Thursday, December 31, 2009
नए साल का त्यौहार, 2010 नया साल, नया साल मुबारक हो !!!!!
Dear Sir,
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आमोद कुमार, पाटलिपुत्र , बिहार
Wednesday, December 30, 2009
कौन सुनेगा किसको सुनाये ? हमसे अपने रूठ इसी लिए चुप रहते है |
मेरे जिन्दगी का सबसे प्यारा गाना जो मेरे लिए सच्चाई है |
कौन सुनेगा किसको सुनाये इसीलिए चुप रहेते है -
हमसे अपने रूठ ना जाए - इसीलिए चुप रहेते है | हमसे अपने दया जाए - न इसीलिए चुप है रहेते है |
मेरी सूरत देखनेवालों मैं भी एक आइना था -
टूटा जब ये शीशा ये दिल सावन का महिना था
टूकडे दिल के किसको दिखाए - इसीलिए चुप रहेते है |
आज ख़ुशी इसा महफ़िल में अपना जी भर आया है -
गम की कोई बात नहीं है हमें ख़ुशी ने रुलाया है -
आंख से आंसू बह ना जाये - इसीलिए चुप रहेते है, हमसे अपने रूठ ना जाए
प्यार के फूल चुने हमने खुशी के सेज को सजाने - पत्जाद बनाकर आई बहरे घर में आग लगाने को , आग में गम की गल ना जाये - इसीलिए चुप रहेते है गोंद जाए ना लड़की की - इसीलिए चुप रहेते है,हमसे अपने रूठ ना जाए - इसीलिए चुप रहेते है
http://www.youtube.com/watch?v=ncYfrdvO_uU
आमोद कुमार ,
पाटलिपुत्र, बिहार
कौन सुनेगा किसको सुनाये इसीलिए चुप रहेते है -
हमसे अपने रूठ ना जाए - इसीलिए चुप रहेते है | हमसे अपने दया जाए - न इसीलिए चुप है रहेते है |
मेरी सूरत देखनेवालों मैं भी एक आइना था -
टूटा जब ये शीशा ये दिल सावन का महिना था
टूकडे दिल के किसको दिखाए - इसीलिए चुप रहेते है |
आज ख़ुशी इसा महफ़िल में अपना जी भर आया है -
गम की कोई बात नहीं है हमें ख़ुशी ने रुलाया है -
आंख से आंसू बह ना जाये - इसीलिए चुप रहेते है, हमसे अपने रूठ ना जाए
प्यार के फूल चुने हमने खुशी के सेज को सजाने - पत्जाद बनाकर आई बहरे घर में आग लगाने को , आग में गम की गल ना जाये - इसीलिए चुप रहेते है गोंद जाए ना लड़की की - इसीलिए चुप रहेते है,हमसे अपने रूठ ना जाए - इसीलिए चुप रहेते है
http://www.youtube.com/watch?v=ncYfrdvO_uU
आमोद कुमार ,
पाटलिपुत्र, बिहार
Tuesday, December 29, 2009
ऐ मेरे वतन् के लोगों
ऐ मेरे वतन् के लोगों
तुम् खूब् लगा लो नारा तुम् खूब् लगा लो नारा
ये शुभ् दिन् है हम् सब् का ये शुभ् दिन् है हम् सब् का
लहरा लो तिरंगा प्यारा लहरा लो तिरंगा प्यारा
पर् मत् भूलो सीमा पर् पर् मत् भूलो सीमा पर्
वीरों ने है प्राण् गँवा वीरों ने है प्राण् गँवा
कुछ् याद् उन्हें भी कर् लो -२ कुछ् याद् उन्हें भी कर् लो -
जो लौट् के घर् न आये -२ जो लौट् के घर् न आये -
ऐ मेरे वतन् के लोगों ऐ मेरे वतन् के लोगों
ज़रा आँख् में भर् लो पानी ज़रा आँख् में भर् लो पानी
जो शहीद् हु हैं उनकी जो शहीद् हु हैं उनकी
ज़रा याद् करो क़ुरबानी ज़रा याद् करो क़ुरबानी
जब् घायल् हु हिमालय् जब् घायल् हु हिमालय्
खतरे में पड़ी आज़ादी खतरे में पड़ी आज़ादी
जब् तक् थी साँस् लड़े वो जब् तक् थी साँस् लड़े वो
फिर् अपनी लाश् बिछा दी फिर् अपनी लाश् बिछा दी
संगीन् पे धर् कर् माथा संगीन् पे धर् कर् माथा
सो गये अमर् बलिदानी सो गये अमर् बलिदानी
जो शहीद्॥। जो शहीद् ..
जब् देश् में थी दीवाली जब् देश् में थी दीवाली
वो खेल् रहे थे होली वो खेल् रहे थे होली
जब् हम् बैठे थे घरों में जब् हम् बैठे थे घरों में
वो झेल् रहे थे गोली वो झेल् रहे थे गोली
थे धन्य जवान् वो आपने थे धन्य जवान् वो आपने
थी धन्य वो उनकी जवानी थी धन्य वो उनकी जवानी
जो शहीद्॥। जो शहीद् ..
को सिख् को जाट् मराठा को सिख् को जाट् मराठा
को गुरखा को मदरासी को गुरखा को मदरासी
सरहद् पे मरनेवाला सरहद् पे मरनेवाला
हर् वीर् था भारतवासी हर् वीर् था भारतवासी
जो खून् गिरा पर्वत् पर् जो खून् गिरा पर्वत् पर्
वो खून् था हिंदुस्तानी वो खून् था हिंदुस्तानी
जो शहीद्॥। जो शहीद् ..
थी खून् से लथ्-पथ् काया थी खून् से लथ् - पथ् काया
फिर् भी बन्दूक् उठाके फिर् भी बन्दूक् उठाके
दस्-दस् को एक् ने मारा दस् - दस् को एक् ने मारा
फिर् गिर् गये होश् गँवा के फिर् गिर् गये होश् गँवा के
जब् अन्त्-समय् आया तो जब् अन्त् - समय् आया तो
कह् गये के अब् मरते हैं कह् गये के अब् मरते हैं
खुश् रहना देश् के प्यारों खुश् रहना देश् के प्यारों
अब् हम् तो सफ़र् करते हैं अब् हम् तो सफ़र् करते हैं
क्या लोग् थे वो दीवाने क्या लोग् थे वो दीवाने
क्या लोग् थे वो अभिमानी क्या लोग् थे वो अभिमानी
जो शहीद्॥। जो शहीद् ..
तुम् भूल् न जा उनको तुम् भूल् न जा उनको
इस् लिये कही ये कहानी इस् लिये कही ये कहानी
जो शहीद्॥। जो शहीद् .. जय् हिन्द्॥। जय् हिन्द् .. जय् हिन्द् की सेना - जय् हिन्द् की सेना - जय् हिन्द् जय् हिन्द् जय् हिन्द् जय् हिन्द् जय् हिन्द् जय् हिन्द्
अशफाकुल्ला खान
एक पठान देशभक्त जो चूमा उसके होठों पर अल्लाह के नाम के साथ आदमी का फंदा रखती. एक लोहे की एक संस्था है और वे भारत और स्वतंत्रता की और चालाक और एक साम्राज्य की शक्ति को चुनौती दी की सेवा के लिए सब कुछ समर्पित इस्पात के साथ संपन्न होगा युवा.
यह 19 दिसम्बर 1927 था. सर्दियों सूरज देर हो गई. अपने स्वर्णिम किरणों गर्मी लाया और काट ठंड में कांप लोगों को खुशी.
सूर्योदय से कम उस दिन, फैजाबाद में जिला जेल में अधिकारियों रही है एक आदमी की जिंदगी का अंत करने के लिए तैयार थे. . वह एक क्रांतिकारी था. अधिकारियों, दोनों उच्च और कम व्यस्त थे. मुख्य जेलर रस्सी, sandbags और अन्य सावधानी जरूरी चीजों का निरीक्षण किया. वह पूरी तरह की व्यवस्था से संतुष्ट था, तो वह अपने अधीनस्थ, "यहाँ बंदी लाने के लिए बाहर बुलाया. सरकारी दस सैनिकों के साथ चली गई. एक ज़ोर से कठोर ध्वनि के साथ जो आदमी के लिए खोल मर गया था, के सेल के द्वार. . कि पिछली बार जब दरवाजा इस आदमी के लिए खोला गया था.
" बहादुर देशभक्त इस फोन का इंतज़ार कर रहा था, वह cheerfully से पूछा, "सब कुछ तैयार है?"
जय हिंद
चंद्रशेखर आजाद ने एक महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे. अपने उग्र देशभक्ति और साहस अपनी पीढ़ी के अन्य लोगों को प्रेरित करने स्वतंत्रता संग्राम दर्ज करें. चंद्रशेखर आजाद संरक्षक भगत सिंह, एक और महान स्वतंत्रता सेनानी, और भगत सिंह वह सबसे महान क्रांतिकारियों है कि भारत का उत्पादन किया गया है में से एक के रूप में माना जाता है के साथ किया गया.
चंद्रशेखर आजाद 23,1906 जुलाई को गांव में पैदा भवर मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में था. उसके माता पिता पंडित सीताराम तिवारी और देवी जगरानी थे. . वह भवर में अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की. उच्च शिक्षा के लिए वह वाराणसी में संस्कृत . उन्होंने हनुमान की एक कट्टर अनुयायी था और एक बार खुद को हनुमान मंदिर में पुजारी के रूप में प्रच्छन्न के लिए ब्रिटिश पुलिस के dragnet से बच निकले .
चंद्रशेखर आजाद गहराई से अमृतसर में जलियांवाला बाग नरसंहार से परेशान था 1919 में. In 1921, में, जब महात्मा गांधी गैर सहकारिता आंदोलन, चंद्रशेखर आजाद शुरू की क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लिया.. वह पंद्रह वर्ष की आयु में अपनी पहली सजा प्राप्त किया. . चंद्र शेखर पकड़ लिया, जबकि क्रांतिकारी गतिविधियों में लिप्त था. जब मजिस्ट्रेट उससे उसका नाम पूछा, उसने कहा था 'आजाद' चंद्रशेखर आजाद पंद्रह lashes की सजा सुनाई. सचेतक युवा चंद्रशेखर के हर स्ट्रोक के साथ गया था चिल्लाया "भारत माता बच्चे जय." तब से चंद्रशेखर आजाद की उपाधि ग्रहण किया और चंद्रशेखर आजाद के नाम से आया था. चंद्रशेखर आजाद की कसम खाई है कि वह ब्रिटिश पुलिस ने कभी भी गिरफ्तार कर लिया और स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में मर जाएगा.
गैर के निलंबन सहयोग आंदोलन चंद्रशेखर आजाद के बाद और अधिक आक्रामक और क्रांतिकारी आदर्शों की ओर आकर्षित किया गया था. उसने अपने आप को समर्पित करने का मतलब है किसी ने स्वतंत्रता पूरा करें. चंद्रशेखर आजाद और उनके compatriots ब्रिटेन के आम लोगों और स्वतंत्रता सेनानियों. चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ दमनात्मक कार्रवाई के लिए जाना जाता अधिकारियों लक्ष्य Kakori ट्रेन (1926) चोरी में शामिल किया गया था, को है वायसराय ट्रेन (1926) को उड़ाने का प्रयास है, और Saunders की शूटिंग (1928) लाहौर में लाला Lajpatrai की हत्या का बदला लेने के लिए.
भगत सिंह और सुखदेव और राजगुरु जैसे अन्य compatriots के साथ, चंद्रशेखर आजाद हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRSA) का गठन किया. भारत की स्वतंत्रता और भारत के भविष्य की प्रगति के लिए समाजवादी सिद्धांतों को पूरा किया गया था.
वह उनकी हिट लिस्ट पर था और ब्रिटिश पुलिस बुरी तरह से उसे पकड़ने को जिंदा या मुर्दा चाहते थे. 27 फ़रवरी 1931 चंद्रशेखर आजाद को अल्फ्रेड पार्क अल्लाह बुरा में अपने साथियों के दो से मुलाकात की. . वह एक मुखबिर ने धोखा दिया, जो ब्रिटिश पुलिस को सूचित किया था. . पुलिस पार्क घेर लिया और चंद्रशेखर आजाद को आत्मसमर्पण का आदेश दिया. चंद्रशेखर आजाद अकेला बहादुरी से लड़े और तीन पुलिसकर्मियों को मार डाला. चंद्रशेखर आजाद लेकिन खुद को घेर लिया और खोज भागने के लिए कोई रास्ता देख कर, खुद को गोली मार दी. इस प्रकार वह जीवित पकड़ा नहीं जा रहा है की अपनी प्रतिज्ञा रखा.
जय हिंद
आमोद कुमार
तुम् खूब् लगा लो नारा तुम् खूब् लगा लो नारा
ये शुभ् दिन् है हम् सब् का ये शुभ् दिन् है हम् सब् का
लहरा लो तिरंगा प्यारा लहरा लो तिरंगा प्यारा
पर् मत् भूलो सीमा पर् पर् मत् भूलो सीमा पर्
वीरों ने है प्राण् गँवा वीरों ने है प्राण् गँवा
कुछ् याद् उन्हें भी कर् लो -२ कुछ् याद् उन्हें भी कर् लो -
जो लौट् के घर् न आये -२ जो लौट् के घर् न आये -
ऐ मेरे वतन् के लोगों ऐ मेरे वतन् के लोगों
ज़रा आँख् में भर् लो पानी ज़रा आँख् में भर् लो पानी
जो शहीद् हु हैं उनकी जो शहीद् हु हैं उनकी
ज़रा याद् करो क़ुरबानी ज़रा याद् करो क़ुरबानी
जब् घायल् हु हिमालय् जब् घायल् हु हिमालय्
खतरे में पड़ी आज़ादी खतरे में पड़ी आज़ादी
जब् तक् थी साँस् लड़े वो जब् तक् थी साँस् लड़े वो
फिर् अपनी लाश् बिछा दी फिर् अपनी लाश् बिछा दी
संगीन् पे धर् कर् माथा संगीन् पे धर् कर् माथा
सो गये अमर् बलिदानी सो गये अमर् बलिदानी
जो शहीद्॥। जो शहीद् ..
जब् देश् में थी दीवाली जब् देश् में थी दीवाली
वो खेल् रहे थे होली वो खेल् रहे थे होली
जब् हम् बैठे थे घरों में जब् हम् बैठे थे घरों में
वो झेल् रहे थे गोली वो झेल् रहे थे गोली
थे धन्य जवान् वो आपने थे धन्य जवान् वो आपने
थी धन्य वो उनकी जवानी थी धन्य वो उनकी जवानी
जो शहीद्॥। जो शहीद् ..
को सिख् को जाट् मराठा को सिख् को जाट् मराठा
को गुरखा को मदरासी को गुरखा को मदरासी
सरहद् पे मरनेवाला सरहद् पे मरनेवाला
हर् वीर् था भारतवासी हर् वीर् था भारतवासी
जो खून् गिरा पर्वत् पर् जो खून् गिरा पर्वत् पर्
वो खून् था हिंदुस्तानी वो खून् था हिंदुस्तानी
जो शहीद्॥। जो शहीद् ..
थी खून् से लथ्-पथ् काया थी खून् से लथ् - पथ् काया
फिर् भी बन्दूक् उठाके फिर् भी बन्दूक् उठाके
दस्-दस् को एक् ने मारा दस् - दस् को एक् ने मारा
फिर् गिर् गये होश् गँवा के फिर् गिर् गये होश् गँवा के
जब् अन्त्-समय् आया तो जब् अन्त् - समय् आया तो
कह् गये के अब् मरते हैं कह् गये के अब् मरते हैं
खुश् रहना देश् के प्यारों खुश् रहना देश् के प्यारों
अब् हम् तो सफ़र् करते हैं अब् हम् तो सफ़र् करते हैं
क्या लोग् थे वो दीवाने क्या लोग् थे वो दीवाने
क्या लोग् थे वो अभिमानी क्या लोग् थे वो अभिमानी
जो शहीद्॥। जो शहीद् ..
तुम् भूल् न जा उनको तुम् भूल् न जा उनको
इस् लिये कही ये कहानी इस् लिये कही ये कहानी
जो शहीद्॥। जो शहीद् .. जय् हिन्द्॥। जय् हिन्द् .. जय् हिन्द् की सेना - जय् हिन्द् की सेना - जय् हिन्द् जय् हिन्द् जय् हिन्द् जय् हिन्द् जय् हिन्द् जय् हिन्द्
अशफाकुल्ला खान
एक पठान देशभक्त जो चूमा उसके होठों पर अल्लाह के नाम के साथ आदमी का फंदा रखती. एक लोहे की एक संस्था है और वे भारत और स्वतंत्रता की और चालाक और एक साम्राज्य की शक्ति को चुनौती दी की सेवा के लिए सब कुछ समर्पित इस्पात के साथ संपन्न होगा युवा.
यह 19 दिसम्बर 1927 था. सर्दियों सूरज देर हो गई. अपने स्वर्णिम किरणों गर्मी लाया और काट ठंड में कांप लोगों को खुशी.
सूर्योदय से कम उस दिन, फैजाबाद में जिला जेल में अधिकारियों रही है एक आदमी की जिंदगी का अंत करने के लिए तैयार थे. . वह एक क्रांतिकारी था. अधिकारियों, दोनों उच्च और कम व्यस्त थे. मुख्य जेलर रस्सी, sandbags और अन्य सावधानी जरूरी चीजों का निरीक्षण किया. वह पूरी तरह की व्यवस्था से संतुष्ट था, तो वह अपने अधीनस्थ, "यहाँ बंदी लाने के लिए बाहर बुलाया. सरकारी दस सैनिकों के साथ चली गई. एक ज़ोर से कठोर ध्वनि के साथ जो आदमी के लिए खोल मर गया था, के सेल के द्वार. . कि पिछली बार जब दरवाजा इस आदमी के लिए खोला गया था.
" बहादुर देशभक्त इस फोन का इंतज़ार कर रहा था, वह cheerfully से पूछा, "सब कुछ तैयार है?"
जय हिंद
चंद्रशेखर आजाद ने एक महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे. अपने उग्र देशभक्ति और साहस अपनी पीढ़ी के अन्य लोगों को प्रेरित करने स्वतंत्रता संग्राम दर्ज करें. चंद्रशेखर आजाद संरक्षक भगत सिंह, एक और महान स्वतंत्रता सेनानी, और भगत सिंह वह सबसे महान क्रांतिकारियों है कि भारत का उत्पादन किया गया है में से एक के रूप में माना जाता है के साथ किया गया.
चंद्रशेखर आजाद 23,1906 जुलाई को गांव में पैदा भवर मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में था. उसके माता पिता पंडित सीताराम तिवारी और देवी जगरानी थे. . वह भवर में अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की. उच्च शिक्षा के लिए वह वाराणसी में संस्कृत . उन्होंने हनुमान की एक कट्टर अनुयायी था और एक बार खुद को हनुमान मंदिर में पुजारी के रूप में प्रच्छन्न के लिए ब्रिटिश पुलिस के dragnet से बच निकले .
चंद्रशेखर आजाद गहराई से अमृतसर में जलियांवाला बाग नरसंहार से परेशान था 1919 में. In 1921, में, जब महात्मा गांधी गैर सहकारिता आंदोलन, चंद्रशेखर आजाद शुरू की क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लिया.. वह पंद्रह वर्ष की आयु में अपनी पहली सजा प्राप्त किया. . चंद्र शेखर पकड़ लिया, जबकि क्रांतिकारी गतिविधियों में लिप्त था. जब मजिस्ट्रेट उससे उसका नाम पूछा, उसने कहा था 'आजाद' चंद्रशेखर आजाद पंद्रह lashes की सजा सुनाई. सचेतक युवा चंद्रशेखर के हर स्ट्रोक के साथ गया था चिल्लाया "भारत माता बच्चे जय." तब से चंद्रशेखर आजाद की उपाधि ग्रहण किया और चंद्रशेखर आजाद के नाम से आया था. चंद्रशेखर आजाद की कसम खाई है कि वह ब्रिटिश पुलिस ने कभी भी गिरफ्तार कर लिया और स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में मर जाएगा.
गैर के निलंबन सहयोग आंदोलन चंद्रशेखर आजाद के बाद और अधिक आक्रामक और क्रांतिकारी आदर्शों की ओर आकर्षित किया गया था. उसने अपने आप को समर्पित करने का मतलब है किसी ने स्वतंत्रता पूरा करें. चंद्रशेखर आजाद और उनके compatriots ब्रिटेन के आम लोगों और स्वतंत्रता सेनानियों. चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ दमनात्मक कार्रवाई के लिए जाना जाता अधिकारियों लक्ष्य Kakori ट्रेन (1926) चोरी में शामिल किया गया था, को है वायसराय ट्रेन (1926) को उड़ाने का प्रयास है, और Saunders की शूटिंग (1928) लाहौर में लाला Lajpatrai की हत्या का बदला लेने के लिए.
