प्रेम की अभिव्यक्ति हमेशा व्यक्ति की अस्मिता व सम्मान का प्रतीक बनती रही है और इंसानी
इतिहास के विभिन्न पड़ावों पे इसने हमेशा समाज के सड़े -गले मूल्यों - मान्यताओं , रूढियों और
कठ्मुल्लेपन को चुनौती दी है चाहे वो प्रेम सहज मानवीय इच्छाओं को अभिव्यक्ति देता रहा हो या
बुल्लेशाह , वारिश शाह , मीरा आदि जैसे सूफी -संतों का प्रेम रहा हो . लेकिन यह सच है कि
जिस धर्म का इतिहास जितना पुराना होता है वो उतनी ही कट्टरता के साथ इसके ख़िलाफ़ आ खड़ा
होता है . अगर मीरा , शशि - पुन्नू जैसों के खिलाफ हिंदू संस्कृति के पैरोकार पूरी निर्ममता के
साथ खड़े थे तो वहीं बुल्लेशाह , वारिशशाह , मिर्जा - साहिबा जैसों के विरुद्ध इस्लामी समाज
की रुढियों व कट्टरपन से लैस मौलवियों /हाकिमों की जमात कहीं पीछे नही थी .
भारत जैसे देश में हीर - राँझा , शशि - पुन्नू ,लैला -मजनू , मिर्जा -साहिबा , सोहनी -महिवाल
जैसे प्रेमियों के किस्से भरे पड़े हैं , जिनके पन्नों को पलटते हुए भारतीय सामाजिक जीवन का अत्यन्त
क्रूर व असहिष्णु चेहरा सामने आता है जिसने कभी भी सहज मानवीय इच्छाओं को समान नही दिया और
इसमे भारतीय हिंदू संस्कृति व इस्लामी संस्कृति का प्रायः एक जैसा चेहरा दिखाई देता रहा है .लेकि
न इसी भारतीय समाज में बहुत सी ऐसी संस्कृतियाँ रहीं हैं जिनमें व्यक्ति की गरिमा व उसकी सहज
अभिव्यक्तियों को सम्मान मिलता रहा है .ये वो आदिवासी संस्कृतियाँ हैं जिन्हें आज का 'सभ्य'
व ' प्रगतिशील ' समाज असभ्य व जंगली मानता आया है और अक्सर आज भी मानता है.
वैलेंटाइन जैसे त्योहारों का कोई औचित्य नही है बल्कि
मेरे ख्याल से ऐसे त्योहारों को और भी बड़े पैमाने पे मनाया जाना चाहिए .लेकिन क्या सिर्फ़ उसी
रूप में जिस रूप में हमारा बाज़ार इसे चाहता है ?क्या यह त्यौहार बड़े पैमाने पर स्टेटस , ऊपरी ता
मझाम या दिखावे का जरिया मात्र नही लगता ?क्या इसमें यह कोशिश नही रहती कि दूसरों से कुछ
अलग , कुछ विशेष दिखा जाए ?ऐसे में दो व्यक्तियों की संवेदनात्मक गहराइयाँ कहाँ तक एक दूसरे तक
पहुँच पाती हैं ? वे एक दूसरे के सपनों ,पसंद -नापसंद को सिर्फ़ रूमानियत के चश्मे से नही देखते हों
गे ?जो लाजिमी तौर पर यथार्थ की सख्त ज़मीन से टकराते ही चकनाचूर हो जाती है ! क्या इसके
साथ सामाजिकता व नागरिक बोध को जोडा नही जाना चाहिए ?इसके लिए सामाजिक तौर पर
व्यक्ति की गरिमा और सम्मान को स्थापित करने वाली मुहिमों कि शुरुआत नही की जानी चाहिए ?
जो प्रेम की भावना को सच्चे तौर पर समाज में स्थापित कर सके !जिसमें व्यक्ति को , चाहे वो
स्त्री हो या पुरूष ,यह अधिकार मिल सके कि वो अपनी जिंदगी का फ़ैसला ख़ुद कर सके ,यहाँ
तक कि अपने जीवन साथी को अपनी मरजी से चुन सके . उसपे कोई धर्म ,जाति, समुदाय या पंचायत
अपने फासिस्ट अरमान न थोप सके . उन्हें किसी जाति ,समुदाय या धर्मं की इज्ज़त या सम्मान की
वेदी पे बलि न चढाया जा सके !
...आमोद कुमार

11 comments:
हर हर महादेव
''व्यक्ति की गरिमा और सम्मान को स्थापित करने वाली मुहिमों कि शुरुआत नही की जानी चाहिए ''
what a line..
Great Think Tank of Bihar..
प्रेम की अभिव्यक्ति कहाँ होती है? लोग वासना की अभिव्यक्ति करते हैं Valentine Day जैसे अवसरों पर.
Quality posts is the main to attract the people to go to see the web page,
that's what this website is providing.
Here is my site ... DortheyWTonai
These are truly impressive ideas in about blogging. You have touched some pleasant points here.
Any way keep up wrinting.
my blog CatherinILefave
It's going to be finish of mine day, however before end I
am reading this wonderful piece of writing to improve my experience.
Here is my website EloyBMonserrat
Very rapidly this site will be famous amid all blogging viewers,
due to it's nice content
Also visit my web site :: MarikoQAylor
Thanks for sharing your thoughts on other. Regards
Visit my web site ... MontyRHazlip
I am in fact delighted to read this web site posts which carries plenty of useful facts,
thanks for providing these data.
Also visit my website: AnjanetteEOsland
Amazing blog! Is your theme custom made or did you download it from somewhere?
A theme like yours with a few simple tweeks would really make my blog
shine. Please let me know where you got your theme.
Many thanks
Check out my website: CristiAMaroney
My brother recommended I may like this website. He was entirely right.
This submit truly made my day. You cann't imagine simply how so much time I had spent
for this info! Thank you!
Check out my web blog; quest bars
Post a Comment