Saturday, June 12, 2010

संकल्प बल की यह आखिरी उपलब्धि है...........

राह पर चलते हुए कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति को देखो,फिर चाहे वो इंग्लॅण्ड का सर्वाधिश हो या अमेरिका प्रेसिडेंट ,रशिया का सर्वेसर्वा हो या चीन का सरमुख्त्यार हो,अपने मन में कोई भी तरीके की इर्षा या भय की सोच ना लाओ....उनकी बादशाही नजर को अपनी नजर से देखो......सोचो की में भी वो ही हु......एकबार ऐसा भाव बना लोगे तो धोखे और अविश्वास से भरा यह संसार,आपका कुछ नहीं बिगड़ सकेगा........मार्ग में चलते चलते आपके सामने जब भारी आपत्ति या दुःख ए तब उनमे सुख की अनुभूति करे...क्युकी वह सब ही नित्यानंद प्राप्त करने में निमित्त बनता है........
अशुभ का कभी भी विरोध ना करे.......आप अगर गुस्से या आवेश में आकार किसी को ठीक करने को चले तो सफल नहीं हो पाओगे.....सब परिस्थितियो का स्वागत करे.......फिर क्यों वो आपकी धरना से विपरीत क्यों ना हो....?आप खुद देख सकोगे की प्रत्यक्ष बुराई भलाई में,सच्चाई बदल रही है.......
हरी ॐ ......नारायण हरी....ॐ नमो भगवते वासुदेवाय.........
मनोबल बढ़ाकर आत्मा में बैठ जाओ, आप ही ब्रह्म बन जाओ। संकल्प बल की यह आखिरी उपलब्धि है।अपने को परिस्थितिओ का गुलाम कभी न समझो। तुम स्वयं अपने भाग्य के विधाता हो !
जीवन की पथरीली सी राहों में,तपती हुई दोपहर में चलतेचले जाना हैं , फल की चिंता नहीं करना हैं .......चल चला चल ......मैं निर्भय रहूँगा । मैं बेपरवाह रहूँगा जगत के सुख दु:ख में । मैं संसार की हर परिस्थिति में निश्चिन्त रहूँगा, क्योंकि मैं आत्मा हूँ । ऐ मौत ! तू शरीरों को बिगाड़ सकती है, मेरा कुछ नहीं कर सकती । तू क्या डराती है मुझे ?
दृढ़तापूर्वक निश्चय करो कि तुम्हारी जो विशाल काया है, जिसे तुम नाम और रुप से ‘मैं’ करके सँभाल रहे हो उस काया का, अपने देह का अध्यास आज तोड़ना है । साधना के आखिरी शिखर पर पँहुचने के लिए यह आखिरी अड़चन है । इस देह की ममता से पार होना पड़ेगा । जब तक यह देह की ममता रहेगी तब तक किये हुए कर्म तुम्हारे लिए बंधन बने रहेंगे ।
हे प्रभु ! हे दया के सागर ! तेरे द्वार पर आये हैं । तेरे पास कोई कमी नहीं । तू हमें बल दे, तू हमें हिम्मत दे कि तेरे मार्ग पर कदम रखे हैं तो पँहुचकर ही रहें । हे मेरे प्रभु ! देह की ममता को तोड़कर तेरे साथ अपने दिल को जोड़ लें .....
हाय रे हाय मनुष्य तेरा श्वास ! हाय रे हाय तेरी कल्पनाएँ ! हाय रे हाय तेरी नश्वरता ! हाय रे हाय मनुष्य तेरी वासनाएँ ! आज तक इच्छाएँ कर रहा था कि इतना पाया है और इतना पाँऊगा, इतना जाना है और इतना जानूँगा, इतना को अपना बनाया है और इतनों को अपना बनाँऊगा, इतनों को सुधारा है, औरों को सुधारुँगा ।
मैं निर्भय रहूँगा । मैं बेपरवाह रहूँगा जगत के सुख दु:ख में । मैं संसार की हर परिस्थिति में निश्चिन्त रहूँगा, क्योंकि मैं आत्मा हूँ । ऐ मौत ! तू शरीरों को बिगाड़ सकती है, मेरा कुछ नहीं कर सकती । तू क्या डराती है मुझे ?
निर्भयतापूर्वक, दृढ़तापूर्वक, ईमानदारी और नि:शंकता से अपनी असली चेतना को जगाना हैं .......
......आमोद कुमार, पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

4 comments:

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