Monday, December 28, 2009

बुध्दं शरणं गच्छामि

आतंकवाद, उद्दामवाद या अन्तिमवाद से हम आज ही पीड़ित नहीं हैं। यह बीमारी तो सदा से है। न्याय और अन्याय की, सत्य और असत्य की, अहिंसा और हिंसा की लड़ाई हमेशा से चलती आ रही है। यह युध्द कभी खत्म नहीं हुआ है और यह देखा गया है कि प्रारंभ में अंधेरा ही जीतता रहा है उजाले से। उजाला अन्त में जीतता है। कितनी कसौटी होती है प्रकाश की, प्रभा की, सवेरे की। रात जैसे खा जाना चाहती है ऊषा को। यह शाश्वत युध्द बाहर-भीतर दोनों तरफ चलता है। अब प्रश् केवल यही रहता है कि जीत के आधार पर सत्यासत्य का पता लगाया जाए या हार के आधार पर? युध्द के प्रारंभ और अन्त में दोनाें ही हारते या जीतते नजर आते हैं। हम प्राय: यह गणित लगा लेते हैं कि अन्त में जो जीतता है वही सत्य होता है। सत्य यह है कि जो सत्य होता है, वही अन्त में जीतता है।



गौतम बुध्द जीवन भर हिंसा से युध्द करते रहे अपने अहिंसक अस्त्र से। उनका 'बुध्दं शरणं गच्छामि' हार का मंत्र नहीं है, समर्पण की गुहार है। एक ऐसे समय, जब भारतर् कई गणराज्याें में बंटा था और प्रत्येक दो गणराज्य एक-दूसरे की सीमा पर शत्रु की तरह व्यवहार करते थे, बुध्द ने अपने 'धर्म' और 'संघ' को वैश्विक स्तर पर प्रचारित किया।


उनके जीवन की एक मीठी कथा है - अंगुलिमाल वाली। हमारे भारतीय वाङ्मय में कई राह-भटके लोगों के सदाचारी बनने के प्रसंग आते हैं। वाल्मीकि भी रत्नाकर डाकू ही थे, पर आदिकवि हो गए एक शब्द के अन्तर्युध्द से। अंगुलिमाल भी एक वाक्य से पराजित हो गया और एक हजार लोगों की अंगुलियां काटकर उनकी माला पहनने वाला क्रूरतम डाकू कोमलतम साधु हो गया।


महात्मा बुध्द ने अपनी अहिंसा के बल पर बड़े-बड़े दुष्टों को सन्मार्ग पर लगाया था। जो एक बार बुध्द-वाणी सुन लेता था, वह अपने सारे पूर्वाग्रह छोड़कर अपरिग्रह ग्रहण कर लेता था। श्रावस्ती का राजा प्रसेनजित भी महात्मा बुध्द का शिष्य बना। एक दिन आंखों में आंसू भरकर उसने गौतम बुध्द से निवेदन किया, 'प्रभु मैं सब तरह से सुखी और प्रसन्न हूं। मेरी प्रजा को किसी प्रकार का कष्ट नहीं है, किन्तु भन्ते, इन दिनों अंगुलिमाल डाकू ने बड़ा उपद्रव मचा रखा है। बड़ी भयभीत हो गई है मेरी प्रजा उससे।'


बुध्द ने तनिक हास्य बिखेरते हुए पूछा, 'राजन्, अंगुलिमान किस तरह पीड़ित करता है तुम्हारी प्रजा को? वह धन छीनता है या प्राण?'


प्रसेनजित ने चिन्तित भाव से कहा, 'भन्ते, धन तक बात होती तो सही जा सकती है, क्योंकि मेरी प्रजा का वैभव और ऐश्वर्य समाप्त होने वाला नहीं है। प्रभु, वह तो मनुष्यों की हत्या करता है। वह मानसिक रूप से रूग्ण है। उसने अपने इसी पागलपन में एक हजार आदमियों की हत्या करने का प्रण किया है। अब तक कितने आदमियों की हत्या कर चुका है - इसका हिसाब रखने की भी उसने अद्भुत युक्ति निकाली है। वह जब किसी को मारता है, तो उसकी एक अंगुलि काट लेता है। उसके गले में अंगुलियों की एक माला हमेशा पड़ी रहती है, इसलिए उसका नाम अंगुलिमाल पड़ गया है।'


बुध्द ने प्रसेनजित को धैर्य बंधाया और कहा कि उसका कोई उपचार करेंगे। कुछ समय बीता। एक दिन बुध्द के पांव स्वत: ही श्रावस्ती की ओर मुड़ गए। राह में घना जंगल था। लोगों से उन्हें मालूम हुआ कि अंगुलिमाल डाकू इसी वन में रहता है। बुध्द शान्त-स्थिर भाव से उस गहन वन में प्रवेश करने लगे। लोगों ने उन्हें बहुत रोका, शिष्यों ने उन्हें खूब समझाया, राजा के द्वारा नियुक्त पहरेदारों ने उनसे वन में न जाने की अनुनय की, प्रार्थना की। सबको भय था कि कहीं अंगुलिमाल महात्मा बुध्द की हत्या न कर दे।


बुध्द ने सबसे कहा, 'आप चिन्ता न करें। मैं अपनी इच्छा से इन वन में जा रहा हूं। आप सब लौट जाएं, मैं अकेला ही आगे बढूंगा। आज मुझे अंगुलिमाल का आतिथ्य-स्वीकार करना है।'


अपनी आंखों में करुणा की धारा प्रवाहित करते हुए बुध्द उस अगम वन में धीरे-धीरे चले जा रहे थे। सूर्य सिर पर चढ़ आया। पक्षी अपने-अपने घोंसलों में विश्राम करने लगे। मृग झाड़ियों में दुबक गए। हिंसक पशु गुफाओं में चले गए, पर बुध्द अनवरत आगे बढ़ते गए। संसार के जीवों की पीड़ाएं दूर करने का उनका संकल्प अभी पूरा नहीं हुआ था। जो ज्ञान का प्रकाश उन्हें प्राप्त हुआ था, वह जन-जन के हृदय तक अभी पहुंचाना बाकी था। अहिंसा का संदेश जब तक मानव मात्र को नहीं दे देते हैं, तब तक उनके चरणों को विश्राम कहां?


अकस्मात एक कठोर गर्जना पूरे वन प्रांतर में गूंज उठी - 'कौन है जो इस जंगल में चला आ रहा है? रुक जा!'


वह कर्कश ध्वनि पूरे अरण्य को कंपकंपाती बुध्द के कानों में पड़ी। उन्होंने आसपास देखा, कोई दिखाई नहीं दिया। वे फिर मंथर गति से आगे बढ़ने लगे।


'मैं कहता हूं, ठहर जा!' और एक विकराल दैत्याकार मूर्ति झाड़ी में से निकली तथा बुध्द का रास्ता रोककर खड़ी हो गई। काली चट्टान की तरह मांसपेशियां, सीसम की तरह चमकता काला शरीर, अंगारे की तरह धधकती आंखें, घनी डरावनी मूंछे, बेतरतीब बाल और ऊंचा पूरा राक्षसाकार कद। हाथ में कटार लिए तथा गले में अंगुलियों की माला पहने अंगुलिमाल सामने खड़ा था।


बुध्द मन्द हास्य बिखेरते हुए रुक गए और बोले, 'भाई ले, मैं तो ठहर गया! अब बता तू कब ठहरेगा?'


अंगुलिमाल का मुंह खुला रह गया। 'तू कब ठहरेगा' का क्या मतलब? लोग उसके नाम से पीपल के पत्ते की तरह कांपते हैं और यह साधु पूछ रहा है बड़ी निर्भयता से कि 'तू कब ठहरेगा?' यह शांत, प्रसन्न, तेजस्वी और अभय साधु कौन है?


महात्मा बुध्द ने अंगुलिमाल के कंधे पर प्रेम से हाथ रखकर पूछा, 'बोल, चुप क्यों है? कब ठहरेगा तू?'


डाकू हतप्रभ हो गया। कटार पर से उसके पंजे की पकड़ ढीली पड़ गई। आंखों के अंगारे बुझने लगे। चमकता हुआ शरीर पसीने से नहा उठा। उसे लगा, जैसे किसी ने बड़े जोर से उसके मर्म को मथ दिया हो। उसने बुध्द के सामने बड़े दयनीय शब्दों में कहा, 'आप कौन हैं? मैं आपका मतलब नहीं समझ पा रहा हूं।'


महात्मा बुध्द ने गंभीर वाणी में कहा, 'जीवन में जन्म से मृत्यु तक दु:ख ही दु:ख है। सव्वं दु:खं। हमारार् कत्तव्य तो यह होना चाहिए कि उन दु:खों से छुटकारा पाएं और दूसरों को भी दु:ख से मुक्त करें। एक तू है, जो क्रूरता और निर्दयता का सहारा लेकर स्वयं को भी दु:खी कर रहा है और दूसरों को भी पीड़ा पहुंचा रहा है। क्यों सब के दु:खको बढ़ा रहा है? मैं भी पहले दु:खी था, पर ज्ञान प्राप्त करके बंधन से छूट गया हूं। तू इस बुरे काम को कब छोड़ेगा? तू कब इनसे छुट्टी लेगा? भला, तू कब ठहरेगा?'


अंगुलिमाल ने पहली बार महसूस किया कि बिना शस्त्र के भी आदमी कितना शक्तिशाली हो सकता है। उसे अपने पूर्व-जीवन से घृणा हो गई। उसने कटार फेंक दी और रोते हुए भगवान बुध्द के चरणों में गिर पड़ा, 'मेरी रक्षा करो, मुझे जीवन का सही मार्ग दिखाओ। मैं पापी हूं, मुझे राह दिखाई नहीं देती।' बुध्द ने उसके सिर पर हाथ रखा। धन्य हो गया अंगुलिमाल! 'बुध्दं शरणं गच्छामि' का मंत्र दसों दिशाओं में गूंज उठा।


मंत्र तो आज भी गूंज रहा है, पर कोई भी अंगुलिमाल नहीं सुधरता। न वह कटार अपने हाथों से फेंकता है, न अंगुलियों की माला तोड़ता है। उल्टे हथियारों के बाजार लग रहे हैं और अंगुलियों की ही नहीं, नरमुंडों की मालाएं पहनी जा रही हैं। काश्मीर में यही हो रहा है, तमिलनाडु में इसी का पुनरावर्तन हो रहा है। अपने देश की ही क्यों? पूरे विश्व की ही स्थिति है। लगता है, आतंकवाद का भस्मासुर सारी दुनिया को भस्म करके छोड़ेगा। कौन बचाएगा मानवता को अब? कौन रक्षा करेगा दैविक गुणों की अब? लगता है, 'बुध्दं शरणं गच्छामि' के साथ 'संघ शरणं' और 'धर्मं शरणं' भी आवश्यक हो गया है। सामूहिक रूप से बुध्दिमानीपूर्वक धर्म की शरण ली जाए, तो संभवत: आज का अंगुलिमाल सुधरे, अन्यथा नहीं।
आमोद कुमार
जय हिंद , जय पाटलिपुत्र
पाटलिपुत्र , बिहार, भारत

1 comment:

Anonymous said...

VERY GOOD FOR RIGHT NOW.
WITH REGDS

RISHI RAJ