Thursday, April 29, 2010

मर्द कभी आँसू नहीं बहाते हैं , बल्कि आँसू बहाने के बजाये उसका रास्ता ढूढ़ते हैं !

आँसू तो तेरे मोती हैं मुर्ख , व्यर्थ में मोती मत गिरा ,  आँसू ना बहा फ़रियाद ना कर , कोई नहीं सुनेगा , जाकर वक़्त का मुकाबला कर ! वह भी डट कर  !!!!!!
भगवान भी सत्य की राह पर चलने वालों के हमेशा साथ रहता है। अब कहते हैं न कि भगवान के घर में देर है, अँधेर नहीं। इसलिए भरोसा रखें कि जीवन संग्राम में आप भी सारे कष्टों से पार पाकर अंततः विजयी होंगे।
कुछ लोग असत्य की राह पर चलकर भी बड़े मजे में रहते हैं। वे दूसरों को कष्ट देकर, उनका हक मारकर ही जीते हैं। इनकी हरकतें ऐसी होती हैं कि उन्हें देखकर किसी की भी आँखों में खून उतर आए। लेकिन इन्हें दूसरों को खून के आँसू रुलाने में ही मजा आता है, क्योंकि इनकी आँखों का पानी जो सूख चुका होता है। अगर इनकी आँखों में आँसू नजर आएँ भी तो वे मगरमच्छ के आँसू ही होते हैं, जिनके सहारे ये लोगों की भावनाओं का फायदा उठाते हैं।
आप भी ऐसी ही प्रवृत्ति के हैं यानी आप भी वहीं कर रहे हैं जो कौरवों ने किया था, तो एक दिन आपका भी वही हश्र होगा जो कौरवों का हुआ। इसलिए बेहतर यही है कि जितनी जल्दी हो सके, सत्य की राह पकड़ लें और लोगों के आँसू पोंछने की कोशिश करें वर्ना जब आपके आँसू बहेंगे तो कोई उन्हें पोंछने नहीं आएगा।

'ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आँख में भर लो पानी' गणतंत्र दिवस के अवसर पर जब पहली बार लता मंगेशकर जी ने इन पंक्तियों को गाया था तो उसे सुनकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे थे। वाकई इन पंक्तियों में है ही इतनी शक्ति कि आज भी अच्छे-अच्छों की आँखों में पानी आ जाता है।
आज व्यक्ति धन-वैभव का अहंकार करता है, परंतु वह अंत में धराशायी हो जाता है। जिसके जीवन में विनय का गुण है, वह ज्ञान प्राप्त कर सकता है।यदि ज्ञान पाना है तो अहंकार का विसर्जन करना ही होगा।
बच्चों को यह प्रेरणा दे कि वे प्रतिदिन प्रातः अपने माता-पिता और गुरु के चरणों में वंदन अवश्य करें।
महिलाएँ पुरुष की अपेक्षा कम तनावग्रस्त रहती हैं। इसका मूल कारण यही है कि वे पुरुषों की भाँति भावनात्मक संवेगों को दबाती नहीं बल्कि आँसुओं के जरिए मन के भार को हल्का कर देती हैं।
स्वास्थ्य के लिए हँसना अभी तक लाभदायक माना जाता रहा है, किंतु नई खोजों के आधार पर यह सिद्ध हो चुका है कि रोना भी स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। रोकर अनेक तरह के रोगों का उपचार किया जा सकता है।
पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियाँ रोकर अपनी आयु में वृद्धि कर लेती हैं, जबकि पुरुष अपने अहं के कारण रोना नहीं चाहते हैं और अनेक प्रकार के रोगों से घिरे रहते हैं। यदि पुरुष भी मानसिक आघातों से त्रस्त होने पर आँसू बहा दिया करें तो उनमें रक्तचाप एवं हृदय संबंधी रोगों में कमी आ सकती है। जोर से रोने पर मनुष्य के मस्तिष्क में दबी भावनाओं का तनाव दूर हो जाता है, जिससे काफी राहत महसूस होती है एवं शक्ति की भी अनुभूति होती है।
महिलाओं में रोने का गुण होने के कारण ही पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों को दिल के दौरे कम पड़ते हैं। स्त्रियाँ रोकर अपने दिल का बोझ हलका कर लेती हैं। अपने मानसिक तनावों को आँसुओं द्वारा कम न कर पाने के कारण पुरुष प्रायः धमनियों संबंधी शिकायतों से ग्रस्त रहते हैं।
आँसू के कारण ही आँखें नम रहती हैं। भावनात्मक आँसू अवसाद, उदासी एवं क्रोध को समाप्त करते हैं। रोने से मन का संपूर्ण मैल धूल जाता है। अतः जब कभी भी किसी कारण से रोना आए तो उसे रोकना नहीं चाहिए, बल्कि खुलकर बाहर आने देना चाहिए। अन्यथा आँखों में रुके हुए ये आँसू स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं।
हमें अपनी दोस्ती का सबूत देते हें यह आँसू........
माता जीवन का निर्माण करती है, तो पिता उसे उन्नति के शिखर तक ले जाता है। जो व्यक्ति अपनी माँ को प्रसन्न रखता है, वह उसके आशीर्वाद का वरदान भी पाता है। ऐसी परम उपकारी वात्सल्य मूर्ति माँ की आँखों में कभी आँसू नहीं आने देना। जो विनयपूर्वक परमात्मा और सद्गुरु के चरणों में समर्पित हो जाता है, वह सबकुछ पा जाता है।
माँ का फ़ोन कॉल हैं, बहुत तंग करती हैं , कुछ लिखने भी नहीं देती हैं !
आँसू मन का दर्पण होते हैं, जो न कहने पर भी बहुत कुछ कह जाते हैं, बहुत कुछ बता जाते हैं। चाहे तकिए में मुँह दबाकर निकालें या घर के कोने में बैठकर, अकेले में रोएँ या भीड़ के बीच आँसू बहाएँ, आँसू तो दुःखड़ा बयाँ कर ही जाते हैं।
हौसला ना छोड़ कर सामना जहां का ,बदल रहा है देख रंग आसमान का ,ये शिकस्त का नहीं ये फ़तेह का रंग है ,ज़िन्दगी हर कदम एक नयी जंग है ,जीत जायेंगे हम ,जीत जायेंगे हम तू अगर संग है .....
आमोद कुमार
पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

