Tuesday, March 30, 2010

प्रेम की अभिव्यक्ति हमेशा व्यक्ति की अस्मिता व सम्मान का प्रतीक.....


प्रेम की अभिव्यक्ति हमेशा व्यक्ति की अस्मिता व सम्मान का प्रतीक बनती रही है और इंसानी
इतिहास के विभिन्न पड़ावों पे इसने हमेशा समाज के सड़े -गले मूल्यों - मान्यताओं , रूढियों और
कठ्मुल्लेपन को चुनौती दी है चाहे वो प्रेम सहज मानवीय इच्छाओं को अभिव्यक्ति देता रहा हो या
बुल्लेशाह , वारिश शाह , मीरा आदि जैसे सूफी -संतों का प्रेम रहा हो . लेकिन यह सच है कि
जिस धर्म का इतिहास जितना पुराना होता है वो उतनी ही कट्टरता के साथ इसके ख़िलाफ़ आ खड़ा
होता है . अगर मीरा , शशि - पुन्नू जैसों के खिलाफ हिंदू संस्कृति के पैरोकार पूरी निर्ममता के
साथ खड़े थे तो वहीं बुल्लेशाह , वारिशशाह , मिर्जा - साहिबा जैसों के विरुद्ध इस्लामी समाज
की रुढियों व कट्टरपन से लैस मौलवियों /हाकिमों की जमात कहीं पीछे नही थी .
भारत जैसे देश में हीर - राँझा , शशि - पुन्नू ,लैला -मजनू , मिर्जा -साहिबा , सोहनी -महिवाल

जैसे प्रेमियों के किस्से भरे पड़े हैं , जिनके पन्नों को पलटते हुए भारतीय सामाजिक जीवन का अत्यन्त
क्रूर व असहिष्णु चेहरा सामने आता है जिसने कभी भी सहज मानवीय इच्छाओं को समान नही दिया और
इसमे भारतीय हिंदू संस्कृति व इस्लामी संस्कृति का प्रायः एक जैसा चेहरा दिखाई देता रहा है .लेकि
न इसी भारतीय समाज में बहुत सी ऐसी संस्कृतियाँ रहीं हैं जिनमें व्यक्ति की गरिमा व उसकी सहज
अभिव्यक्तियों को सम्मान मिलता रहा है .ये वो आदिवासी संस्कृतियाँ हैं जिन्हें आज का 'सभ्य'
व ' प्रगतिशील ' समाज असभ्य व जंगली मानता आया है और अक्सर आज भी मानता है.
वैलेंटाइन जैसे त्योहारों का कोई औचित्य नही है बल्कि

मेरे ख्याल से ऐसे त्योहारों को और भी बड़े पैमाने पे मनाया जाना चाहिए .लेकिन क्या सिर्फ़ उसी
रूप में जिस रूप में हमारा बाज़ार इसे चाहता है ?क्या यह त्यौहार बड़े पैमाने पर स्टेटस , ऊपरी ता
मझाम या दिखावे का जरिया मात्र नही लगता ?क्या इसमें यह कोशिश नही रहती कि दूसरों से कुछ
अलग , कुछ विशेष दिखा जाए ?ऐसे में दो व्यक्तियों की संवेदनात्मक गहराइयाँ कहाँ तक एक दूसरे तक
पहुँच पाती हैं ? वे एक दूसरे के सपनों ,पसंद -नापसंद को सिर्फ़ रूमानियत के चश्मे से नही देखते हों
गे ?जो लाजिमी तौर पर यथार्थ की सख्त ज़मीन से टकराते ही चकनाचूर हो जाती है ! क्या इसके
साथ सामाजिकता व नागरिक बोध को जोडा नही जाना चाहिए ?इसके लिए सामाजिक तौर पर
व्यक्ति की गरिमा और सम्मान को स्थापित करने वाली मुहिमों कि शुरुआत नही की जानी चाहिए ?
जो प्रेम की भावना को सच्चे तौर पर समाज में स्थापित कर सके !जिसमें व्यक्ति को , चाहे वो
स्त्री हो या पुरूष ,यह अधिकार मिल सके कि वो अपनी जिंदगी का फ़ैसला ख़ुद कर सके ,यहाँ
तक कि अपने जीवन साथी को अपनी मरजी से चुन सके . उसपे कोई धर्म ,जाति, समुदाय या पंचायत
अपने फासिस्ट अरमान न थोप सके . उन्हें किसी जाति ,समुदाय या धर्मं की इज्ज़त या सम्मान की
वेदी पे बलि न चढाया जा सके !
...आमोद कुमार

Saturday, March 27, 2010

एक शेर और एक आदमी की कहानी !!!!!!!!


आदरणीय दोस्तों एक शेर और एक आदमी की कहानी लिख रहा हूँ !!!...आमोद कुमार

एक बार जंगल से दो आदमी गुजर रहे थे , अचानक एक शेर ने दोनों आदमियों पर हमला कर दिया , उसमे से एक आदमी तो भाग निकला , एक उसी जगह गिर गया , और गिरगिराने लगा क़ि मुझे मत मारों , शेर ने कहा तुम भी तो मेरा शिकार करने के लिए आते हो ,....बात होते होते शेर ने कहा चलो आज से हम दोनों दोस्त बनते हैं , फिर क्या था दोनों जंगल में खूब मिलते थे |
कुछ दिनों बाद आदमी के बेटी का विवाह तय हुआ , और शादी क़ि तिथि भी निर्धारित हो गयी , आदमी दौरा दौरा यह खुशखबरी देने अपने मित्र शेर के पास गया , शेर ने भी कहा चलो दोस्त आज तो बड़ा ख़ुशी का दिन हैं क़ि हमारी बिटिया क़ि शादी तय हो गयी , आदमी ने तुरंत शेर को शादी में आने का आमंतरण भी दे दिया -----तभी शेर बोला देखो दोस्त तो हो आदमी और मैं हूँ शेर , जैसे ही मैं बिटिया क़ि शादी में आऊंगा सभी आदमी भागने लगेंगे , इस लिए मेरा शादी में जाना कही से उचित नहीं होगा , तुरंत आदमी शेर क़ि बात सुनकर जोड़ जोड़ से रोने लगा शेर ने किसी तरह से उसके आंसू पोछे और कहा क़ि जब तुम आने के लिए कह रहे हो तो मैं आ जाऊंगा लेकिन एक शर्त है क़ि तुम मुझे किसी खाली कमरे में बंद कर देना और कमरे के किसी छिद्र से हम बिटिया क़ि शादी देखेंगे , आदमी भी राजी हो गया
शादी के दिन शेर चुपचाप अपने दोस्त के घर पहुँच गया और पूर्व के शर्त के अनुशार आदमी ने शेर को कमरे में बंद कर दिया
बारात धूमधाम से आयी, शेर भी बंद कमरे के छोटी सी छिद्र से बारात देखकर ख़ुशी से मगन था
रात में कुछ बारातीगण उस कमरे के नजदीक जाकर बोले के भाई इस कमरा को क्यों बंद करके रखे है ? तुरंत शेर का दोस्त आदमी जबाब देता था क़ि वहां मत जायो , उस कमरे में """"""हमने एक पागल कुत्ता को बंद करके रखा है"""""" , येही जबाब [ हमने एक पागल कुत्ता को बंद करके रखा है ] वह आदमी हर उस बाराती में आये लोगो को देता था जो भी उस बंद कमरे के बारे में पूछता था |
शेर अंदर से सब बाते अपनी दोस्त का सुनकर बड़ा दुखी हो गया
भोर होते ही सब को सोया देख आदमी ने बंद कमरे का दरवाजा खोला और और शेर को ख़ुशी ख़ुशी यह कहते हुए विदा कर दिया क़ि शादी ख़त्म होते ही वह जंगल में आकर मिलेगा , शेर जंगल के तरफ चला गया
कुछ दिनों बाद शेर से मिलने उसका दोस्त आदमी जंगल में गया , शेर बड़े ही उदास मन से आदमी से बात कर रहा था , तुरंत आदमी ने कहा दोस्त कुछ गलती हो गयी हो तो माफ़ कर देना ----शेर ने कहा ऐसी कोई बात नहीं है तुम एक काम करो दोस्त , यह लो कुल्हारी और मेरे पैर पार मारों , आदमी घबरा गया और बोला दोस्त ये क्या बोल रहे हो ? पागल हो गये हो क्या ? शेर ने कहा अगर तुम सचमुच अपना दोस्त मानते हो तो कुल्हारी से मेरे पैर पार मारों------ आदमी भी मजबूर हो गया और उसने शेर के पैर पार कुल्हारी चला दी , शेर का पैर हल्का कट गया और तुरंत खून निकलने लगा , यह देख वह आदमी रोने लगा ----तब शेर ने आदमी से कहा क़ि रोने क़ि आवश्यकता नहीं है , अब तुम जायो और हमसे पुनः एक महिना बाद मिलना , आदमी रोते रोते घर वापस आ गया |
जब दुबारा वह एक महिना बाद शेर से मिलने गया तो जाते के साथ उसने शेर का घाव देखा तो शेर ने कहा क़ि घाव क्या देखते हो वह तो मिट गया -----
उसके बाद शेर ने आदमी से कहा क़ि हमसे बहुत बड़ी भूल हुई तुमसे दोस्ती करके क्योंकि क़ि आदमी और शेर कभी दोस्त हो ही नहीं सकता है , हमने तुमसे दोस्ती क़ि और तुमने मुझे """""""""""पागल """""""""""" बोला , अब जायो मेरी और तुम्हारी दोस्ती ख़त्म और मेरे पास कभी मत आना क्योंकि कुल्हारी से कटा घाव तो मिट गया लेकिन तुम्हारे बोले हुए बोल के जख्म का घाव तो दिल प़र लगी है जो कभी भी मिट नहीं पायेगी
आदरणीय दोस्तों कहानी लिखने का मूल अर्थ है क़ि मीठी वाणी बोलिए, लिखिए , ऐसी कोई आपतिजनक बाते ना लिखे जिससे किसी को तकलीफ हो ..... सादर अभिवादन के साथ !!!!!!!

Thursday, March 25, 2010

.......कार्य, परिवार, स्वास्थ्य, मित्र, और आत्मा......



आप एक खेल है, जिसमें आप हवा में पांच गेंदों करतब दिखाने हैं के रूप में जीवन की कल्पना कर रहे हैं. आप उन्हें नाम, कार्य, परिवार, स्वास्थ्य, मित्र, और आत्मा.

 तुम जल्दी ही वह काम समझ जाएगा एक रबर की गेंद है.  यदि आप इसे छोड़, इसे वापस उछाल होगी.   -   लेकिन अन्य चार गेंदों - परिवार, स्वास्थ्य, मित्रों और भावना काँच के बने होते हैं.   यदि आप इन में से एक बूंद, वे irrevocably, scuffed हो जाएगा के रूप में चिह्नित, nicked, क्षतिग्रस्त या भी तोड़ दिया.
वे एक ही होना कभी नहीं होगा.तुम्हें समझना चाहिए और कि अपने जीवन में संतुलन के लिए प्रयास करते हैं.
A. अपने आप को दूसरों के साथ तुलना करके अपने मूल्य को कमजोर मत करो. इसका कारण यह है कि हम अलग बात है कि हम में से एक खास है.

B. क्या दूसरे लोगों को समझना महत्वपूर्ण आपके द्वारा निर्धारित लक्ष्यों को मत करो.  सिर्फ तुम जानते हो कि तुम्हारे लिए सबसे अच्छा है.
C.  लेने के लिए अपने दिल के सबसे करीब चीजें दी मत करो. . आप के रूप में उन्हें अपने जीवन से जुड़े हुए होंगे, उनके लिए बिना जीवन व्यर्थ है.
D.  न जाने क्या आपकी अपनी उंगलियों के माध्यम से जीवन में रहने वाले द्वारा पर्ची अतीत या भविष्य के लिए.  एक समय में अपने जीवन एक दिन से, आप अपने जीवन के दिन सभी रहते हैं.
E.  मत देना जब तुम अब भी कुछ देना है.  वास्तव में कुछ भी नहीं है पर पल जब तक आप की कोशिश कर बंद करो.
F.  मत को स्वीकार करते हैं कि आप सही से कम कर रहे हैं डर नहीं है.   यह इस नाजुक धागा है कि बांध हमारे साथ.
G.  करने के लिए जोखिम मुठभेड़ डर नहीं है.  यह मौका है कि हम सीखने कैसे बहादुर होने से है.
H.  कह पाना असंभव है मिल के बंद मत अपने जीवन से प्यार करता हूँ.  तेज तरह प्यार को प्राप्त करने के लिए दे रहा है, सबसे तेजी से रास्ता प्यार खो उसे कस कर पकड़ भी है, और सबसे अच्छा तरीका है रखने के प्यार करने के लिए यह पंख दे रहा है.
I. चलाने के जीवन के माध्यम से इतनी है कि आप भूल नहीं तेजी से न केवल तुम कहाँ गया है, लेकिन यह भी है कि तुम कहाँ जा रहे हैं.
J.  भूल जाते हैं कि एक व्यक्ति की सबसे बड़ी भावनात्मक की जरूरत महसूस की सराहना की है क्या नहीं.
K.  क्या सीखने के डरो मत.  ज्ञान weightless, एक खजाना तुम हमेशा आसानी से ले जा सकता है.
L.  लापरवाही से समय या शब्दों मत का प्रयोग नहीं है.  ना ही लिया जा सकता है.
"मूल्य इसकी कीमत अगर कोई मूल्य ONLY कर दी मूल्य 'है
...आमोद कुमार

राम नवमी की हार्दिक शुभ कामनाये..!! जय श्री भगवान राम

                           राम नवमी की हार्दिक शुभ कामनाये..!! जय श्री भगवान राम                         

रामनवमी राजा दशरथ के पुत्र भगवान राम की स्‍मृति को समर्पित है। उसे "मर्यादा पुरूषोतम" कहा जाता है तथा वह सदाचार का प्रतीक है। यह त्‍यौहार शुक्‍ल पक्ष की 9वीं तिथि जो अप्रैल में किसी समय आती है, को राम के जन्‍म दिन की स्‍मृति में मनाया जाता है।

भगवान राम को उनके सुख-समृद्धि पूर्ण व सदाचार युक्‍त शासन के लिए याद किया जाता है। उन्‍हें भगवान विष्‍णु का अवतार माना जाता है, जो पृथ्‍वी पर अजेय रावण (मनुष्‍य रूप में असुर राजा) से युद्ध लड़ने के लिए आए। राम राज्‍य (राम का शासन) शांति व समृद्धि की अवधि का पर्यायवाची बन गया है।
रामनवमी के दिन, श्रद्धालु बड़ी संख्‍या में मन्दिरों में जाते हैं और राम की प्रशंसा में भक्तिपूर्ण भजन गाते हैं तथा उसके जन्‍मोत्‍सव को मनाने के लिए उसकी मूर्तियों को पालने में झुलाते हैं। इस महान राजा की कहानी का वर्णन करने के लिए काव्‍य तुलसी रामायण से पाठ किया जाता है।
भगवान राम का जन्‍म स्‍थान अयोध्‍या, रामनवमी त्‍यौहार के महान अनुष्‍ठान का केंद्र बिन्‍दु है। राम, उनकी पत्‍नी सीता, भाई लक्ष्‍मण व भक्‍त हनुमान की रथ यात्राएं बहुत से मंदिरों से निकाली जाती हैं।
हिंदू घरों में रामनवमी पूजा करके मनाई जाती है। पूजा के लिए आवश्‍यक वस्‍तुएं, रोली, ऐपन, चावल, जल, फूल, एक घंटी और एक शंख होते हैं। इसके बाद परिवार की सबसे छोटी महिला सदस्‍य परिवार के सभी सदस्‍यों को टीका लगाती है। पूजा में भाग लेने वाला प्रत्‍येक व्‍यक्ति के सभी सदस्‍यों को टीका लगाया जाता है। पूजा में भाग लेने वाला प्रत्‍येक व्‍यक्ति पहले देवताओं पर जल, रोली और ऐपन छिड़कता है, तथा इसके बाद मूर्तियों पर मुट्ठी भरके चावल छिड़कता है। तब प्रत्‍येक खड़ा होकर आ‍रती करता है तथा इसके अंत में गंगाजल अथवा सादा जल एकत्रित हुए सभी जनों पर छिड़का जाता है। पूरी पूजा के दौरान भजन गान चलता रहता है। अंत में पूजा के लिए एकत्रित सभी जनों को प्रसाद वितरित किया जाता है।
जय श्री भगवान राम
...आमोद कुमार

Sunday, March 21, 2010

वृद्धावस्था तक स्मृति-शक्ति तीव्र रखने हेतु सुझाव !!!!!

वृद्धावस्था तक स्मृति-शक्ति तीव्र रखने हेतु सुझाव !!!!!

वृद्धावस्था तक स्मृति-शक्ति तीव्र बनी रहे, इसीलिये भारतीय संस्कृति में रामायण,गीता आदि के नियमित पारायण की व्यवस्था की गई है. इनके अलावा भी कुच्छ बाते है जिससे मनुष्य के मस्तिष्क की स्मृति तीव्र बनी रह सकती है !
वृद्धावस्था तक स्मृति-शक्ति तीव्र बनी रहे, इसीलिये भारतीय संस्कृति में रामायण,गीता आदि के नियमित पारायण की व्यवस्था की गई है. इनके अलावा भी कुच्छ बाते है जिससे मनुष्य के मस्तिष्क की स्मृति तीव्र बनी रह सकती है !!!!

किसी भी तरह क़ि इर्ष्या अपने मन  में ना रखे .
Always think positive.
Get familiar with the scientific method.
Be slightly hungry.
Do Exercise Regularly
Always Sit up straight.
Drink lots of water.
Deep-breathe.
Laugh .........on regular basis
Vary activities. Get a hobby.
Sleep well..
Listen to music. .........on regular basis
Try to sing something ....
Go technology-less.
Change clothes. Go barefoot.
Simplify
Be childish! .........on regular basis
Play any games.
Change your environment. Change the placement of objects or furniture or go somewhere else.
Write! Write a story, poetry.
Learn a musical instrument.
Visit a museum or Zoo.
Learn to speed-read.
Memorize people’s names, and telephone numbers .
Turn off the TV.
Improve your concentration.
Get in touch with nature.
Change the speed of certain activities. Go either super-slow or super-fast deliberately. (जानबुझकर )
Do one thing at a time.
Take time for solitude and relaxation.
Travel abroad. Learn about different lifestyles.
Adopt a genius.
Don’t stick with only like-minded people. Have people around that disagree with you.
Go to the root of the problems.
Summarize books.
Say your problems out loud.
Describe one experience in painstaking detail.
Debate! Defend an argument. Try taking the opposite side, too.
Challenge yourself.
Take notes of your dreams. Keep a notebook by your bedside and record your dreams first thing in the morning or as you wake up from them.
Take different routes each day. Change the streets you follow to work, jog or go back home.
Be around people that are smarter than you.
Help a child with their homework.
Face your fears!
There are many, many ways to keep our brains sharp. I’m sure you have your own personal favorite, so please share it in the comments!!!!!...
आमोद कुमार ....

श्री श्री माँ विंध्यवासिनी ............

श्री श्री माँ विंध्यवासिनी



भगवती विंध्यवासिनी आद्या महाशक्ति हैं। विंध्याचलसदा से उनका निवास-स्थान रहा है। जगदम्बा की नित्य उपस्थिति ने विंध्यगिरिको जाग्रत शक्तिपीठ बना दिया है। महाभारत के विराट पर्व में धर्मराज युधिष्ठिर देवी की स्तुति करते हुए कहते हैं- विन्ध्येचैवनग-श्रेष्ठे तवस्थानंहि शाश्वतम्।हे माता! पर्वतों में श्रेष्ठ विंध्याचलपर आप सदैव विराजमान रहती हैं। पद्मपुराणमें विंध्याचल-निवासिनीइन महाशक्ति को विंध्यवासिनी के नाम से संबंधित किया गया है- विन्ध्येविन्ध्याधिवासिनी।
श्रीमद्देवीभागवतके दशम स्कन्ध में कथा आती है, सृष्टिकत्र्ता ब्रह्माजीने जब सबसे पहले अपने मन से स्वायम्भुवमनु और शतरूपाको उत्पन्न किया। तब विवाह करने के उपरान्त स्वायम्भुवमनु ने अपने हाथों से देवी की मूर्ति बनाकर सौ वर्षो तक कठोर तप किया। उनकी तपस्या से संतुष्ट होकर भगवती ने उन्हें निष्कण्टक राज्य, वंश-वृद्धि एवं परम पद पाने का आशीर्वाद दिया। वर देने के बाद महादेवी विंध्याचलपर्वत पर चली गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि सृष्टि के प्रारंभ से ही विंध्यवासिनी की पूजा होती रही है। सृष्टि का विस्तार उनके ही शुभाशीषसे हुआ।
त्रेतायुगमें भगवान श्रीरामचन्द्र सीताजीके साथ विंध्याचलआए थे। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम द्वारा स्थापित रामेश्वर महादेव से इस शक्तिपीठ की माहात्म्य और बढ गया है। द्वापरयुगमें मथुरा के राजा कंस ने जब अपने बहन-बहनोई देवकी-वसुदेव को कारागार में डाल दिया और वह उनकी सन्तानों का वध करने लगा। तब वसुदेवजीके कुल-पुरोहित गर्ग ऋषि ने कंस के वध एवं श्रीकृष्णावतारहेतु विंध्याचलमें लक्षचण्डीका अनुष्ठान करके देवी को प्रसन्न किया। जिसके फलस्वरूप वे नन्दरायजीके यहाँ अवतरित हुई।
मार्कण्डेयपुराणके अन्तर्गत वर्णित दुर्गासप्तशती(देवी-माहात्म्य) के ग्यारहवें अध्याय में देवताओं के अनुरोध पर भगवती उन्हें आश्वस्त करते हुए कहती हैं, देवताओं वैवस्वतमन्वन्तर के अट्ठाइसवेंयुग में शुम्भऔर निशुम्भनाम के दो महादैत्यउत्पन्न होंगे। तब मैं नन्दगोपके घर में उनकी पत्नी यशोदा के गर्भ से अवतीर्ण हो विन्ध्याचल में जाकर रहूँगी और उक्त दोनों असुरों का नाश करूँगी।
लक्ष्मीतन्त्र नामक ग्रन्थ में भी देवी का यह उपर्युक्त वचन शब्दश:मिलता है। ब्रज में नन्द गोप के यहाँ उत्पन्न महालक्ष्मीकी अंश-भूता कन्या को नन्दा नाम दिया गया। मूर्तिरहस्य में ऋषि कहते हैं- नन्दा नाम की नन्द के यहाँ उत्पन्न होने वाली देवी की यदि भक्तिपूर्वकस्तुति और पूजा की जाए तो वे तीनों लोकों को उपासक के आधीन कर देती हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराणके श्रीकृष्ण-जन्माख्यान में यह वर्णित है कि देवकी के आठवें गर्भ से आविर्भूत श्रीकृष्ण को वसुदेवजीने कंस के भय से रातोंरात यमुनाजीके पार गोकुल में नन्दजीके घर पहुँचा दिया तथा वहाँ यशोदा के गर्भ से पुत्री के रूप में जन्मीं भगवान की शक्ति योगमाया को चुपचाप वे मथुरा ले आए। आठवीं संतान के जन्म का समाचार सुन कर कंस कारागार में पहुँचा। उसने उस नवजात कन्या को पत्थर पर जैसे ही पटक कर मारना चाहा, वैसे ही वह कन्या कंस के हाथों से छूटकर आकाश में पहुँच गई और उसने अपना दिव्य स्वरूप प्रदर्शित किया। कंस के वध की भविष्यवाणी करके भगवती विन्ध्याचल वापस लौट गई।
मन्त्रशास्त्रके सुप्रसिद्ध ग्रंथ शारदातिलक में विंध्यवासिनी का वनदुर्गा के नाम से यह ध्यान बताया गया है-
सौवर्णाम्बुजमध्यगांत्रिनयनांसौदामिनीसन्निभां चक्रंशंखवराभयानिदधतीमिन्दो:कलां बिभ्रतीम्। ग्रैवेयाङ्गदहार-कुण्डल-धरामारवण्ड-लाद्यै:स्तुतां ध्यायेद्विन्ध्यनिवासिनींशशिमुखीं पा‌र्श्वस्थपञ्चाननाम्॥
जो देवी स्वर्ण-कमल के आसन पर विराजमान हैं, तीन नेत्रों वाली हैं, विद्युत के सदृश कान्ति वाली हैं, चार भुजाओं में शंख, चक्र, वर और अभय मुद्रा धारण किए हुए हैं, मस्तक पर सोलह कलाओं से परिपूर्ण चन्द्र सुशोभित है, गले में सुन्दर हार, बांहों में बाजूबन्द, कानों में कुण्डल धारण किए इन देवी की इन्द्रादिसभी देवता स्तुति करते हैं। विंध्याचलपर निवास करने वाली, चंद्रमा के समान सुंदर मुखवालीइन विंध्यवासिनी के समीप सदाशिवविराजितहैं।
सम्भवत:पूर्वकाल में विंध्य-क्षेत्रमें घना जंगल होने के कारण ही भगवती विन्ध्यवासिनीका वनदुर्गा नाम पडा। वन को संस्कृत में अरण्य कहा जाता है। इसी कारण ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष की षष्ठी विंध्यवासिनी-महापूजा की पावन तिथि होने से अरण्यषष्ठी के नाम से विख्यात हो गई है।
..आमोद कुमार

Saturday, March 20, 2010

अभी रात्रि का समय 1.45 AM है , मेरी नींद अचानक खुल गई है ....

मै अपने छतिग्रस्त कार कि भी फोटो लगा रहा हूँ.. साथ साथ दुर्घटना के बाद अपनी भी .....








अभी रात्रि का समय 1.45 AM है , मेरी नींद अचानक खुल गई है , और नींद भी नहीं आ रही है  तो सोंचा कि क्या करू  तो लिख रहा हूँ .कल दिनांक 18th March 2010 को जब मैं Office के लिए निकला था, तो सोंचा क्यों ना रजनीश जी से भी हाल चल पुछ ली जाये , और Dashboard पर रखी मोबाइल से dial कर उनसे बाते करने लगा , हमेशा कि तरह जब मेरी बात शुरू हो  गयी तो मैंने पुनः उस मोबाइल का Speaker On करके Dashboard पर  रख  दिया और बाते करने लगे , [ यह मेरी हमेशा कि आदत है कि मैं जब गारी में अकेला होता हूँ उस समय मोबाइल का  Speaker On करके Dashboard पर रखकर बाते करता हूँ , क्योंकि गारी अंदर कोई भी दूसरा व्यक्ति सुन ने वाला नहीं रहता है .] ....उसके बाद एअरपोर्ट के रास्ते में मैं रोज कि तरह ....जय भोलेनाथ ....जय भोलेनाथ ....जय भोलेनाथ ... जय माँ दुर्गा , जय माँ दुर्गा , जय माँ दुर्गा , .....जय माँ श्री श्री  विंध्यवासिनी.....जय माँ श्री श्री विंध्यवासिनी.....जय माँ श्री श्री विंध्यवासिनी करता जा रहा था , चुकि उस समय गारी बहुत ही धीरे चलाता हूँ ,  इसलिए बाते भी हो रही थी और गारी मैं बहुत ही धीरे कि लगभग 20 kmph to 30 kmph   Speed रही होगी , कि अचानक एक  पीछे से बहुत ही तेज गति से आ रही  Scorpio Jeep [SPEED  लगभग 80 kmph to 90 kmph ] ने आकर  ने जबरदस्त धक्का मारा, धक्का इतना जबरदस्त था कि मेरी गारी का दोनों आगे का चक्का कुछ दुरी तक उठता चला गया और मैं गारी में पीछे कि तरफ अचेत सा गारी कि seat पर ही गिर गया , मैंने किसी तरह अपना नियंतरण बना कर पीछे कि गारी के तरफ देखा तो पाया कि बहुत सारी गारी रुक कर उस  Scorpio Jeep को घेरने लगी , मैंने तुरंत अभिवावक को इसकी सुचना दी तब तक वह गारी बाला Driver कटा हुआ Divider से गारी मोरकर भागने लगा और वह Airport   के अंदर चला गया , मैं भी उसको देखकर उसके पीछे गारी से पीछा करते हुए Airport के तरफ जाने लगा , लेकिन मैं उसको  Airport  के अंदर जाता देख Airport Police Mobile को उस White colour Scorpio जिसका नंबर BR-31P-1121 था उसको पकरने के लिए निवेदन किया , साथ साथ पीछे से आ रहे अंजान लोगो ने भी कहा कि भाई जल्दी पकरिये उस गारी को क्योंकि हम लोगो ने भी देखा है कि उसने जबरदस्ती जान बुझ कर धक्का मारा है , इस आदमी के साथ घोर अन्याय किया है Scorpio वाले ने , उसके बाद मैं खुद भी AIRPORT  के  अंदर गया लेकिन वह नहीं मिला , मेरे अभिवावक बहुत बेचैन थे उन्होंने कहा आप जल्दी मेरे पास आ जाइये , गारी अवस्य पकर ली जायेगा , मैंने उनके आदेश का पालन करते हुए गारी मोर्ड़  कर जाने लगा , और तुरंत उस समय रजनीश जी को भी बताया कि चुकि एक गारी ने हमको धक्का मार दिया था इसलिए पता नहीं कैसे LINE CUT गया था , मैंने उनसे इस बात के लिए SORRY भी बोला , और फिर LINE DISSCONNECT कर अपने अभिवावक के पास जाने लगा ,
अब देखिये यहाँ असली समस्या खड़ी हो गयीं जैसे मैंने अपने कार के हुलिया पर ध्यान तो देखा गारी के अंदर सारा सामान बिखरा परा है , मैंने गारी रोक कर सब सामान को ठीक किया और धक्का लगने के क्रम में बाया पैर में मोंच कि तरह दर्द कर रहा था , चलने में दिक्कत हो रही थी , फिर भी वहाँ पहुचना था , क्योंकि वे अगर हमको सही सलामत नहीं देखते तबतक बेचैन रहते , फिर मैं किसी तरह हिम्मत बांध कर पहुँच गया उनको अपना चेहरा दिखाने के लिए , अंदर से पैर के मोंच के दर्द से  कराह रहे थे लेकिन उनको पता नहीं चलने दिया कि हमको किसी तरह कि चोट आई है , और जैसे ही  वह एक URGENT MEETING के निकले मैं फरार हो गया , क्योंकि मैं आज तक कोई भी बात नहीं छुपाई है उनसे , अगर नहीं वहाँ से भागता तो मैं अपने अभिवावक के प्यार को देखकर सच्ची बात बोलकर रो परता . [अभी उनकी याद आयी और मैंने फिर रोना शुरू कर दिया ] अब रोते रोते ही लिख रहां हूँ कि बिहार के वर्तमान और भूतपूर्व मुख्यमंत्री  भी  जानते है कि मैं गारी अच्छी ही नहीं , बहुत अच्छी चलाता हूँ , उन लोगो को भी हमने अपने घर कि गारी से DRIVER  बनकर , अच्छा खाशा दुरी तय कराई  है , यहाँ तक कि मै मुख्यमंत्री  CAR भी उनके कहने पर चलाई है , लेकिन हमको उनलोगों से  क्या लेना देना है , वे लोग बरे लोग है , लेकिन हम तो स्वार्थी है हम आदर प्रेम और समर्पण कि भावना  सिर्फ अपने अभिवावक के लिए रखते हैं , क्योंकि अभी तक कोई भी उनकी तरह सच्चा, बहादुर , महाज्ञानी  इंसान मुझे नहीं मिला था . मेरा  जीवन तो धन्य हो गया उनको पाकर. 
जब मैं अपने कार्यालय पहुंचा तो DIGITAL CAMERA से फोटो खिचवा कर FACEBOOK पर भी लगाई , जिससे किसी तरह का शक मेरे अभिवावक को नहीं हो , फिर मैं दो घंटा बाद ऑफिस में ही सो गया , जब सोकर उठे [ TIME रहा होगा 6:45 PM ]  तब पैर में भी आराम लग रहा था , फिर जाकर FACEBOOK पर LIKE ,LIKE CLICK करके अपने आवास पर उसी गारी से वापस खुद चलाते हुए आ गया .
अभी रात में जब  याद आई उनकी तब लगा कि मैं तो बेशर्म कि तरह सो गया , और मेरे अभिवावक  दिन भर थाना POLICE से उलझते रहे , अब मेरे रोने से क्या होगा जो कभी भी तनाव में नहीं रहते है उनको हमने तनाव दे दिया , इस से और बड़ी बात क्या हो सकती है मेरे बेशर्मीपन क़ी.
मेरी ईश्वर से एक प्राथना है कि, हे ईश्वर मुझे उपर बुला लीजिये नहीं तो अच्छा खाशा  तनाव में नहीं रहने बाले व्यक्ति को भी हम तनाव दे देते है इस से बुरी बात और क्या हो सकती है मेरे लिए.
मैं उन्ही को अपना भोलेनाथ मानता हूँ.
जय भोलेनाथ.... जय माँ दुर्गा .....जय माँ श्री श्री माँ विंध्यवासिनी
 जय हिंद , जय हिंद कि सेना ....
....आमोद कुमार

