नही खतरे का सबब बनता जा रहा हौ जो भारतीय संस्कृति पर जबरन पश्चिमी सभ्यता के छोटे-छोटे लिवासों को लपेटने की कोशिश कर रहा है। आज फैशन शो की बात हो या स्टेज शो के हालात स्थिति संस्कृति को शर्मसार करने से पीछे नहीं हटती आज मनोरंजन के नाम पर ऐच्छिक अश्लील वारदातों को अंजाम दिया जा रहा है। यह सब किसी भी व्यक्ति के लिए प्रसिद्ध होने का आसान तरीका तो हो सकता है लेकिन भारतीय संस्कृति का हिस्सा नही। मीडिया मनोरंजन के पथ को अग्रसर करने का जरिया हुआ करता था लेकिन आज मीडिया राई से पहाड़ बनाने वाली मशीन के तौर पर पहचानी जाती है। यहाॅ भरोसेमद और संविधान का चौथा स्तंभ माने जाने वाले मीड़िया के कुछ व्यवसायी किस्म के बाशिन्दे ही मनोरंजन और मीड़िया का अश्लीलता से मेल मिलाप कराने में जुटे है। जो मीडिया और मनोरंजन के प्रति नकारात्मक छवि उत्पन्न कर रहे हैं।
स्वच्छ एवं संस्कृतिनिष्ठ मनोरंजन के लिए सर्वप्रथम आवश्यक है कि तेजी से बढ रहे मनोरंजन के व्यवसायीकरण को रोका जाये जिससे मनोरंजन किसी वर्ग विशेष की अमानत बनने से बचा रहे।
मनोरंजन के नाम पर पश्चिमी सभ्यता को इतनी तबज्जो न मिले की इससे हिन्दुस्तानी संस्कृति का अपमान हो और सारी मर्यादाओं को खुलेपन की आड़ में निर्वस्त्र कर दिया जाये
मनोरंजन के लिये उपलब्ध साधनों का उपयोग औरों के हित के लिये भी होना चाहिए न कि शारीरिक एवं मानसिक गंदगी को उगलने के लिये जैसा की आज ब्लाॅगिग में हो रहा है। मुफ्त के ब्लाॅगों पर लिखना और जी भरजाने पर उसी के माध्यम से गंदगी फैलाना यह सामाजिक कदम नहीं है।
मनोरंजन का मकसद एक सीमाओं, मर्यादाओं, एवं सामाजिक हितों को ध्यान में रखकर मानव जाति को लाभ पहुँचाना है, तो इस दिशा में सार्थक एवं सकारात्मक प्रयासों की आवश्यकता है जो संस्कृति को विकृति की ओर ले जाने से रोक सके,और मानव जाति का कल्याण करने का उपयुक्त साधन बन सके।
आमोद कुमार

पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

7 comments:

Anonymous said...

Great thoughts Aamod ji..

Unknown said...

प्रिय भाई अमोद ,
बहुत ही सुंदर लेख , आज जो हिंदुस्तान का हाल होता जा रहा है उसे आपने आइना दिखाया है ...!!!

jayanti jain said...

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