साथियो हमें नया इतिहास बनाना है !

ज़ुल्म करने से बुरा है , ज़ुल्म सहन करना , डर के जीने से अच्छा है सामने लडके मरना भाई !
जुल्म ना ज़ालिम का अधिकार रहेगा दुनिया में कुछ रहेगा तो बस प्यार रहेगा !
हम सबको जगा देंगे इस हाथ से, बस तुम अपने  हाथ को मेरे  साथ मिला दो
सच्चाई से हम  झूठ क़ी  बुनियाद हिला देंगे
वक़्त क़ी आवाज़ से आवाज़ मिला देंगे , जनता के हाथ क़ी ताकत जगा देंगे
आदमी ना आदमी का गुलाम रहेगा , ना ही सीना जोरी और ना ही इंतकाम रहेगा
आगाज़ ना अंजाम रहेगा जो बाकी रहा तो खुदा का नाम रहेगा

हिंदुस्तान में कुछ रहेगा तो बस प्यार रहेगा | 

आमोद कुमार

पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

Tuesday, April 27, 2010

विपरीत प्रस्थितिओ में भी जो व्यक्ति अपनी संतुलन बनाये रखते हैं , वे सचमुच धन्य हैं ...

विपरीत प्रस्थितिओ में भी जो व्यक्ति अपनी संतुलन बनाये रखते हैं , वे सचमुच धन्य हैं !!!!
किसी अप्रत्याशित घटना के प्रति व्यक्ति की स्थिति को उसका आवेश कहा जाता है. इस स्थिति में व्यक्ति का प्रतिक्रिया करना आवश्यक नहीं होता तथापि वह मानसिक स्तर पर उन्मुक्त नहीं होता.
किसी विशेष परिस्थिति अथवा अन्य व्यक्ति द्वारा प्रतिक्रिया करने को विवश होने की स्थिति को व्यक्ति का उद्वेग कहा जाता है जो आवेश के अतिरेक से उत्पन्न होता है. उद्वेग जनित प्रतिक्रिया व्यक्त करने अथवा तदनुसार कोई कार्य करने से व्यक्ति का मानसिक आवेश शांत हो जाता है किन्तु उसके द्वारा व्यक्त प्रतिक्रिया विवेकाधीन नहीं होती |
भावुकता दो प्रकार की होती है - मोहात्मक और द्वेषात्मक. किसी व्यक्ति, स्थान अथवा वस्तु के प्रति मोह, प्रेम, राग आदि के अतिरेक की स्थिति में प्रभावित व्यक्ति मस्तिष्क के माध्यम से स्वतंत्र चिंतन न करके, मन में उर्पन्न इन भावों के अधीन हो जाता है जिससे उसके निर्णय विवेकाधीन न होने के कारण दोषपूर्ण हो सकते हैं. यही स्थिति व्यक्ति, स्तन अथवा वस्तु के प्रति अनाकर्षण भाव उत्पन्न होने से होती है.
उपरोक्त तीनों भावों के अंतर्गत ही व्यक्ति अपना मानसिक संतुलन खोता है, अर्थात मानसिक संतुलन के लिए उपरोक्त भावातिरेकों से मुक्त रहना आवश्यक होता है. इस प्रकार के सभी अतिरेकों का स्रोत व्यक्ति का मन होता है, जबकि उसका विवेक मस्तिष्क के उपयोग से सक्रिय होता है. अतः मानसिक संतुलन बनाये रखने के लिए मस्तिष्क का उपयोग आवश्यक होता है जिसके माध्यम से व्यक्ति विकाराधीन विषय पर चिंतन करता है. इस प्रक्रिया में समय लगता है, जबकि भावातिरेकों के अंतर्गत प्रतिक्रियाएं त्वरित होती हैं. इसलिए किसी भी भावातिरेक को निष्प्रभावी करने के लिए प्रतिक्रिया में विलम्ब करना लाभकर होता है, जिस अवधि में व्यक्ति का मस्तिष्क चिंतन कर लेता है |
प्रबंधन चाहे व्यक्ति का हो अथवा संगटन का, यह कुशल तभी होता है जब इसके लिए चिंतन किया जाये अर्थात त्वरित प्रतिक्रिया से बचा जाये. मन पर मस्तिष्क का अधिकार सदैव बना रहे, इसके लिए अभ्यास की आवश्यकता होती है जिससे यह अधिकार व्यक्ति के स्वबाव में समाहित हो जाता है जिससे स्वस्थ व्यक्तित्व का निर्माण होता है. कुछ व्यक्ति स्वभाव-वत ही त्वरित निर्णय लेने में सक्षम होते हैं जिसका अर्थ यह नहीं है कि वे केवल मन के अधीन कार्य कर रहे होते हैं |
व्यक्तित्व के दो चरम बिंदु होते हैं - संवेदन-शीलता और सहिष्णुता. संवेदनशील व्यक्ति पूरी तरह मन के अधीन होते अं जबकि सहिष्णु व्यक्ति पूरी तरह मस्तिष्क के अधीन होने के कारण संवेदन-शून्य होते हैं. जन-साधारण की भाषा में इन्हें व्यक्ति के जोश और होश कहा जाता है. ये दोनों ही मानव जाति के प्राकृत गुण हैं किन्तु इनमें से किसी एक की शून्यता और दूसरे की बहुलता अमानवीयता को जन्म देती है. इसलिए दोनों का संतुलन ही मनुष्य को विवेकशील मानव बनाता है. यही संतुलन व्यक्ति का मानसिक संतुलन भी कहलाता है |
अमानवीय व्यभार कभी नहीं करे , कोई भी काम करने से पहले सोंचे तब बाते करे , बिना मतलब का कोई बात ना करे ..... कोई कोई अच्छे कवि या कवित्री लिखते हैं ..... "तुम्हारे घर के गिरेबान में कोई झाके तो माफ़ करके देखना , भाषण बाज़ी रखी रह जायेगी".......अरे भाई काहें का झाका झाँखी हम करेंगे , हम तो चिंतित हैं इस बात से कि आपकी मानसिक संतुलन को कैसे ठीक करू ... हम तो आपको भी अपने घर का ही गिरेबान समझते हैं .....लेकिन आपकी समझ गायब हैं ....सब नियति का खेल हैं ... आप समझने का प्रयास करे |


