Monday, June 14, 2010

अतीत की स्मृति में मनुष्य के लिए स्वाभाविक आकर्षण है.........

भिन्न भिन्न प्रकार की वस्तुओं को देखकर हमारे मन पर भिन्न भिन्न प्रकार का प्रभाव पड़ता है। किसी सुन्दर वस्तु को देखकर हम प्रफुल्ल हो जाते हैं, किसी अद्भुत वस्तु या व्यापार को देखकर आश्चर्यमग्न हो जाते हैं, किसी दु:ख के दारुण दृश्य को देखकर करुणा से आर्द्र हो जाते हैं।
जीवन तो जीवन-चाहे राजा का हो, चाहे रंक का। उसके सुख और दु:ख दो पक्ष होंगे ही। इनमें से कोई पक्ष स्थिर नहीं रह सकता। संसार और स्थिरता? अतीत के लम्बे चौड़े मैदान के बीच में इन उभय पक्षों की घोर विषमता सामने रखकर आप जिस भावधारा में डूबे हैं उसी में औरों को भी डुबाने के लिए भावुक बातें लिखी हैं ...
''दार्शनिक कहते हैं, जीवन एक बुदबुदा है, भ्रमण करती हुई आत्मा के ठहरने की एक धर्मशाला मात्र है। वे यह भी बताते हैं कि इस जीवन का संग तथा वियोग क्या है-एक प्रवाह में संयोग के साथ बहते हुए लकड़ी के टुकड़ों के साथ तथा विलग होने की कथा है। परन्तु क्या ये विचार एक संतप्त हृदय को शान्त कर सकते हैं?...सांसारिक जीवन की व्यथाओं से दूर बैठा हुआ जीवन संग्राम का एक तटस्थ दर्शक चाहे कुछ भी कहे, किन्तु जीवन के इस भीषण संग्राम में युध्द करते हुए घटनाओं के घोर थपेड़े खाते हुए हृदयों की क्या दशा होती है, यह एक भुक्तभोगी ही बता सकता है।'' अतीत की स्मृति में मनुष्य के लिए स्वाभाविक आकर्षण है। अर्थपरायण लाख कहा करें कि 'गड़े मुरदे उखाडने से क्या फ़ायदा' पर हृदय नहीं मानता, बार बार अतीत की ओर जाया करता है; अपनी यह बुरी आदत नहीं छोड़ता। इसमें कुछ रहस्य अवश्य है। हृदय के लिए अतीत मुक्तिलोक है जहाँ वह अनेक बन्धनों से छूटा रहता है और अपने शुध्द रूप में विचरता है। वर्तमान हमें अन्धा बनाए रहता है; अतीत बीच बीच में हमारी आँखे खोलता रहता है। मैं तो समझता हूँ कि जीवन का नित्यस्वरूप दिखानेवाला दर्पण मनुष्य के पीछे रहता है; आगे तो बराबर खिसकता हुआ परदा रहता है। बीती बिसारनेवाले 'आगे की सुध' रखने का दावा किया करें, परिणाम अशान्ति के अतिरिक्त और कुछ नहीं। वर्तमान को सँभालने और आगे की सुध रखने का डंका पीटनेवाले संसार में जितने ही अधिक होते जाते हैं संघशक्ति के प्रभाव से जीवन की उलझनें उतनी ही बढ़ती जाती हैं। बीती बिसारने का अभिप्राय है जीवन की अखंडता और व्यापकता की अनुभूति का विसर्जन, सहृदयता और भावुकता का भंग-केवल अर्थ की निष्ठुर क्रीड़ा।
जब संसार में कोई वस्तु स्थायी नहीं तो सुख दशा कैसे स्थायी रह सकती है? जिसे कभी पूर्ण सुख समृध्दि प्राप्त थी उसके लिए केवल उस सुख दशा का अभाव ही दु:ख स्वरूप होगा। उसे सामान्य दशा ही दु:ख की दशा प्रतीत होगी। जो राजा रह चुका है उसकी स्थिति यदि एक सम्पन्न गृहस्थी की सी हो जायगी तो उसे वह दु:ख की दशा ही मानेगा। सुख की यह सापेक्षता समष्टि रूप में दु:ख की अनुभूति की अधिकता बनाए रहती है किसी एक व्यक्ति के जीवन में भी, एक कुल या वंश की परम्परा में भी। इसी से यह संसार दु:खमय कहा जाता है।
अच्छे मनुष्य के लिए जीवन एक  अग्नि-पथ हैं , बड़ा मुस्किल होता हैं इस  अग्नि-पथ पर चलना लेकिन अगर कुछ भी अच्छा करना चाहते हैं तो अवस्य चले , दौलत और जवानी एक दिन खो जाती हैं लेकिन हमेशा अग्नि-पथ की यादें राह जाती हैं  !!!!!!!!!!!!!!!!भगवान आदि के चक्कर में ना पड़े ....अपने आप की  ताकत से आगे बढे ....
भारत के संविधान में तो नहीं पर यह प्रकृति का दिया हुआ उपहार हैं की इस धरती में सबको अपनी-अपनी मूर्खताओं और उन पर खुश रहने की छूट है , हो सकता उसमे हम भी एक हो , ... लेकिन मैं यह बात अपने दिल से लिख रहा हूँ की अगर भगवान नाम के कोई भी चीज़ अगर धरती या आकाश जहाँ कही भी हो .....उनसे मैं कह रहा हूँ कि '''''''हे ईश्वर अगर आप अगर सचमुच हैं तो हमको आज मौत दे दीजिये , यह चुनौती हैं मेरा आपके लिए '''''''''''' मैं अगर मर गया तो हे ईश्वर जो लोग मेरे जैसा हैं वह आपकी सदैव आस्तिक बन जायेगा ....... मेरे एक के मरने से दुनियाँ से कोई फर्क भी नहीं पड़ेगा ....वैसे भी मैं तो अपने आपको गुनाहों का देवता मानता हूँ |
आमोद कुमार

पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

5 comments:

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