Thursday, March 11, 2010

महिला आरक्षण विधेयक


महिला आरक्षण विधेयक के कल राज्यसभा में पारित हो जाने के बाद आज लोकसभा में इस विधेयक को लेकर काफी हंगामा मचा, जिसके बाद लोकसभा को कल तक के लिए स्थगित कर दिया गया।
कितना शर्म क़ि बात है क़ि महिला आरक्षण विधेयक के विरोध में फिर कोई अप्रिय स्थिति का सामना न करना पड़े, इसलिए लोकसभा से पेंसिल, पेपर वेट हटा दी गई।
अब आप बताये क्या हमलोगों ने माननीय सांसदगन को वहां मारपीट के लिए मनोनीत किया है ?  भारतवर्ष के हरेक संवेदनशील नागरिक टीवी पर सांसद क़ि कार्यवाई को देख रहे है , क्या मनो स्थिति बन रही है |
महिलावर्ग को  सम्मान देने के बजाये माननीय सांसदगन खुलेआम सांसद भवन से अपमान कर रहे है , सबलोग चिंतन करे .
जिनको ज्यादा फिक्र दलितों , महादलितो , कमजोर वर्ग के लिए हो रही है वह बिलकुल वकवास है , अगर इतना ही फिक्र है तो इनलोगों को अपनी अपनी पार्टी के संसदीय दल की बैठक करके  ८०% महिला वर्ग को अपना उम्मीदवार चुनाव में बनाये , झूठ मूठ का नौटंकी करना बंद करे , कौन इनको मना कर रहा  है ???? क्योंकि जनता लोग सब देख रही है.
जय हिंद , जय भारत

..आमोद कुमार

Tuesday, March 9, 2010

जय हो मेरे भोलेनाथ.... जय हो श्री माँ दुर्गा सप्तशती...

जय हो मेरे भोलेनाथ.... जय हो श्री माँ दुर्गा सप्तशती...


जब श्री माँ दुर्गा सप्तशती ने यज्ञ में पिता प्रजापति के अपमान से अपने को अग्नि कुंड में समर्पित कर दी थी , भगवान शंकर ने अपने को अपमानित देखकर अपने ससुर के यहाँ पहुचे और तुरंत माँ सप्तशती का शव उठाकर तांडव करने लगे , और पूरा ब्रह्माण्ड हिलने लगा , यह देख भगवान श्री विष्णु घबरा गए और सोंच में पर गए की श्री शंकर भोलेनाथ को शांत नहीं किया गया तब तो इस सृष्टी का ही विनाष हो जायेगा , तब भगवान श्री विष्णु ने अपने चक्र से माँ सप्तशती के शव को टुक्रे टुक्रे में विभक्त कर दिया क्योंकि जब तक माँ सप्तशती का शव नहीं हटता भोलेनाथ शांत नहीं होते , माँ सप्तशती का टुकरा जहाँ जहाँ गिरा उन्हें माँ शक्तिपीठ के नाम से जाना गया , वोही जय माँ श्री श्री माँ विंध्यवासिनी है , वोही माँ पटनदेवी है , वोही माँ छिनमस्तिका हैं , वोही माँ वैष्णो देवी हैं , वोही माँ चामुंडी हैं , वोही माँ बंगलामुखी हैं और भी कई माँ हैं जो भी, मुझे याद नहीं आ रही है ,

हम सही हैं क़ि गलत इस पर मुझे ज्ञान देने क़ि कृपा क़ि जाये
...आमोद

भगवान शंकर और माँ दुर्गा शैलपुत्री .......


भगवान शंकर और माँ दुर्गा शैलपुत्री .......
Durga Shailputri: Shailputri means the daughter of the mountain, Himalaya. In this form we see the divine Mother holding a trident in her right hand and a lotus on her left. She is seen seated on an ox.
In her previous birth, she was called Sati, Bhavani and was the daughter of King Daksha. After a lot of penance, she married Lord Shiva. But her father King Daksha was not too pleased. He had arranged for a Yagya/Yagna (Ritual done around the sacrificial fire) where he invited everyone except his son-in-law, Lord Shiva. Upset and feeling humiliated, Sati decided to attend the event uninvited. There, her father insulted Lord Shiva and in fury she stood on the sacrificial fire and burnt herself alive.
Lord Shiva enraged, ordered his followers to demolish the Yagya. Sati was reborn as the daughter of the king of the mountains, Himalaya in the name of Parvati – Hemvati and got married with Lord Shiva again. Her this Swaroop is worshipped on the first day of the Navratri celebrations.
..आमोद

Sunday, March 7, 2010

भोले ओ भोले , तू रूठा दिल टूटा.............



क्या मेरे भोलेनाथ धरती पर पापियों का पाप देखने  के लिए भेजे थे क्या ? मेरा तो कोई बात आप सुनते ही नहीं है ,अगर मेरा यहाँ कोई काम नहीं है तो क्यों नहीं उपर बुला लेते है , अगर सचमुच आप सच्चाई के देवता है तो दिखाईये अपना चमत्कार , अगर आप इसी तरह खुश है तब तो कोई बात ही नहीं है , हम तो आपको प्रतिदिन देखते है , आशा का पूल बना कर रखे है, ये कैसा न्याय है चोर सब शान से घूम रहे और हम सहमे हुए , क्यों दिखाया  सपने जब नहीं देना है तो ? अब अगर देना हैं तो दीजिये नहीं तो वापस बुला लीजिये , आप मेरी आँखों में नींद क्यों डाल रहे है ? जा रहे हैं सोने , आप चैन  से रहिये ! जय हो शंकर सच मुच आपको समझना बड़ा मुस्किल हैं .  
...आमोद कुमार

Monday, March 1, 2010

आज होली है , अपने मन क़ी बात लिखकर खेलूँगा होली !!!!!!!

आज होली है , अपने मन क़ी बात लिखकर खेलूँगा होली !!!!!!!
मुझे शुरू से स्वंतंत्र रूप से जीने क़ी इच्छा थी लेकिन समय का नियति का ऐसा चक्र चला क़ी हमेशा गुलाम के तरह जीना परा ,
मेरे पिता का सरकारी आवास 7 No. Harding road था , वहां हम भी रहते थे , हमेशा लोफरो क़ी तरह motorcycle ya कोई भी घर क़ी गाड़ी से घूमा करता था , बचपन से ही नया करने क़ी हमेशा नया कुछ करने का जनून सवार रहता था , कोई भी जान पहचान का व्यक्ति आते थे हमारे यहाँ तो चुपके से उनकी गाड़ी स्टार्ट करके खूब चलते थे , उसके बाद घर में माँ पर्दा के डंडा से अच्छा पिटाई मेरा करती थी , फिर भी मैं नहीं मानता था , मैं नौवी वर्ग का छात्र था था तब स्वर्गीय श्री कर्पूरी ठाकुर , अपने पिता , श्री लालू प्रसाद यादव , श्री राम जीवन सिंह और भी कई लोग को लेकर बेतिया उप चुनाव में अपने पिता क़ी जीप गारी चलाकर इनलोगों को बैठा कर ड्राईवर बन कर जाता था क्योंकि इन लोगो के पास हमेशा ड्राईवर का अवाभ रहता था ,
श्री लालू प्रसाद , श्री जाबिर हुसैन , श्री रंजन यादव ,श्री वृषण पटेल , श्री शरद यादव , श्री श्रीनारायण यादव , श्री जय प्रकाश यादव , और भी बहुत सारे लोग जहाँ भी हमको गारी चलाते कही जाते देख लेते थे , वहां पर तुरंत रुकवा कर बैठ जाते थे और जहाँ जहाँ जाना रहता था वहां वे लोग जाते थे , हम भी ख़ुशी ख़ुशी उनलोगों को घुमाते थे .
घर अगर ५ बजे के बाद पहुँचते थे तो फिर माँ अपना चमत्कार पर्दा के डंडा से दिखाती थी , लेकिन हम भी एक दम विशुद्ध रूप से थेथर थे कोई फर्क नहीं परता था , मार खाकर बहुत ही ख़ुशी पूर्वक सो जाते थे , अगर मेरे पिता जी को पता  चलता था तो बहुत ही माँ को खूब डांट पिलाते थे , और मुझे बरी ख़ुशी उस समय होती थी !
मेरी माँ ज्यादा से ज्यादा ५ रुपया देती थी , लेकिन हम इतना बड़ा चोर थे क़ी पूछिए मत जैसे ही माँ खाना बनाने जाती थी अगर गलती से गोदरेज का चाभी छुट जाता था मै तुरंत उसमे से पैसा चुरा  लिया करता था माँ को पता भी नहीं चलता था , मेरा यह सिलसिला आज भी जारी रहता है फर्क सिर्फ इतना है क़ी माँ आज पिटती नहीं है , सिर्फ इतना बोलकर चुप हो जाती हैं क़ी इतना बड़ा हो गये हो और शर्म भी नहीं आती है और मैं हमेशा यह बोलकर निकल जाऊंगा क़ी माँ तुमसे कैसा शर्म हैं तुम को तो अपने बेटा पर गौरव करना चाहिए क़ी जो किसी का भी कितना भी धन रहता है उसको छुना पाप समझता है और तुम्हारा पैसा खा के मुझे पूर्ण संतुष्टि मिलती है .
देखिये अब मुझे नींद आ रही मैं वह कोई बात नहीं लिखा हूँ जिसके लिए मैंने लिखना शुरू किया है , मैं अपनी इस कहानी को आगे जारी रखूंगा जब फिर समय मिलेगा तबतक के लिए ....... ब्रेक
.............आमोद कुमार