!!!!!!जियो ख़ुशी से गुडिया रानी और मुझे भी जीने दो ख़ुशी से !!!!!
आमोद कुमार

पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

Monday, April 26, 2010

लोक नायक जय प्रकाश नारायण क्रान्ति का सूत्रपात गांव से करना चाहते थे....



लोक नायक जयप्रकाश नारायण क्रान्ति का सूत्रपात गांव से करना चाहते थे..
लोक नायक जय प्रकाश नारायण का मानना था कि गांव की हर एक समस्या का चिन्तन ही सम्पूर्ण या समग्र क्रान्ति का पहलू है। इसलिए रचना, संघर्ष, शिक्षण और संगठन की चतुर्विधि प्रक्रिया से वो गांवों को बदलना चाहते थे। उनका कहना था कि जब गांव बदलेंगे तो शहर भी बदले बिना नहीं रहेंगे।
1977 के छात्र आन्दोलन का नेतृत्व जब लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने संभाला तब यह आन्दोलन व्यवस्था परिवर्तन के आन्दोलन में बदल गया। यह अलग बात है कि जे.पी. आन्दोलन के गर्भ से निकले छात्र नेता सत्ता की चकाचौंध में इस तरह से डूबे कि जे.पी. की सम्पूर्ण क्रान्ति को भूल गए। इन तत्कालीन ‘छात्र नेताओं’ ने सम्पूर्ण क्रान्ति की सम्पूर्ण हत्या कर दी।


जे.पी. ने कोई पद स्वीकार नहीं किया था |सम्पूर्ण क्रान्ति का नारा जनता के लिए है। उसका मोर्चा हर गांव, शहर, कार्यालय, विद्यालय और कारखाने में है, यहां तक की हर परिवार में है। जे.पी. इस क्रान्ति के माध्यम से सरकार, समाज, शिक्षा, चुनाव, बाजार और विकास की योजना, हर चीज में परिवर्तन चाहते थे। वे दहेज, छुआछूत, ऊंच-नीच के भेदभाव को दूर कर खुदगर्जी के स्थान पर पारस्परिक सहयोग स्थापित करना चाहते थे। जे.पी. की मान्यता थी कि क्रान्ति सरकारी शक्ति से नहीं जन शक्ति से होगी।इसलिए उन्होंने लोक शक्ति को सामाजिक परिवर्तन का साधन बनाया था |

जे.पी. क्रान्ति के माध्यम से समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति का विकास चाहते थे तथा विकास की प्रक्रिया की शुरूआत भी उसी अंतिम व्यक्ति से करना चाहते थे।जो सबसे गरीब और असहाय है उसकी चिन्ता पहले की जाए और उसका उदय सबसे पहले हो। ताकि वो भी अपनी पीठ सीधी कर सके। अपने अधिकारों की मांग कर सके। उसके लिए लड़ सके।

