Wednesday, March 9, 2016

जय भगवान श्री कृष्णा .....................



अज्ञानता के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर केवल आत्मिक विचार,. जब हम ईश्वर से प्रेम करने लगते हैं तो कोई भी सांसारिक वस्तु इस लायक नहीं प्रतीत होती कि उससे प्रेम किया जाए। जब चातक पक्षी पावस में गिरने वाली ओस की पहली बूंदों का प्यासा हो जाता है तो उसे न तूफान का भय होता है और न बादलों की गर्जना का। इसी तरह साधक भी यदि एक बार ईश्वर के सानिध्य का स्वाद चख ले तो फिर उसे संसार में बाकी सब चीजें फीकी और बेस्वाद जान पड़ती हैं। सांसारिक लाभ-हानि के समीकरण धुंधले पड़ जाते हैं।

एक व्यक्ति बहुत परेशान था। उसके दोस्त ने उसे सलाह दी कि कृष्ण भगवान की पूजा शुरू कर दो।उसने एक कृष्ण भगवान की मूर्ति घर लाकर उसकी पूजा करना शुरू कर दी। कई साल बीत गए लेकिन ...कोई लाभ नहीं हुआ।एक दूसरे मित्र ने कहा कि तू काली माँ कीपूजा कर,जरूर तुम्हारे दुख दूर होंगे।अगले ही दिन वो एक काली माँकी मूर्ति घर ले आया।कृष्ण भगवान की मूर्ति मंदिर के ऊपर बने एक टांड पर रख दी औरकाली माँ की मूर्ति मंदिर में रखकरपूजा शुरू कर दी।कई दिन बाद उसके दिमाग में ख्याल आया कि जो अगरबत्ती, धूपबत्तीकाली जी को जलाता हूँ, उसे तोश्रीकृष्ण जी भी सूँघते होंगे।ऐसा करता हूँ कि श्रीकृष्ण का मुँह बाँध देता हूँ।जैसे ही वो ऊपर चढ़कर श्रीकृष्ण कामुँह बाँधने लगा कृष्ण भगवान ने उसका हाथ पकड़ लिया। वो हैरानरह गया और भगवान से पूछा - इतने वर्षों से पूजाकर रहा था तबनहीं आए! आज कैसे प्रकट हो गए?भगवान श्रीकृष्ण ने समझाते हुए कहा, "आज तक तू एक मूर्ति समझकर मेरी पूजा करता था।किन्तु आज तुम्हें एहसास हुआ कि"कृष्ण साँस ले रहा है "बस मैं आ गया।"


......आमोद कुमार पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान