आज हमें गाँधी को याद करते ही क्या याद आता है एक लाचार, हारा हुआ वृद्ध या फिर वर्त्तमान में असंभव सी लगने वाली त्याग, सत्य, अहिंसा की टिपिकल बाते करने वाला एक सनकी बुड्ढा ? आज का बुद्धजीवी वर्ग गाँधी को नकारने में लगा है उनके अद्वितीय त्याग भरे जीवन को एक ढोंग बता रहा है. युवा वर्ग का गाँधी जी के प्रति दृष्टिकोण वर्तमान के हालातो को देखकर गाँधी को जिम्मेदार मानते हुए बना है. वह यह नहीं जनता की जीवन के अंतिम वर्षो में उनको कितना गहरा दुःख था इस कांग्रेस रुपी चंडाल चौकड़ी के क्रिया कलापों को देखकर. गाँधी जैसी आज़ादी और जैसा आर्थिक माडल चाहते थे देश के लिए वैसा अर्थ व्यवस्था और वैसी ग्रामीण विकास बिलकुल भी नहीं हो सका सही मायनों में गाँधी का देश आजाद ही नहीं हुआ उस लौड़ीयाबज भूरे अंग्रेज जिसके कपडे धुलने इंग्लैण्ड जाते थे ने जैसी नींव रखी और इन गाँधी के नाम को यूज करने वाले नपुंसको ने रही सही कसर 1990 - 94 में पूरी कर दी अगर गाँधी जीवित होते तो देश की ये दुर्दशा देखकर अपने आप को कोसते !
आज लोकतंत्र हमारे लिए महज एक खेल, एक रस्म, कर्मकांड बन कर रह गया है ! भौतिक दृष्टि से हमने भले ही उन्नति कर ली हो परुमाणु बम बना लिए हो रोज नए नए बना रहे हो जो क्षण मात्र में मानव जाती का नामोनिशान मिटा सकते हो. लेकिन शांति हमसे कोसो दूर चली गयी है आदमी आदमी के खून का प्यासा बन चूका है पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हमारे स्वार्थ टकरा रहे है युद्ध से भी भयंकर मुहाने पर हम खड़े है जहाँ अगर युद्ध हुआ तो धरती से जीवन का ही नामोनिशान मिट जायेगा वो भी कुछ सेकेण्ड में ही दैनिक जीवन में हम तनाव से हम घिरते जा रहे है पर्यावरण, ग्लोबल वार्मिंग, शुद्ध जल की कमी से जन्म लेती घातक बीमारियाँ दूर दूर तक हमें कोई विकल्प नहीं नज़र आ रहा है ! ऐसे में अगर गाँधी जी के विचार याद आते है वे होते तो क्या करते ? हमें कौन सा रास्ता दिखाते क्या उनका सत्य, त्याग, करुणा, विश्व बंधुत्व की भावना आज प्रासंगिक ( relevant ) नहीं नज़र आता है बल्कि कल से ज्यादा प्रासंगिक होता नज़र आता है. आज कौन नहीं चाहता की उसका जीवन में शांतिमय हो वह शांति से जीवन जिए गाँधी तो याद आते है मगर कही से कोई उम्मीद की किरण नज़र नहीं आती ! एक बार गाँधी जी ने कहा था - किसी भी जाती और राष्ट्र की धुरी युवा वर्ग होता है युवा वर्ग को वो परिवर्तन की शक्ति मानते थे उन्होंने युवको की भूमिका के बारे में कहा था - 'young man claiming to be fathers of tomorrow should be the salt of the nation. if the salt loses its flavour where shall be salted'
युवा शक्ति और राष्ट्र के अंतर्संबंधो को लेकर गाँधी जी का यह कथन जितना तब सच था उतना आज भी सच है ! जिस देश के युवाओ में राष्ट्र के प्रति समर्पण नहीं होगा उस देश का पतन होने से कोई नहीं रोक सकता आज़ादी से लेकर अब तक काल ( time ) के अनवरत ( continuous ) प्रवाह कई युवा पीढ़ी आगे आई चाहे वो आज़ादी के हीरो भगत सिंह जैसे युवा हो बाद में लोकनायक जय प्रकाश नारायण हो जिन्होंने आपात काल में भी सड़ी गली व्यवस्था से टकराए आम आदमी का नेतृत्व किया लहूलुहान हुए ! फिर सत्ता पक्ष को लगा युवा वर्ग कुछ ज्यादा ही अकड़ने लगा है उसे सत्ता का खतरा महसूस हुआ तो तो उसने पूँजी के लालच में ऐसा धकेला, बाजारवाद में ऐसा भरमाया की उसकी सिट्टी पीती गम हो गयी उसका समाज, राष्ट्र के प्रति चिंतन ख़त्म हो गया वह अब एक उपभोक्ता बन कर रह गया है जिसे मैकडी, पिज्जा बर्गर का चस्का उसकी जीभ में लग चुका है. वह रोटी का स्वाद भूल गया उसका नमक जाता रहा ! उसकी खुशबु खो गयी ! साल्ट की जगह सुगर उसके खून में जा मिली वह नमक हलाल से नमक हराम हो चुका है उसे पता ही नहीं की उसे देश के लिए या करना चाहिए वह सिर्फ कोसना शुरू कर देता है ! त्याग, सत्य, सादगी तो उसके जीवन से कोसो दूर हो चुकी है इसके बाद भी वह त्याग के देवता गाँधी के बारे में अपनी राय तपाक से दे देता है ! दरअसल में सब पूँजी करावा रही है पूँजी का स्वभाव बदल रहा है ! वामपंथी विचारधारा के लोग भी खुलकर पूँजीवाद के समर्थन में आ रहे है ! नंदीग्राम में क्या हुआ ये बताने की जरूरत नहीं लोगो की बस्तिया उजाड़कर पाँच सितारा ( five star) होटल खोलना अगर औद्योगिक विकास है तो यह गाँधी का देश नहीं आज आम आदमी के सपने मर रहे है और बहुत खतरनाक होता है सपनों का मर जाना लोग इस व्यवस्था के खिलाफ हथियार उठाने को अगर मजबूर हो गए तो कौन जिम्मेदार होगा ? गाँधी के विचार कल भी प्रासंगिक थे और आज भी है.हमें इन्हें जीवन में उतरना होगा सादगी का ढोंग रचाने से कुछ नहीं होने वाला .............................