जे.पी. का मानना था कि मनुष्य के गुण, कर्म और चरित्र के अनुसार उसकी इज्जत होनी चाहिए, न कि जाति के अनुसार।जातिवाद के साथ जुड़ी हुई सभी परम्पराओं का उन्मूलन करना होगा। वे समाज में समरसता लाने के लिए ब्राह्मण- हरिजन सहभोज और अन्तर्जातीय विवाह आदि पर बहुत जोर देते थे।उन्होंने दहेज का भी कड़ा विरोध किया जो आज परिवार की प्रतिष्ठा और कुल की मर्यादा का अंग बन गया है। वे अफसोस के साथ कहते थे कि शादी-विवाह के पवित्र संस्कार आज बाजारू बन गए हैं। उन्होंने दहेज का बहिष्कार करने की शपथ भी युवाओं को दिलाई थी। वे उनसे कहते थे कि तुम लोग बैल, घोड़े या अन्य जानवर नहीं हो, जिसको बाजार में बेचा जाए।
राजनीतिक क्षेत्र में जे.पी. सत्ता के विकेन्द्रीकरण के प्रबल पक्षधर थे। वे चाहते थे कि प्रत्याशियों का चयन तथा राजसत्ता पर नियंत्रण जनता के द्वारा होना चाहिए। वे लोक चेतना के द्वारा जनता को जगाकर उसे लोकतंत्र का प्रहरी बनाना चाहते थे ताकि नीचे के कर्मचारी से लेकर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक सबके काम काज पर निगरानी रखी जा सके। वे चाहते थे कि जन प्रतिनिधियों को समय से पूर्व वापस बुलाने का अधिकार उस क्षेत्र की जनता को मिले ताकि जन प्रतिनिधियों को अपने निर्वाचन क्षेत्र के प्रति जवाबदेह बनाया जा सके।
वास्तव में जे.पी. मूलत: राजनीतिज्ञ नहीं बल्कि एक राजनीतिक दार्शनिक थे। शायद यही कारण था कि वे अपने चेलों को अच्छी तरह पहचान नहीं पाए। वे अपने साथ ऐसे लोगों को नहीं जोड़ पाए जो उनके आदर्श को आगे बढ़ाने का काम करते। अगर उन्होंने ऐसा कर लिया होता तो संपूर्ण क्रांति का उनका नारा आज केवल नारा नहीं होता। बल्कि उसका असर हम आज अपने चारों ओर दिखायी देता। खैर जो अभी तक नहीं हुआ वह आगे भी नहीं होगा, यह जरूरी नहीं। देश की युवा पीढ़ी को उनके सपनों को पूरा करने के लिए आगे आना होगा।
आमोद कुमार

पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

हमेशा अपना सोंच सकारात्मक रखे !

आमतौर प़र क्रोध  और उदासी ईर्ष्या की यह भावना असुरक्षा, भय, नकारात्मक विचारों आदि के कारण उत्पन्न होती है। क्रोध और उदासी ईर्ष्या के मित्र हैं और इसके उत्पन्न होते ही इसके साथ आ जुड़ते हैं। ये क्रोध और उदासी फिर आदमी को भड़काने लगते हैं |
हमेशा अपना सोंच सकारात्मक रखे ! प्रभु ने सभी प्राणी को अपार उर्जा के साथ इस पृथ्वी प़र भेजा हैं , कुछ लोग हमेशा अपना सोंच नकारात्मक ही रखकर अपनी उर्जा को नष्ट करते हैं उन्हें यह नहीं भूलनी चाहिए कि इस से कुछ क्षण के लिए शान्ति मिलती हैं , और वे सदैव दुःख की ओर अग्रसर होते जाते हैं इससे उनको परेशानी होती हैं ना की किसी और को | परिणाम स्वरुप नकारात्मक सोंच रखने वाले व्यक्ति मानसिक रोग के शिकार बन जाते हैं .....
[कोई विश्वास करे या ना करे , हम इस बात क़ी फिक्र कभी नहीं करते हैं ] लेकिन पता नहीं क्यों हम हमेशा अपने आप में मगन रहते हैं , जहाँ जो भी अच्छा कार्य मिला उसको करने के बाद ही आराम करने क़ी सोंचते हैं और ऐसी नींद अच्छी नींद से सोते हैं क़ी पुछिये मत |
हमारे आस पास कुछ महापुरुष भी रहते हैं , जिन्हें हम प़र खूब गुस्सा रहता हैं , लेकिन मैं सच कह रहा हूँ , मुझे कोई गुस्सा उनपर नहीं रहता हैं , क्योंकि यह मुझे मालूम हैं क़ी पूर्व में भी कुछ व्यक्ति राक्षस (निर्दय मनुष्य) होते थे और कुछ व्यक्ति देवता स्वरुप ...... आज भी हम सब में जिनका सोंच अच्छा हैं , उन्हें देवता कहा जाता हैं और जिनकी सोंच बुडी हैं उन्हें राक्षस |
राक्षसों क़ी कहानी में दोस्तों उन्हें बड़ी बड़ी सिंघ लगाया के दर्शाया जाता रहा हैं ताकि हम सब उस किताब को ध्यान से पढ़े , लेकिन वास्तव में ऐसी कोई भी सिंघ राक्षसों में नहीं लगा रहता हैं , वह भी आम मनुष्य के तरह होते हैं , सिर्फ फर्क इतना रहता हैं कि वे अपनी निर्दयिता से लोगो को तंग और परेशान करते हैं , और हमेशा अच्छे व्यक्ति राक्षसों के व्यभार से परेशान होते रहते हैं , लेकिन अंततः विजय अच्छे लोग ही होते हैं और राक्षसों कि पराजय होती हैं |


इस लिए अच्छे कार्यो को करते रहना हैं , अपना सोंच सकारात्मक रखना हैं , गलत कार्य की ओर कभी ध्यान देने की भी आवश्यकता नहीं हैं , और फिर देखिये आप हमेशा आनंदित रहेंगे |
अपने आप को हमेशा कोई ना कोई काम में व्यस्त रखे , अगर कोई कार्य नहीं मिले तो अच्छी अच्छी किताबे पढना शुरू कर दे जब भी समय मिले कबीरदास जी की वाणी को पढ़े या किसी से पूछे वाणी की मधुरता ऐसी लाये की राक्षसगण भी खुश हो जाये ... मीठी वाणी बोलिए |
हम अच्छी अच्छी गाना सुन कर अकेले में झूम उठते हैं , लेकिन लोगो की बीच में जाकर खामोश हो जाते हैं , क्योंकि हमारी मजबूरी हैं , लोग तुरंत फुहर कहना शुरू कर देंगे ,,,,, लेकिन हम तो झूमते हैं गाना के बोल प़र , किसी संगीतकार के तर्ज प़र और लोग व्यर्थ में अर्थ का अनर्थ निकलना शुरू कर देंगे ..........क़ि  अरे देखो इस लड़का को कही ना कहीं जरूर इसको किसी लड़की से प्यार हो गया हैं , तभी यह गाना सुन भी रहा और साथ साथ गा भी रहा हैं ................ ....
[प्रेम की गाली में इक छोटा सा घर बनायेंगे,

कलियाँ ना मिले ना सही, काँटो से सजायेंगे ,
बगिया से सुन्दर वो बन होगा ,
रिमझिम बरसता सावन होगा ,
झिलमिल सितारों का आँगन होगा ...........................]
लेकिन हमको कौन गाना का लाइन प्रेरित करता वह सुनिए """""""कलियाँ ना मिले ना सही, काँटो से सजायेंगे """""""""

मेरा साफ़ मतलब रहता हैं क़ि यार छोड़ो .......हमको काँटो प़र भी चलना पड़े तो भी चलेंगे, लेकिन राक्षसबा सबसे के तरफ ध्यान भी नहीं देंगे उनका मुकाबला करेंगे , वह भी डटकर एवं अच्छे व्यक्तियों को सम्मानित करेंगे, और जीवन को सुद्ध , सरल बनाकर , अपने अच्छे लक्ष्य को प्राप्त करेंगे
मेरा भी सभी लोग से निवेदन होगा क़ि आप भी कुछ इस तरह का अच्छा प्रयास करे , तभी अच्छी अच्छी बाते बनेंगी , यह कहकर पल्ला मत झारे क़ि हम एक अकेला क्या करेंगे .......लेकिन यह मत भूलिए क़ि 1 से ही अनेको कारवा बने  है , पांडव पाँच भाई ने ही मिलकर कौरवो क़ी सेना को पराजित किया था !
||||मेरी यह कहानी कहाँ से शुरू हुई , कहाँ ख़त्म हुई जरूर आपको अटपटा सा जरूर लग रहा होगा .........लेकिन आप लोग समझने का प्रयास करे |||||||
जय हिंद
आमोद कुमार

पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

Sunday, April 25, 2010

भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी सेना अजेय है !

