न्यायोचित अधिकार मांगने से न मिले , तो लड़ के
तेजस्वी छिनते समर को जीत ,या ख़ुद मरके !
छमा , दया , तप , त्याग मनोबल, सबका लिया सहारा ;
पर नर व्यग्रह सुयोधन तुमसे कहो , कहा कब हारा ?
छमा शोभती उस भुजंग को , जिसके पास गरल हो !
उसको क्या, जो दंतहीन, विषरहित , विनीत, सरल हो !
1 comment:
GOOD SIR
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