ईश्वर ने शरीर बनाया तो पेट को तीसरे स्थान पर रखा पहले विचार फिर बल फिर पेट (भोग). ठीक उसी तरह वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत समाज में वैश्य तीसरे नंबर पर आता है. लेकिन जब समाज में धन सर्वोपरि हो जाय व्यक्ति की योग्यता उसका चरित्र सब कुछ उसकी आर्थिक स्थिति से तय किया जाने लगे. चाणक्य ने कभी कहा था - 'जिस समाज में धन विचार से बड़ा समझा जाने लगे तो ऐसे समाज का पतन निश्चित है' ! सवाल सिर्फ इतना है कि -
ईश्वर ने शरीर बनाया तो पेट को तीसरे स्थान पर रखा पहले विचार फिर बल फिर पेट (भोग). ठीक उसी तरह वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत समाज में वैश्य तीसरे नंबर पर आता है. लेकिन जब समाज में धन सर्वोपरि हो जाय व्यक्ति की योग्यता उसका चरित्र सब कुछ उसकी आर्थिक स्थिति से तय किया जाने लगे. चाणक्य ने कभी कहा था - 'जिस समाज में धन विचार से बड़ा समझा जाने लगे तो ऐसे समाज का पतन निश्चित है' ! सवाल सिर्फ इतना है कि -
'रोटी बड़ी कि विचार' ?
जो कल थे,
वे आज नहीं हैं।
जो आज हैं,
वे कल नहीं होंगे।
होने, न होने का क्रम,
इसी तरह चलता रहेगा,
हम हैं, हम रहेंगे,
यह भ्रम भी सदा पलता रहेगा।
सत्य क्या है?
होना या न होना?
या दोनों ही सत्य हैं?
जो है, उसका होना सत्य है,
जो नहीं है, उसका न होना सत्य है।
मुझे लगता है कि
होना-न-होना एक ही सत्य के
दो आयाम हैं,
शेष सब समझ का फेर,
बुद्धि के व्यायाम हैं।
किन्तु न होने के बाद क्या होता है,
यह प्रश्न अनुत्तरित है।
प्रत्येक नया नचिकेता,
इस प्रश्न की खोज में लगा है।
सभी साधकों को इस प्रश्न ने ठगा है।
शायद यह प्रश्न, प्रश्न ही रहेगा।
यदि कुछ प्रश्न अनुत्तरित रहें
तो इसमें बुराई क्या है?
हाँ, खोज का सिलसिला न रुके,
धर्म की अनुभूति,
विज्ञान का अनुसंधान,
एक दिन, अवश्य ही
रुद्ध द्वार खोलेगा।
प्रश्न पूछने के बजाय
यक्ष स्वयं उत्तर बोलेगा।
जो कल थे,
वे आज नहीं हैं।
जो आज हैं,
वे कल नहीं होंगे।
होने, न होने का क्रम,
इसी तरह चलता रहेगा,
हम हैं, हम रहेंगे,
यह भ्रम भी सदा पलता रहेगा।
सत्य क्या है?
होना या न होना?
या दोनों ही सत्य हैं?
जो है, उसका होना सत्य है,
जो नहीं है, उसका न होना सत्य है।
मुझे लगता है कि
होना-न-होना एक ही सत्य के
दो आयाम हैं,
शेष सब समझ का फेर,
बुद्धि के व्यायाम हैं।
किन्तु न होने के बाद क्या होता है,
यह प्रश्न अनुत्तरित है।
प्रत्येक नया नचिकेता,
इस प्रश्न की खोज में लगा है।
सभी साधकों को इस प्रश्न ने ठगा है।
शायद यह प्रश्न, प्रश्न ही रहेगा।
यदि कुछ प्रश्न अनुत्तरित रहें
तो इसमें बुराई क्या है?
हाँ, खोज का सिलसिला न रुके,
धर्म की अनुभूति,
विज्ञान का अनुसंधान,
एक दिन, अवश्य ही
रुद्ध द्वार खोलेगा।
प्रश्न पूछने के बजाय
यक्ष स्वयं उत्तर बोलेगा।
जरा सोचिये कि जो प्रेम इतना महान और अनमोल है, वह विवाद, हिंसा और अनैतिकता का कारण कैसे बन सकता है। जरा शांत और एकाग्र होकर सोचें तो सारी सच्चाई सामने आ जाएगी।
जियो और जीने दो ......जियो और जीने दो ......जियो और जीने दो ......जियो और जीने दो ......
जियो और जीने दो ......जियो और जीने दो ......जियो और जीने दो ......जियो और जीने दो ......
......आमोद कुमार,
पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान
1 comment:
हूँ राष्ट्रीय सभा का सैनिक
उसकी ध्वनि पर मर मिटने में
छोटा-सा अनुगामी हूँ।
मैं ख़ुद अपना स्वामी हूँ।
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