भीष्म पितामह की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है जो कि महाभारत के आरंभ से लेकर लगभग अंत तक |
भीष्म प्रतिज्ञा
हस्तिनापुर के महाराज प्रतीप गंगा के किनारे तपस्या कर रहे थे। उनके रूप-सौन्दर्य से मोहित हो कर देवी गंगा उनकी दाहिनी जाँघ पर आकर बैठ गईं। महाराज यह देख कर आश्चर्य में पड़ गये तब गंगा ने कहा, “हे राजन्! मैं जह्नु ऋषि की पुत्री गंगा हूँ* और आपसे विवाह करने की अभिलाषा ले कर आपके पास आई हूँ।” इस पर महाराज प्रतीप बोले, “गंगे! तुम मेरी दहिनी जाँघ पर बैठी हो। पत्नी को तो वामांगी होना चाहिये, दाहिनी जाँघ तो पुत्र का प्रतीक है अतः मैं तुम्हें अपने पुत्रवधू के रूप में स्वीकार करता हूँ।” यह सुन कर गंगा वहाँ से चली गईं।अब महाराज प्रतीप ने पुत्र प्राप्ति के लिये घोर तप करना आरम्भ कर दिया। उनके तप के फलस्वरूप उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम उन्होंने शान्तनु रखा। शान्तनु के युवा होने पर उसे गंगा के साथ विवाह करने का आदेश दे महाराज प्रतीप स्वर्ग चले गये। पिता के आदेश का पालन करने के लिये शान्तनु ने गंगा के पास जाकर उनसे विवाह करने के लिये निवेदन किया। गंगा बोलीं, “राजन्! मैं आपके साथ विवाह तो कर सकती हूँ किन्तु आपको वचन देना होगा कि आप मेरे किसी भी कार्य में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।” शान्तनु ने गंगा के कहे अनुसार वचन दे कर उनसे विवाह कर लिया। गंगा के गर्भ से महाराज शान्तनु के आठ पुत्र हुये जिनमें से सात को गंगा ने गंगा नदी में ले जा कर बहा दिया और अपने दिये हुये वचन में बँधे होने के कारण महाराज शान्तनु कुछ बोल न सके। जब गंगा का आठवाँ पुत्र हुआ और वह उसे भी नदी में बहाने के लिये ले जाने लगी तो राजा शान्तनु से रहा न गया और वे बोले, “गंगे! तुमने मेरे सात पुत्रों को नदी में बहा दिया किन्तु अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मैंने कुछ न कहा। अब तुम मेरे इस आठवें पुत्र को भी बहाने जा रही हो। मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि कृपा करके इसे नदी में मत बहाओ।” यह सुन कर गंगा ने कहा, “राजन्! आपने अपनी प्रतिज्ञा भंग कर दी है इसलिये अब मैं आपके पास नहीं रह सकती।” इतना कह कर गंगा अपने पुत्र के साथ अन्तर्ध्यान हो गईं। तत्पश्चात् महाराज शान्तनु ने छत्तीस वर्ष ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर के व्यतीत कर दिये। फिर एक दिन उन्होंने गंगा के किनारे जा कर गंगा से कहा, “गंगे! आज मेरी इच्छा उस बालक को देखने की हो रही है जिसे तुम अपने साथ ले गई थीं।” गंगा एक सुन्दर स्त्री के रूप में उस बालक के साथ प्रकट हो गईं और बोलीं, “राजन्! यह आपका पुत्र है तथा इसका नाम देवव्रत है, इसे ग्रहण करो। यह पराक्रमी होने के साथ विद्वान भी होगा। अस्त्र विद्या में यह परशुराम के समान होगा।” महाराज शान्तनु अपने पुत्र देवव्रत को पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुये और उसे अपने साथ हस्तिनापुर लाकर युवराज घोषित कर दिया।
एक दिन महाराज शान्तनु यमुना के तट पर घूम रहे थे कि उन्हें नदी में नाव चलाते हुये एक सुन्दर कन्या दृष्टिगत हुई। उसके अंग अंग से सुगन्ध निकल रही थी। महाराज ने उस कन्या से पूछा, “हे देवि! तुम कौन हो?” कन्या ने बताया, “महाराज! मेरा नाम सत्यवती है और मैं निषाद कन्या हूँ।” महाराज उसके रूप यौवन पर रीझ कर तत्काल उसके पिता के पास पहुँचे और सत्यवती के साथ अपने विवाह का प्रस्ताव किया। इस पर धींवर (निषाद) बोला, “राजन्! मुझे अपनी कन्या का आपके साथ विवाह करने में कोई आपत्ति नहीं है परन्तु आपको मेरी कन्या के गर्भ से उत्पन्न पुत्र को ही अपने राज्य का उत्तराधिकारी बनाना होगा।।” निषाद के इन वचनों को सुन कर महाराज शान्तनु चुपचाप हस्तिनापुर लौट आये।सत्यवती के वियोग में महाराज शान्तनु व्याकुल रहने लगे। उनका शरीर दुर्बल होने लगा। महाराज की इस दशा को देख कर देवव्रत को बड़ी चिंता हुई। जब उन्हें मन्त्रियों के द्वारा पिता की इस प्रकार की दशा होने का कारण ज्ञात हुआ तो वे तत्काल समस्त मन्त्रियों के साथ निषाद के घर जा पहुँचे और उन्होंने निषाद से कहा, “हे निषाद! आप सहर्ष अपनी पुत्री सत्यवती का विवाह मेरे पिता शान्तनु के साथ कर दें। मैं आपको वचन देता हूँ कि आपकी पुत्री के गर्भ से जो बालक जन्म लेगा वही राज्य का उत्तराधिकारी होगा। कालान्तर में मेरी कोई सन्तान आपकी पुत्री के सन्तान का अधिकार छीन न पाये इस कारण से मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं आजन्म अविवाहित रहूँगा।” उनकी इस प्रतिज्ञा को सुन कर निषाद ने हाथ जोड़ कर कहा, “हे देवव्रत! आपकी यह प्रतिज्ञा अभूतपूर्व है।” इतना कह कर निषाद ने तत्काल अपनी पुत्री सत्यवती को देवव्रत तथा उनके मन्त्रियों के साथ हस्तिनापुर भेज दिया।देवव्रत ने अपनी माता सत्यवती को लाकर अपने पिता शान्तनु को सौंप दिया। पिता ने प्रसन्न होकर पुत्र से कहा, “वत्स! तूने पितृभक्ति के वशीभूत होकर ऐसी प्रतिज्ञा की है जैसी कि न आज तक किसी ने किया है और न भविष्य में करेगा। मैं तुझे वरदान देता हूँ कि तेरी मृत्यु तेरी इच्छा से ही होगी। तेरी इस प्रकार की प्रतिज्ञा करने के कारण तू भीष्म कहलायेगा और तेरी प्रतिज्ञा भीष्म प्रतिज्ञा के नाम से सदैव प्रख्यात रहेगी।”