भगत सिंह और सुखदेव और राजगुरु जैसे अन्य compatriots के साथ, चंद्रशेखर आजाद हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRSA) का गठन किया. भारत की स्वतंत्रता और भारत के भविष्य की प्रगति के लिए समाजवादी सिद्धांतों को पूरा किया गया था.
वह उनकी हिट लिस्ट पर था और ब्रिटिश पुलिस बुरी तरह से उसे पकड़ने को जिंदा या मुर्दा चाहते थे. 27 फ़रवरी 1931 चंद्रशेखर आजाद को अल्फ्रेड पार्क अल्लाह बुरा में अपने साथियों के दो से मुलाकात की. . वह एक मुखबिर ने धोखा दिया, जो ब्रिटिश पुलिस को सूचित किया था. . पुलिस पार्क घेर लिया और चंद्रशेखर आजाद को आत्मसमर्पण का आदेश दिया. चंद्रशेखर आजाद अकेला बहादुरी से लड़े और तीन पुलिसकर्मियों को मार डाला. चंद्रशेखर आजाद लेकिन खुद को घेर लिया और खोज भागने के लिए कोई रास्ता देख कर, खुद को गोली मार दी. इस प्रकार वह जीवित पकड़ा नहीं जा रहा है की अपनी प्रतिज्ञा रखा.
जय हिंद
आमोद कुमार
Monday, December 28, 2009
सलाह मन की शांति और सुझाव
अधिकांश लोगों को अपने जीवन में मन की शांति है खुशी होगी. वे अपनी परेशानियों, समस्याओं और चिंताओं को भूल खुश होगा और विचार पागल से आंतरिक शांति और आजादी के कुछ ही क्षणों का आनंद लें.
मन की शांति क्या है? यह आंतरिक शांति और सौहार्द के एक राज्य है, साथ में स्वतंत्रता, जब विचारों और चिंताओं को संघर्ष की भावना के साथ, और कोई तनाव, तनाव या डर है. ऐसे क्षण बहुत कम नहीं हैं. . वे अनुभव करते हुए किसी तरह में संलग्न किया जा रहा हो सकता है या एक दिलचस्प रोचक गतिविधि, जैसे जबकि एक दिलचस्प फिल्म या टीवी प्रोग्राम के रूप में देख रहा है, जबकि किसी को तुम प्यार से किया जा रहा है, जबकि एक किताब पढ़ या जब समुद्र तट पर रेत पर पड़ी है |
जब आप छुट्टी पर हैं, क्या तुम मानसिक स्तब्ध हो जाना किसी प्रकार का अनुभव? पर इस बार मन शांत हो जाता है और कम विचार कम चिंताओं के साथ. अपने विचारों के भी जब तक तुम गहरी नींद में है पता नहीं, तुम मन की शांति के एक राज्य में हैं.
इस तरह के और इसी तरह की गतिविधियों के सामान्य विचार और चिंता से दूर ले मन, और कुछ अस्थायी मन की शांति ले आओ |
आमोद कुमार, पाटलिपुत्र, बिहार, भारत
मन की शांति क्या है? यह आंतरिक शांति और सौहार्द के एक राज्य है, साथ में स्वतंत्रता, जब विचारों और चिंताओं को संघर्ष की भावना के साथ, और कोई तनाव, तनाव या डर है. ऐसे क्षण बहुत कम नहीं हैं. . वे अनुभव करते हुए किसी तरह में संलग्न किया जा रहा हो सकता है या एक दिलचस्प रोचक गतिविधि, जैसे जबकि एक दिलचस्प फिल्म या टीवी प्रोग्राम के रूप में देख रहा है, जबकि किसी को तुम प्यार से किया जा रहा है, जबकि एक किताब पढ़ या जब समुद्र तट पर रेत पर पड़ी है |
जब आप छुट्टी पर हैं, क्या तुम मानसिक स्तब्ध हो जाना किसी प्रकार का अनुभव? पर इस बार मन शांत हो जाता है और कम विचार कम चिंताओं के साथ. अपने विचारों के भी जब तक तुम गहरी नींद में है पता नहीं, तुम मन की शांति के एक राज्य में हैं.
इस तरह के और इसी तरह की गतिविधियों के सामान्य विचार और चिंता से दूर ले मन, और कुछ अस्थायी मन की शांति ले आओ |
बुध्दं शरणं गच्छामि
आतंकवाद, उद्दामवाद या अन्तिमवाद से हम आज ही पीड़ित नहीं हैं। यह बीमारी तो सदा से है। न्याय और अन्याय की, सत्य और असत्य की, अहिंसा और हिंसा की लड़ाई हमेशा से चलती आ रही है। यह युध्द कभी खत्म नहीं हुआ है और यह देखा गया है कि प्रारंभ में अंधेरा ही जीतता रहा है उजाले से। उजाला अन्त में जीतता है। कितनी कसौटी होती है प्रकाश की, प्रभा की, सवेरे की। रात जैसे खा जाना चाहती है ऊषा को। यह शाश्वत युध्द बाहर-भीतर दोनों तरफ चलता है। अब प्रश् केवल यही रहता है कि जीत के आधार पर सत्यासत्य का पता लगाया जाए या हार के आधार पर? युध्द के प्रारंभ और अन्त में दोनाें ही हारते या जीतते नजर आते हैं। हम प्राय: यह गणित लगा लेते हैं कि अन्त में जो जीतता है वही सत्य होता है। सत्य यह है कि जो सत्य होता है, वही अन्त में जीतता है।
गौतम बुध्द जीवन भर हिंसा से युध्द करते रहे अपने अहिंसक अस्त्र से। उनका 'बुध्दं शरणं गच्छामि' हार का मंत्र नहीं है, समर्पण की गुहार है। एक ऐसे समय, जब भारतर् कई गणराज्याें में बंटा था और प्रत्येक दो गणराज्य एक-दूसरे की सीमा पर शत्रु की तरह व्यवहार करते थे, बुध्द ने अपने 'धर्म' और 'संघ' को वैश्विक स्तर पर प्रचारित किया।
उनके जीवन की एक मीठी कथा है - अंगुलिमाल वाली। हमारे भारतीय वाङ्मय में कई राह-भटके लोगों के सदाचारी बनने के प्रसंग आते हैं। वाल्मीकि भी रत्नाकर डाकू ही थे, पर आदिकवि हो गए एक शब्द के अन्तर्युध्द से। अंगुलिमाल भी एक वाक्य से पराजित हो गया और एक हजार लोगों की अंगुलियां काटकर उनकी माला पहनने वाला क्रूरतम डाकू कोमलतम साधु हो गया।
महात्मा बुध्द ने अपनी अहिंसा के बल पर बड़े-बड़े दुष्टों को सन्मार्ग पर लगाया था। जो एक बार बुध्द-वाणी सुन लेता था, वह अपने सारे पूर्वाग्रह छोड़कर अपरिग्रह ग्रहण कर लेता था। श्रावस्ती का राजा प्रसेनजित भी महात्मा बुध्द का शिष्य बना। एक दिन आंखों में आंसू भरकर उसने गौतम बुध्द से निवेदन किया, 'प्रभु मैं सब तरह से सुखी और प्रसन्न हूं। मेरी प्रजा को किसी प्रकार का कष्ट नहीं है, किन्तु भन्ते, इन दिनों अंगुलिमाल डाकू ने बड़ा उपद्रव मचा रखा है। बड़ी भयभीत हो गई है मेरी प्रजा उससे।'
बुध्द ने तनिक हास्य बिखेरते हुए पूछा, 'राजन्, अंगुलिमान किस तरह पीड़ित करता है तुम्हारी प्रजा को? वह धन छीनता है या प्राण?'
