सोचता हूँ विचार आदमी को क्या से क्या बना देते है ? लाखो करोडो लोगो में किसी एक के अन्दर वर्त्तमान सामाजिक परिवेश को देखते हुए विरोध स्वरूप मन में विचार आया चाहे वो धर्म से जुड़ा हो या फिर किसी भी सामाजिक व्यवस्था से हमारी बुद्धि और विवेक चीजो को वैसे नहीं स्वीकार कर पा रही थी जिसे लोग पीढ़ी दर पीढ़ी से आंख बंद करके स्वीकार करते आये थे. सत्य की खोज में उसने प्रश्न पूछने शुरू कर दिए उत्तर से उसे आत्मसंतुष्टि नहीं मिली नतीजा और विरोध बढ़ता गया. विरोध की शुरुआत घर से हुई. मित्रो के उपहास का पात्र बना समाज से विरोध मिला लेकिन वो उस विचार को एक माँ की तरह पालता गया ! समाज ने सदैव हर नए विचार का विरोध किया है. उसे स्वीकार नहीं किया क्योकि विचारक की सोच समाज से बहुत आगे की थी. चाहे वो "पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है" का विचार ही क्यों न हो. तब धर्म गुरुओ के चक्कर में उसे फांसी दे दी गयी थी. आज भले ही पूजा की जाती हो ! उस विचार या सत्य की खोज में उसने अपना पूरा जीवन लगा दिया उस विचार ने इतना ज्यादा बेचैन कर दिया कि लोग घर बार, राज गद्दी, जवान बीबी, दूध पीता बच्चा हर वैभव सुख सुविधा के साधन तक घर से छोड़ कर भाग गए ( महात्मा बुद्ध ) किसी ने बचपन में ही घर छोड़ दिया और आजीवन ब्रह्मचारी रहा ( स्वामी दयानंद सरस्वती ) और घोर विरोधो का सामना किया और और ऐसे महापुरुषो ने जीवन भर कष्ट ही कष्ट सहे. जिस समाज को लेकर उनके मन में पीड़ा था उसी समाज द्वारा तिरस्कृत किये जाने के बाद वह पीड़ा और बढ़ती ही गयी.घोर विपरीत परिस्थितियों में जब इतने उच्च स्तर का त्याग होता है. मार दिए जाने का भी डर न हो तब कही जाकर सदियों में एक समाज सुधारक, विचारक का जन्म होता है ! और सदियों के लिए अमर हो जाता है. जब हमारे जीवन में इतने उच्च स्तर का त्याग नहीं होगा तो हमारी वाणी का सामने वाले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा !पहले एक बोलता था सब सुनते थे आज सब बोलते है कोई नहीं सुनता ? आज देश इतनी जटिल समस्याओ से घिरा है कि ऐसे ही किसी दिव्य पुरुष कि जरूरत है. जब साधन नहीं हुआ करते थे तब साधक थे आज साधन ही साधन है पर कोई साधक नहीं दिखता जो ईमानदारी और समर्पित भाव से देश सेवा के बारे में सोचे. आज रोज कोई ना कोई कम्युनिटी, पार्टी बनती है देश कि सेवा के लिए जिन्हें देश सेवा नहीं अपनी प्रसिद्धि कि चिंता ज्यादा रहती है. आज हर व्यक्ति अपने को दुसरे से श्रेष्ठ लगता है ये किसी मानसिक दिवालियेपन से कम नहीं जिसका आज हर व्यक्ति शिकार है जो अपने को बुद्धजीवी लगता है और वो मान बैठा है कि वही अंतिम सत्य लेकिन सत्य कि प्रकति तो यही कहती है कि वो 'एक' ही है 'दो' नहीं हो सकते ! तरफ केवल भाषणों, उपदेशो का लिजलिजापन छाया रहता है. कैसे किसी कि तीखी बात को कटा जाय और खुद को श्रेष्ठ साबित किया जाय. भले ही मुद्दा कितना ही गंभीर क्यों न हो अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग. हम 'वो' क्यू बनने कि कोशिश कर रहे है जो हम नहीं है या नहीं बन सकते और 'वो' क्यू नहीं बने रहना चाहते जो हम है. कैसे हम अपने आपको प्रसिद्द बना पाए बिना कोई मेहनत किये चाहे देश सेवा का ढोग से लेकर पुरस्कार पाने के लिए जुगाड़ लगाने तक का हो. आज ना तो किसी के अन्दर त्याग दिखता है ना समर्पण कि भावना अगर किसी चीज का विरोध भी करना होगा तो प्रतीक स्वरूप अपने पहले पिता अंग्रेजो कि भांती मोमबत्तिया जलाकर साफ - सुथरे दिखने वाले शहरी लोगो का एक सुन्दर सा चित्र बनाकर बस हो गया और जहाँ पुलिस के डंडे लाठिया बरसी वही देश भक्ति भी घुस जाती है . ऐसे लोगो से ज्यादा तो एक वेश्या ही समाज कि सेवा करती है ....................................................
...आमोद

4 comments:
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