 
मंज़िल बाक़ी है दोस्त







शिखण्डी की कहानी
उलूक ने कौरवों के शिविर में पहुँचकर दुर्योधन को पाण्डवों के द्वारा दिया गया संदेश ज्यों का त्यों सुना दिया। जब अन्त में उसने कहा कि शिखण्डी ने कहा है कि ‘इस युद्ध में मेरा केवल एकमात्र उद्‍देश्य है – भीष्म के प्राण हरण करना।’ तो दुर्योधन बोला, “पितामह जैसे पराक्रमी योद्धा को भला शिखण्डी क्या मार पायेगा?” उसकी बात सुनकर वहाँ पर उपस्थित भीष्म पितामह ने कहा, “दुर्योधन! शिखण्डी पूर्व जन्म में स्त्री थी, यदि वह युद्ध में उतरता है तो मैं उसकी ओर पीठ घुमा दूँगा क्योंकि मैं उस पर कदापि अपने अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग नहीं कर सकता।”
भीष्म पितामह के वचन सुनकर दुर्योधन भयभीत सा हो गया और पूछा, “हे पितामह! कृपा करके आप हमें शिखंडी का पूरा वृतान्त बताइये।” भीष्म ने उत्तर दिया, “दुर्योधन! अम्बा की सहायता के लिये जब मेरे गुरु परशुराम ने मुझसे युद्ध किया और देवताओं ने हम दोनों में समझौता करवाकर उस युद्ध को रुकवा दिया | अम्बा ने मुझसे अपना प्रतिशोध लेने के लिये कठोर तपस्या की। अपने तपोबल के प्रभाव से उसने अपने शरीर को दो भागों मे विभाजित कर लिये। उसका आधा अंग अम्बा नामक नदी बन गई और शेष आधे अंग से वह वत्स देश के राजा के यहाँ कन्या बनकर उत्पन्न हुई। उस जन्म में भी अम्बा अपने प्रतिशोध को न भूल पाई और उसने फिर घोर तपस्या करना आरम्भ कर दिया। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उसे साक्षात् दर्शन देकर वर माँगने के लिये कहा। तब उसने मुझे मारने का वर माँगा। शंकर जी बोले तू भीष्म के वध का निमित्त अवश्य बनेगी किन्तु इसके लिये तुम्हें एक बार और जन्म लेना होगा। अगली बार तू राजा द्रुपद के यहाँ कन्या के रूप में जन्म लेगी और कुछ काल के पश्‍चात् तुझे पुरषत्व प्राप्त होगा तभी तेरा मनोरथ सफल होगा। इतना कहकर भगवान शंकर अन्तर्ध्यान हो गये और उस कन्या ने अग्नि में प्रवेश करके अपना शरीर त्याग कर दिया।“इधर राजा द्रुपद ने भी पुत्र प्राप्ति के लिये शंकर भगवान की तपस्या की। प्रसन्न होकर शंकर जी ने उन से कहा कि पुत्र तुझे अवश्य प्राप्त होगा किन्तु उसका जन्म कन्या के रूप में होगा और बाद में उसे पुरुषत्व की प्राप्ति होगी। समय आने पर अम्बा ने द्रुपद के घर कन्या के रूप में फिर से जन्म लिया। शंकर भगवान की कृपा से द्रुपद को पहले ही पता था कि यह कन्या बाद में पुरुष बन जायेगी इसलिये उस कन्या का नाम शिखण्डी रख कर उन्होंने सब ओर यह प्रकट कर दिया कि पुत्र हुआ है। शिखण्डी का पालन पोषण पुरुष रूप में ही किया गया और उसे पुरुषोचित अस्त्र-शस्त्रादि का प्रशिक्षण भी दिया गया। विवाह योग्य होने पर राजा द्रुपद ने उसका विवाह दशार्णराज हिरण्यकर्मा की पुत्री के साथ कर दिया। भेद खुल जाने के भय से विवाह की रात्रि को ही शिखण्डी अपने प्राणों की आहुति देने के लिये वन में चली गई। वन में उसकी भेंट स्थूणा कर्ण नामक यक्ष से हुई और वह सीमित काल के लिये शिखण्डी के स्त्रीत्व को लेर अपना पुरुषत्व देने के लिये तैयार हो गया।“स्थूना कर्ण के पुरुषत्व को लेकर शिखण्डी के अपने महल में लौट जाने के कुछ काल पश्‍चात् उस वन में यक्षराज कुबेर आ पहुँचे और स्थूना कर्ण को स्त्री रूप में देखकर क्रोधित हो शाप दे दिया कि शिखण्डी की मृत्यु पश्‍चात् ही तुझे तेरा पुरषत्व प्राप्त हो पायेगा। इस प्रकार शिखण्डी का स्त्रीरूप उसके इस पूरे जन्म के लिये पुरुषरूप में परिणित हो गया किन्तु मैं उसे स्त्रीरूप में ही देखता हूँ।”
भीष्म पितामह चुकि अम्बा  के बारे में जानते थे ........क़िउन्होंने ही शिखंडी का रूप धारण कर नया जन्म लेकर उनसे युद्ध करने आई थी ....इसी कारण से भीष्म पितामह शिखंडी  से युद्ध करने से बचते रहे ........
यह लेख अभी शुद्ध रूप से पुरा नहीं हैं ...चुकि नींद आ रही हैं ....इसलिए कल लिखूंगा ......