प्रसेनजित ने चिन्तित भाव से कहा, 'भन्ते, धन तक बात होती तो सही जा सकती है, क्योंकि मेरी प्रजा का वैभव और ऐश्वर्य समाप्त होने वाला नहीं है। प्रभु, वह तो मनुष्यों की हत्या करता है। वह मानसिक रूप से रूग्ण है। उसने अपने इसी पागलपन में एक हजार आदमियों की हत्या करने का प्रण किया है। अब तक कितने आदमियों की हत्या कर चुका है - इसका हिसाब रखने की भी उसने अद्भुत युक्ति निकाली है। वह जब किसी को मारता है, तो उसकी एक अंगुलि काट लेता है। उसके गले में अंगुलियों की एक माला हमेशा पड़ी रहती है, इसलिए उसका नाम अंगुलिमाल पड़ गया है।'
बुध्द ने प्रसेनजित को धैर्य बंधाया और कहा कि उसका कोई उपचार करेंगे। कुछ समय बीता। एक दिन बुध्द के पांव स्वत: ही श्रावस्ती की ओर मुड़ गए। राह में घना जंगल था। लोगों से उन्हें मालूम हुआ कि अंगुलिमाल डाकू इसी वन में रहता है। बुध्द शान्त-स्थिर भाव से उस गहन वन में प्रवेश करने लगे। लोगों ने उन्हें बहुत रोका, शिष्यों ने उन्हें खूब समझाया, राजा के द्वारा नियुक्त पहरेदारों ने उनसे वन में न जाने की अनुनय की, प्रार्थना की। सबको भय था कि कहीं अंगुलिमाल महात्मा बुध्द की हत्या न कर दे।
बुध्द ने सबसे कहा, 'आप चिन्ता न करें। मैं अपनी इच्छा से इन वन में जा रहा हूं। आप सब लौट जाएं, मैं अकेला ही आगे बढूंगा। आज मुझे अंगुलिमाल का आतिथ्य-स्वीकार करना है।'
अपनी आंखों में करुणा की धारा प्रवाहित करते हुए बुध्द उस अगम वन में धीरे-धीरे चले जा रहे थे। सूर्य सिर पर चढ़ आया। पक्षी अपने-अपने घोंसलों में विश्राम करने लगे। मृग झाड़ियों में दुबक गए। हिंसक पशु गुफाओं में चले गए, पर बुध्द अनवरत आगे बढ़ते गए। संसार के जीवों की पीड़ाएं दूर करने का उनका संकल्प अभी पूरा नहीं हुआ था। जो ज्ञान का प्रकाश उन्हें प्राप्त हुआ था, वह जन-जन के हृदय तक अभी पहुंचाना बाकी था। अहिंसा का संदेश जब तक मानव मात्र को नहीं दे देते हैं, तब तक उनके चरणों को विश्राम कहां?
अकस्मात एक कठोर गर्जना पूरे वन प्रांतर में गूंज उठी - 'कौन है जो इस जंगल में चला आ रहा है? रुक जा!'
वह कर्कश ध्वनि पूरे अरण्य को कंपकंपाती बुध्द के कानों में पड़ी। उन्होंने आसपास देखा, कोई दिखाई नहीं दिया। वे फिर मंथर गति से आगे बढ़ने लगे।
'मैं कहता हूं, ठहर जा!' और एक विकराल दैत्याकार मूर्ति झाड़ी में से निकली तथा बुध्द का रास्ता रोककर खड़ी हो गई। काली चट्टान की तरह मांसपेशियां, सीसम की तरह चमकता काला शरीर, अंगारे की तरह धधकती आंखें, घनी डरावनी मूंछे, बेतरतीब बाल और ऊंचा पूरा राक्षसाकार कद। हाथ में कटार लिए तथा गले में अंगुलियों की माला पहने अंगुलिमाल सामने खड़ा था।
बुध्द मन्द हास्य बिखेरते हुए रुक गए और बोले, 'भाई ले, मैं तो ठहर गया! अब बता तू कब ठहरेगा?'
अंगुलिमाल का मुंह खुला रह गया। 'तू कब ठहरेगा' का क्या मतलब? लोग उसके नाम से पीपल के पत्ते की तरह कांपते हैं और यह साधु पूछ रहा है बड़ी निर्भयता से कि 'तू कब ठहरेगा?' यह शांत, प्रसन्न, तेजस्वी और अभय साधु कौन है?
महात्मा बुध्द ने अंगुलिमाल के कंधे पर प्रेम से हाथ रखकर पूछा, 'बोल, चुप क्यों है? कब ठहरेगा तू?'
डाकू हतप्रभ हो गया। कटार पर से उसके पंजे की पकड़ ढीली पड़ गई। आंखों के अंगारे बुझने लगे। चमकता हुआ शरीर पसीने से नहा उठा। उसे लगा, जैसे किसी ने बड़े जोर से उसके मर्म को मथ दिया हो। उसने बुध्द के सामने बड़े दयनीय शब्दों में कहा, 'आप कौन हैं? मैं आपका मतलब नहीं समझ पा रहा हूं।'
महात्मा बुध्द ने गंभीर वाणी में कहा, 'जीवन में जन्म से मृत्यु तक दु:ख ही दु:ख है। सव्वं दु:खं। हमारार् कत्तव्य तो यह होना चाहिए कि उन दु:खों से छुटकारा पाएं और दूसरों को भी दु:ख से मुक्त करें। एक तू है, जो क्रूरता और निर्दयता का सहारा लेकर स्वयं को भी दु:खी कर रहा है और दूसरों को भी पीड़ा पहुंचा रहा है। क्यों सब के दु:खको बढ़ा रहा है? मैं भी पहले दु:खी था, पर ज्ञान प्राप्त करके बंधन से छूट गया हूं। तू इस बुरे काम को कब छोड़ेगा? तू कब इनसे छुट्टी लेगा? भला, तू कब ठहरेगा?'
अंगुलिमाल ने पहली बार महसूस किया कि बिना शस्त्र के भी आदमी कितना शक्तिशाली हो सकता है। उसे अपने पूर्व-जीवन से घृणा हो गई। उसने कटार फेंक दी और रोते हुए भगवान बुध्द के चरणों में गिर पड़ा, 'मेरी रक्षा करो, मुझे जीवन का सही मार्ग दिखाओ। मैं पापी हूं, मुझे राह दिखाई नहीं देती।' बुध्द ने उसके सिर पर हाथ रखा। धन्य हो गया अंगुलिमाल! 'बुध्दं शरणं गच्छामि' का मंत्र दसों दिशाओं में गूंज उठा।
मंत्र तो आज भी गूंज रहा है, पर कोई भी अंगुलिमाल नहीं सुधरता। न वह कटार अपने हाथों से फेंकता है, न अंगुलियों की माला तोड़ता है। उल्टे हथियारों के बाजार लग रहे हैं और अंगुलियों की ही नहीं, नरमुंडों की मालाएं पहनी जा रही हैं। काश्मीर में यही हो रहा है, तमिलनाडु में इसी का पुनरावर्तन हो रहा है। अपने देश की ही क्यों? पूरे विश्व की ही स्थिति है। लगता है, आतंकवाद का भस्मासुर सारी दुनिया को भस्म करके छोड़ेगा। कौन बचाएगा मानवता को अब? कौन रक्षा करेगा दैविक गुणों की अब? लगता है, 'बुध्दं शरणं गच्छामि' के साथ 'संघ शरणं' और 'धर्मं शरणं' भी आवश्यक हो गया है। सामूहिक रूप से बुध्दिमानीपूर्वक धर्म की शरण ली जाए, तो संभवत: आज का अंगुलिमाल सुधरे, अन्यथा नहीं।
आमोद कुमार
जय हिंद , जय पाटलिपुत्र
पाटलिपुत्र , बिहार, भारत
गौतम बुध्द जीवन भर हिंसा से युध्द करते रहे अपने अहिंसक अस्त्र से। उनका 'बुध्दं शरणं गच्छामि' हार का मंत्र नहीं है, समर्पण की गुहार है। एक ऐसे समय, जब भारतर् कई गणराज्याें में बंटा था और प्रत्येक दो गणराज्य एक-दूसरे की सीमा पर शत्रु की तरह व्यवहार करते थे, बुध्द ने अपने 'धर्म' और 'संघ' को वैश्विक स्तर पर प्रचारित किया।
उनके जीवन की एक मीठी कथा है - अंगुलिमाल वाली। हमारे भारतीय वाङ्मय में कई राह-भटके लोगों के सदाचारी बनने के प्रसंग आते हैं। वाल्मीकि भी रत्नाकर डाकू ही थे, पर आदिकवि हो गए एक शब्द के अन्तर्युध्द से। अंगुलिमाल भी एक वाक्य से पराजित हो गया और एक हजार लोगों की अंगुलियां काटकर उनकी माला पहनने वाला क्रूरतम डाकू कोमलतम साधु हो गया।
महात्मा बुध्द ने अपनी अहिंसा के बल पर बड़े-बड़े दुष्टों को सन्मार्ग पर लगाया था। जो एक बार बुध्द-वाणी सुन लेता था, वह अपने सारे पूर्वाग्रह छोड़कर अपरिग्रह ग्रहण कर लेता था। श्रावस्ती का राजा प्रसेनजित भी महात्मा बुध्द का शिष्य बना। एक दिन आंखों में आंसू भरकर उसने गौतम बुध्द से निवेदन किया, 'प्रभु मैं सब तरह से सुखी और प्रसन्न हूं। मेरी प्रजा को किसी प्रकार का कष्ट नहीं है, किन्तु भन्ते, इन दिनों अंगुलिमाल डाकू ने बड़ा उपद्रव मचा रखा है। बड़ी भयभीत हो गई है मेरी प्रजा उससे।'
बुध्द ने तनिक हास्य बिखेरते हुए पूछा, 'राजन्, अंगुलिमान किस तरह पीड़ित करता है तुम्हारी प्रजा को? वह धन छीनता है या प्राण?'
प्रसेनजित ने चिन्तित भाव से कहा, 'भन्ते, धन तक बात होती तो सही जा सकती है, क्योंकि मेरी प्रजा का वैभव और ऐश्वर्य समाप्त होने वाला नहीं है। प्रभु, वह तो मनुष्यों की हत्या करता है। वह मानसिक रूप से रूग्ण है। उसने अपने इसी पागलपन में एक हजार आदमियों की हत्या करने का प्रण किया है। अब तक कितने आदमियों की हत्या कर चुका है - इसका हिसाब रखने की भी उसने अद्भुत युक्ति निकाली है। वह जब किसी को मारता है, तो उसकी एक अंगुलि काट लेता है। उसके गले में अंगुलियों की एक माला हमेशा पड़ी रहती है, इसलिए उसका नाम अंगुलिमाल पड़ गया है।'
बुध्द ने प्रसेनजित को धैर्य बंधाया और कहा कि उसका कोई उपचार करेंगे। कुछ समय बीता। एक दिन बुध्द के पांव स्वत: ही श्रावस्ती की ओर मुड़ गए। राह में घना जंगल था। लोगों से उन्हें मालूम हुआ कि अंगुलिमाल डाकू इसी वन में रहता है। बुध्द शान्त-स्थिर भाव से उस गहन वन में प्रवेश करने लगे। लोगों ने उन्हें बहुत रोका, शिष्यों ने उन्हें खूब समझाया, राजा के द्वारा नियुक्त पहरेदारों ने उनसे वन में न जाने की अनुनय की, प्रार्थना की। सबको भय था कि कहीं अंगुलिमाल महात्मा बुध्द की हत्या न कर दे।
बुध्द ने सबसे कहा, 'आप चिन्ता न करें। मैं अपनी इच्छा से इन वन में जा रहा हूं। आप सब लौट जाएं, मैं अकेला ही आगे बढूंगा। आज मुझे अंगुलिमाल का आतिथ्य-स्वीकार करना है।'
अपनी आंखों में करुणा की धारा प्रवाहित करते हुए बुध्द उस अगम वन में धीरे-धीरे चले जा रहे थे। सूर्य सिर पर चढ़ आया। पक्षी अपने-अपने घोंसलों में विश्राम करने लगे। मृग झाड़ियों में दुबक गए। हिंसक पशु गुफाओं में चले गए, पर बुध्द अनवरत आगे बढ़ते गए। संसार के जीवों की पीड़ाएं दूर करने का उनका संकल्प अभी पूरा नहीं हुआ था। जो ज्ञान का प्रकाश उन्हें प्राप्त हुआ था, वह जन-जन के हृदय तक अभी पहुंचाना बाकी था। अहिंसा का संदेश जब तक मानव मात्र को नहीं दे देते हैं, तब तक उनके चरणों को विश्राम कहां?
अकस्मात एक कठोर गर्जना पूरे वन प्रांतर में गूंज उठी - 'कौन है जो इस जंगल में चला आ रहा है? रुक जा!'
वह कर्कश ध्वनि पूरे अरण्य को कंपकंपाती बुध्द के कानों में पड़ी। उन्होंने आसपास देखा, कोई दिखाई नहीं दिया। वे फिर मंथर गति से आगे बढ़ने लगे।
'मैं कहता हूं, ठहर जा!' और एक विकराल दैत्याकार मूर्ति झाड़ी में से निकली तथा बुध्द का रास्ता रोककर खड़ी हो गई। काली चट्टान की तरह मांसपेशियां, सीसम की तरह चमकता काला शरीर, अंगारे की तरह धधकती आंखें, घनी डरावनी मूंछे, बेतरतीब बाल और ऊंचा पूरा राक्षसाकार कद। हाथ में कटार लिए तथा गले में अंगुलियों की माला पहने अंगुलिमाल सामने खड़ा था।
बुध्द मन्द हास्य बिखेरते हुए रुक गए और बोले, 'भाई ले, मैं तो ठहर गया! अब बता तू कब ठहरेगा?'
अंगुलिमाल का मुंह खुला रह गया। 'तू कब ठहरेगा' का क्या मतलब? लोग उसके नाम से पीपल के पत्ते की तरह कांपते हैं और यह साधु पूछ रहा है बड़ी निर्भयता से कि 'तू कब ठहरेगा?' यह शांत, प्रसन्न, तेजस्वी और अभय साधु कौन है?
महात्मा बुध्द ने अंगुलिमाल के कंधे पर प्रेम से हाथ रखकर पूछा, 'बोल, चुप क्यों है? कब ठहरेगा तू?'
डाकू हतप्रभ हो गया। कटार पर से उसके पंजे की पकड़ ढीली पड़ गई। आंखों के अंगारे बुझने लगे। चमकता हुआ शरीर पसीने से नहा उठा। उसे लगा, जैसे किसी ने बड़े जोर से उसके मर्म को मथ दिया हो। उसने बुध्द के सामने बड़े दयनीय शब्दों में कहा, 'आप कौन हैं? मैं आपका मतलब नहीं समझ पा रहा हूं।'
महात्मा बुध्द ने गंभीर वाणी में कहा, 'जीवन में जन्म से मृत्यु तक दु:ख ही दु:ख है। सव्वं दु:खं। हमारार् कत्तव्य तो यह होना चाहिए कि उन दु:खों से छुटकारा पाएं और दूसरों को भी दु:ख से मुक्त करें। एक तू है, जो क्रूरता और निर्दयता का सहारा लेकर स्वयं को भी दु:खी कर रहा है और दूसरों को भी पीड़ा पहुंचा रहा है। क्यों सब के दु:खको बढ़ा रहा है? मैं भी पहले दु:खी था, पर ज्ञान प्राप्त करके बंधन से छूट गया हूं। तू इस बुरे काम को कब छोड़ेगा? तू कब इनसे छुट्टी लेगा? भला, तू कब ठहरेगा?'
अंगुलिमाल ने पहली बार महसूस किया कि बिना शस्त्र के भी आदमी कितना शक्तिशाली हो सकता है। उसे अपने पूर्व-जीवन से घृणा हो गई। उसने कटार फेंक दी और रोते हुए भगवान बुध्द के चरणों में गिर पड़ा, 'मेरी रक्षा करो, मुझे जीवन का सही मार्ग दिखाओ। मैं पापी हूं, मुझे राह दिखाई नहीं देती।' बुध्द ने उसके सिर पर हाथ रखा। धन्य हो गया अंगुलिमाल! 'बुध्दं शरणं गच्छामि' का मंत्र दसों दिशाओं में गूंज उठा।
मंत्र तो आज भी गूंज रहा है, पर कोई भी अंगुलिमाल नहीं सुधरता। न वह कटार अपने हाथों से फेंकता है, न अंगुलियों की माला तोड़ता है। उल्टे हथियारों के बाजार लग रहे हैं और अंगुलियों की ही नहीं, नरमुंडों की मालाएं पहनी जा रही हैं। काश्मीर में यही हो रहा है, तमिलनाडु में इसी का पुनरावर्तन हो रहा है। अपने देश की ही क्यों? पूरे विश्व की ही स्थिति है। लगता है, आतंकवाद का भस्मासुर सारी दुनिया को भस्म करके छोड़ेगा। कौन बचाएगा मानवता को अब? कौन रक्षा करेगा दैविक गुणों की अब? लगता है, 'बुध्दं शरणं गच्छामि' के साथ 'संघ शरणं' और 'धर्मं शरणं' भी आवश्यक हो गया है। सामूहिक रूप से बुध्दिमानीपूर्वक धर्म की शरण ली जाए, तो संभवत: आज का अंगुलिमाल सुधरे, अन्यथा नहीं।
आमोद कुमार
जय हिंद , जय पाटलिपुत्र
पाटलिपुत्र , बिहार, भारत
संत कबीर : मस्तमौला फकीर
कबीर का जन्म १२९७ में ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन हुआ वो निडर और खरा खरा बोलने वाले कवि थे। जिन्हें बाद में संत का दर्जा भी प्राप्त हुआ। उन्होंने कभी भी किसी सम्प्रदाय और रुढियों की परवाह नही करी। यही नही उन्होंने हिंदू-मुसलमान सभी समाज में व्याप्त रुढिवादिता तथा कट्टपरंथ का खुलकर विरोध किया। १४१० में देह त्यागने से पहले काशी छोड़कर मगहर चले जाने की वजह भी उसी रूढ़िवादिता को उनका जवाब था, उस समय ये मान्यता थी कि काशी में मरने वाले को मोक्ष प्राप्त होता है। मगहर में कबीर की समाधि भी है और यहाँ हिन्दू मुसलमान दोनों श्रद्धा से सिर नवाने आते हैं।
........... आमोद कुमार , पाटलिपुत्र, बिहार, भारत
Friday, December 25, 2009
आओ हम सब आज बनाये मिलकर वो ही बिहार , जिसके आगे शीष झुकाएगा सारा संसार
श्री अरविंद पाण्डेय जी (I.P.S) की एक आहवान है
"आओ हम सब आज बनाये मिलकर वो ही बिहार , जिसके आगे शीष झुकाएगा सारा संसार , बहुत हुआ , अब उठो और जागो फिर से , हुँकार भरो पटना पाटलिपुत्र बने कुछ ऐसी तुम शुरुआत करो "
अब सोचने की बारी हमलोगों की है नए पाटलिपुत्र के लिए हमलोगों को एक चाणक्य मिल गए है
अब हम बिहारियों को अपना कदम आगे बढ़ाना है और पटना को पाटलिपुत्र बनाना है, आज ही के दिन यीशु मसीह का जन्म हुआ था इस लिए आज बड़ा शुभ दिन है |
जय हिंद , जय पाटलिपुत्र
........... आमोद कुमार , पाटलिपुत्र, बिहार, भारत
"आओ हम सब आज बनाये मिलकर वो ही बिहार , जिसके आगे शीष झुकाएगा सारा संसार , बहुत हुआ , अब उठो और जागो फिर से , हुँकार भरो पटना पाटलिपुत्र बने कुछ ऐसी तुम शुरुआत करो "
अब सोचने की बारी हमलोगों की है नए पाटलिपुत्र के लिए हमलोगों को एक चाणक्य मिल गए है
अब हम बिहारियों को अपना कदम आगे बढ़ाना है और पटना को पाटलिपुत्र बनाना है, आज ही के दिन यीशु मसीह का जन्म हुआ था इस लिए आज बड़ा शुभ दिन है |
जय हिंद , जय पाटलिपुत्र
........... आमोद कुमार , पाटलिपुत्र, बिहार, भारत
Thursday, December 24, 2009
पटना को पाटलिपुत्र बनाना है !!!!!!!!!!!
"सिकंदर को वापस अपने देश में इसी पाटलिपुत्र की धरती के सेना से हार कर लौटना पड़ा था "
मद्रास अब चेन्नई , बॉम्बे मुंबई , कलकत्ता कोलकाता हो गया , बहुत ही आश्चर्य का विषय है की भारत की राजधानी कहलानेवाला पाटलिपुत्र पटना बन कर रह गया
मेरा आप सभी माँ भाई बहनों से यह निवेदन है की पटना को पाटलिपुत्र बनाना है हम सबको इसके लिए आगे आन्दोलन करना है डरना नहीं है पाटलिपुत्र की पावन धरती का फिर से पूरी दुनिया पर छा जाना है
अब हमलोगों को अपने हर एक पत्र में city -Patna के जगह city -पाटलिपुत्र लिखना है |
जय हिंद , जय पाटलिपुत्र
........... आमोद कुमार , पाटलिपुत्र, बिहार, भारत
मद्रास अब चेन्नई , बॉम्बे मुंबई , कलकत्ता कोलकाता हो गया , बहुत ही आश्चर्य का विषय है की भारत की राजधानी कहलानेवाला पाटलिपुत्र पटना बन कर रह गया
मेरा आप सभी माँ भाई बहनों से यह निवेदन है की पटना को पाटलिपुत्र बनाना है हम सबको इसके लिए आगे आन्दोलन करना है डरना नहीं है पाटलिपुत्र की पावन धरती का फिर से पूरी दुनिया पर छा जाना है
अब हमलोगों को अपने हर एक पत्र में city -Patna के जगह city -पाटलिपुत्र लिखना है |
जय हिंद , जय पाटलिपुत्र
........... आमोद कुमार , पाटलिपुत्र, बिहार, भारत
Monday, December 21, 2009
ये अँधा कानून है !!!!! मेरा सबसे प्यारा गाना है !!!!
ये अँधा कानून हैं .........
जाने कहाँ दगा दे - दे जाने किसे सजा दे - दे
साथ न दे कमजोरों का ये साथी है चोरों का
बातों और दलीलों का ये खेल वकीलों का
ये इन्साफ नहीं करता किसी को माफ़ नहीं करता
माफ़ी इसे हर खून है
ये अँधा कानून हैं .........
लोग अगर इससे डरते मुजरिम जुर्म न करते
यह माल लुटेरे लूट गए रिश्वत देकर छूट गए
अस्मतें लूटीं चली गोली इसने आँख नहीं खोली
काला धंधा होता रहा ये कुर्सी पर सोता रहा
दुनिया की इमारत का कच्चा इक सुतून है
ये अँधा कानून हैं .........
लम्बे इसके हाथ सही ताक़त इसके साथ सही
पर ये देख नहीं सकता ये बिन देखे है लिखता
जेल में कितने लोग सादे सूली पर निर्दोष चढ़े
जेल में कितने लोग सादे सूली पर निर्दोष चढ़े
मैं भी इसका मारा हूँ पागल हूँ आवारा हूँ
यारों मुझको होश नहीं सर मेरे जुनून है
ये अँधा कानून हैं .........film -----अँधा कानून
...आमोद
जाने कहाँ दगा दे - दे जाने किसे सजा दे - दे
साथ न दे कमजोरों का ये साथी है चोरों का
बातों और दलीलों का ये खेल वकीलों का
ये इन्साफ नहीं करता किसी को माफ़ नहीं करता
माफ़ी इसे हर खून है
ये अँधा कानून हैं .........
लोग अगर इससे डरते मुजरिम जुर्म न करते
यह माल लुटेरे लूट गए रिश्वत देकर छूट गए
अस्मतें लूटीं चली गोली इसने आँख नहीं खोली
काला धंधा होता रहा ये कुर्सी पर सोता रहा
दुनिया की इमारत का कच्चा इक सुतून है
ये अँधा कानून हैं .........
लम्बे इसके हाथ सही ताक़त इसके साथ सही
पर ये देख नहीं सकता ये बिन देखे है लिखता
जेल में कितने लोग सादे सूली पर निर्दोष चढ़े
जेल में कितने लोग सादे सूली पर निर्दोष चढ़े
मैं भी इसका मारा हूँ पागल हूँ आवारा हूँ
यारों मुझको होश नहीं सर मेरे जुनून है
ये अँधा कानून हैं .........film -----अँधा कानून
...आमोद
Sunday, December 20, 2009
बहुत बहुत धन्यवाद
आपलोगों का आशीर्वाद इसी तरह मिलती रहे तो हमेशा कुछ अच्छा लिखने का प्रयाश करूँगा । आप सभी को बहुत बहुत धन्यवाद !
Friday, December 18, 2009
सिकंदर महान
सिकंदर महान ने अपनी मृत्यु के बाद सारी दुनिया को सन्देश दिया था की देख लो दुनियावालो , सिकंदर खाली हाथ आया था और खाली हाथ जा रहा है | इसलिए यह सब लोगों के लिए सन्देश है , हम सब आपस में प्यार बांटे, सभी से प्यार करे | ...आमोद
राजनीति
" राजनीति जब राष्ट के हित में है तो राजनीति कहलाता है ,
किसी व्यक्ति विशेष के हित में है तो भ्रष्टाचार कहलाता है"
Tuesday, December 15, 2009
बिहार झारखण्ड
आज का न्यूज़ पढ़कर मन में बहुत ख़ुशी हुई की चलो देर सबेर बिहार को बटवाने वाले नेताओ को यह तो महसूश हुआ की विभाजन होकर बहुत गलत काम हुआ !
लोक लज्जा की ज़ब बात आती है तो बिहार के शीर्ष नेताओ को इस चीज़ से कोई फर्क नहीं परता है की लोग क्या कहेंगे ? आज कुछ तो कल कुछ ! झारखण्ड
लोक लज्जा की ज़ब बात आती है तो बिहार के शीर्ष नेताओ को इस चीज़ से कोई फर्क नहीं परता है की लोग क्या कहेंगे ? आज कुछ तो कल कुछ ! झारखण्ड
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