आमोद कुमार
पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

Saturday, April 24, 2010

हमारे पूर्वजो ने कहा हैं कि,गरजने वाले बादल बरसते नहीं हैं !

बचपन से सुनता आया हूँ कि गरजने वाले बादल कभी बरसते नहीं हैं
गरजने वाले बादल बरसते नहीं हैं सिर्फ गरज गरज कर अपना रोष दिखाते हैं भड़क भड़क कर,कड़क कड़क कर,बिजली ख़ूब गिराते हैं लेकिन विद्वान और बहादुर लोग कहाँ इसकी परवाह करते हैं |
बातों को उल्टा पुल्टा बताकर दूसरों को प्रभावित करने वाले लोग कायर होते हैं , हिम्मत हो तो सच बोलो सामने आकर हम भी आदर करेंगे |


 रूद्रों को अग्नि-रूपी, वृष्टि करने वाले और गरजने वाले देवता भी कहा गया है। रूद्रों को अपार्य भी कहते हैं। भगवान शंकर का एक रूप भी रूद्र कहा गया है। कामदेव को भस्म और दक्ष का यज्ञ ध्वंस करते समय उन्होंने रौद्र रूप धारण किया था।शंकर की उपासना रूद्र या महाकाल के रूप में भी की जाती है।
पाप को पाप न समझने का पाप हम करते हैं और जिसे ‘समय के अनुसार जीना, हालात के मुताबिक सोच-समझकर चलना’ का नाम दे दिया गया है। परन्‍तु पाप तो पाप है। शैतान परमेश्‍वर के लोगों को विरोधी है और युद्ध जारी है। हमें जो मसीही हैं इससे लड़ना ही है। पाप को समूल नष्‍ट करना ही है।

पाप तुम्‍हारे मरनहार शरीर में राज्‍य न करे, कि तुम उसकी लालसाओं के आधीन रहो’’। पाप को नष्‍ट करना है लिखा है ‘‘इसलिये अपने उन अंगों को मार डालो जो पृथ्‍वी पर हैं अर्थात् व्‍यभिचार, अशुद्धता, दुष्‍कामना, बुरी लालसा, और लोभ जो मूर्तिपूजा के बराबर है ...
पाप से, शैतान से लड़ते समय हमारा दृष्टिकोण, आक्रामक होना चाहिये न कि सुरक्षात्‍मक। आज पाप से लड़ते हुए सबसे बड़ी समस्‍या यह है कि शैतान पर हम नहीं वरन् शैतान हम पर हावी है; हम हो गये हैं डिफेन्सिव। आज हम बार-बार यह कहते हैं कि शैतान का शिकंजा बढ़ता जा रहा है और यह बढ़ता इसलिये जा रहा है क्‍योंकि हम सिमटते जा रहे हैं।

पाप, शैतान की बात करते हैं तो ऐसा लगता है मानो हम परमेश्‍वर से ज्‍यादा शैतान से डरने लगे हैं। पाप से लड़ने का आत्‍मविश्‍वास खो दिया है हमने। हम इस बात को प्रमुखता देते हैं कि तुम्‍हारा विरोधी शैतान गरजने वाले सिंह की नाईं इस खोज में रहता है कि किसको फाड़ खाए परन्‍तु ये भूल जाते हैं कि वह हमारा विरोधी है। विरोधी का प्रयास होता है नाश करना परन्‍तु विरोधी से भयभीत नहीं हुआ जाता, उससे लड़ा जाता है उसे हराने का प्रयास किया जाता है।

इसलिये आज हमें ये देखना है कि पाप और शैतान का हमारे प्रति कैसा रवैय्या है |
जय शैतान पर पाना है और जय लड़कर मिलती है। बिना लड़े मिलती है हार, समझौते से मिलती है संधि।
परमेश्‍वर का भय मान और उसकी आज्ञाओं का पालन कर, क्‍योंकि मनुष्‍य का सम्‍पूर्ण कर्तव्‍य यही है....
आमोद कुमार

पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान