Thursday, June 17, 2010

सत्य बातो को लिखने से तो पापी और झूठे लोग डरते हैं ,श्री अजित गुप्ता जी हम आखिर किस बात से डरे !!!!!!!!! !!!!!!!!!

श्री अजित गुप्ता जी नाम के एक महाशय ने मेरे ब्लॉग प़र एक Comment भेजा ......."आपके विचार तो श्रेष्ठ हैं , लेकिन इतना सारा फोटो लगाकर अपने आपको सिद्ध क्या करना चाहते हैं "............हमने उनके Comment को Reject कर दिया ,.......और सिर्फ श्री अजित गुप्ता जी के लिये यह जबाब लिख रहा हूँ कि सर हम तो अपने ब्लॉग का मतलब अपना ब्लॉग समझते हैं और हम यह कभी नहीं चाहते हैं कि कोई भी व्यक्ति हमारे ब्लॉग प़र Comment लिखे ......हम तो अपना फोटो सिर्फ इसलिये लगाते थे कि एक Routine Work की तरह अपना फोटो लगाये और वह भी प्रतिदिन का ताकि जब कभी मौका मिले हम Date के अनुसार अपना फोटो निकालकर एक अपना Album Print कर लेंगे ..........और अपना फोटो लगाकर कुछ ना कुछ तो लिखना पड़ता हैं इस लिये जो मन में आता था लिख देते थे .......इन्टरनेट प़र वैसे भी झूठे लोग और मानसिक रोगी लोगो की एक अच्छी खाशी जनसख्या हैं जिनका फोटो गलत ही लगा रहता हैं बहुत कम मात्रा में सच्चे इंसान इन्टरनेट प़र हैं जिनका सही चित्र लगा हुआ हैं ..........इन्टरनेट लिखने से मेरा मतलब हैं कि Facebook , Orkut, Hi5 etc....
जहाँ तक अपने आपको सिद्ध करने की बात रही जो श्री अजित गुप्ता जी ने लिखी हैं तो मैं कहना चाहूँगा कि मैंने भारतवर्ष की जो भी मुख्य सम्मानित जाँच परीक्षा थी उसमे सफलता प्राप्त की ....... अब ब्लॉग प़र भी कुछ सिद्ध करना होता हैं यह हम नहीं जानते हैं सर ...........सर जी फिर भी हम अपने आपको एक अच्छा खाशा मुर्ख लड़का  ही मानते   हैं और हम क्यों कुछ ब्लॉग प़र सिद्ध करना चाहेंगे ? ......देखिये ब्लॉग की यह बात आपने पढ़ी ही होगी "सही बात सही वक़्त पे किया जाये तो उसका मज़ा ही कुछ और है , और मैं सही वक़्त का इंतज़ार करता हूँ ." -त्रिशूल ........और आपने आज सचमुच बहुत ही सही समय प़र सही बात लिखी  हैं सर............
मुझे आपकी बातें बहुत पसंद आयी......अब तो मुझे अच्छा खाशा बहाना मिल गया ब्लॉग नहीं लिखने का और फोटो खींचकर Insert करने का ...मैं आपका बहुत बहुत आभारी सदैव बना रहूँगा इस बात के लिये..........
"जिसने हर रोज अपनी माँ को थोड़ा थोड़ा मरते देखा हो , उसे मौत से डर नहीं लगता ." - Trishul ..... श्री अजित गुप्ता जी सचमुच मेरे लिये एक समय ऐसा भी आया था जिस समय यह पंक्ति भी हम प़र पुरी तरह से लागू होती थी , और इस विषय प़र मैं कोई सफाई आपको देना पसंद नहीं करूंगा.......अगर आपको सचमुच सत्य जानना हो तो हमारे गाँव जहाँ का मैं रहनेवाला हूँ वहां जाकर पता कीजियेगा और भी बहुत सारे सत्य से अवगत हो जायेंगे.......
बस इन ही सब कारणों से मैं अपना फोटो लगाता था और ब्लॉग भी लिखता था........हम श्री अजित गुप्ता जी को धन्यवाद देते हैं कि उन्होंने हमारे कीमती समय को बर्बाद होने में मदद की ,अब कोई फोटो नहीं लगायेंगे , ना ही ब्लॉग लिखने में अपना समय बर्बाद करेंगे | 
जय हिंद !!!!!! जय हिंद !!!!!!! जय हिंद !!!!!!!!
......आमोद कुमार,  पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान
देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयीं भगवान् देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयीं भगवान् कितना बदल गया इंसान !!!!!!

जीवन में अगर कुछ अच्छा कर दिखाना हैं तो हमेशा अपने प्रियजनों के साथ अच्छा व्यवहार करें.....


अगर मगर कुछ नहीं .....जीवन में अगर कुछ अच्छा कर दिखाना हैं तो हमेशा अपने प्रियजनों के साथ अच्छा व्यवहार करें...बहुत ही साधारण सी बात हैं ...जीवन्मुक्त पुरुष सबमें होते हुए, सब करते हुए भी सुखपूर्वक जीते हैं, सुखपूर्वक खाते पीते हैं, सुखपूर्वक आते जाते हैं, सुखपूर्वक स्वस्वरुप में समाते हैं ।क्षुद्र भावनाओं की चपेट में आकर समाज टूटता है…झूठ की जय जयकार होती है और सच अपना  मुहं  छिपाकर रोता है। अगर किसी बात की चिंता सता रही हैं तो किसी दोस्त की कोई परेशानी हल करने में मदद करें। आपकी चिंताएं खुद ही खत्म हो जाएंगी.......आज आधुनिकीकरण और आकांक्षाओं की अंधी उडान ने हमशे आपसे परिवार भी छीन लिए हैं।हमें ख्याल रखना हैं उनका ......
अपने विद्वान पूर्वजों ने भी भी चेतावनी दी है कि जिस प्रकार जंगल में हवा के प्रकोप से एक ही वृक्ष की शाखाएं आपस में रगड़ कर अग्नि पैदा करती है और उसमें वो वृक्ष ही नही वरन पूरा वन ही जलकर भस्म हो जाता है। उसी प्रकार घर  भी आपसी कलहाग्नि और द्वेषाग्नि से भस्म हो जाता है। जहां आपसी कलह है वहां शक्ति का क्षय अवश्यभामी है। घर तो घर होता वहां गुस्सा नहीं करना हैं ....सभी को प्यार करते हुए  प्यार से आगे बढ़ते जाना हैं .......

कबीर के दोहों में जो मिठास और सच्चाई है शायद और किसी में हो ......
ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोये,
औरों को शीतल करे, आपहुँ शीतल होये।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर
पंथी को छाया नही, फल लगे अति दूर।
कबीरा खड़ा बाजार में मांगे सब की खैर
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर!.........यहाँ प़र कबीर दास जी की पंक्ति को मैं अलग अंदाज़ मैं पढता हूँ ........दोस्ती सभी अच्छे

लोग के साथ करना हैं ....और सभी ख़राब लोगो से दूर रहना हैं .....
बुरा जो देखन में चला, बुरा ना मिलया कोई
जो मन खोजा आपना, मुझ से बुरा ना कोई। 
दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे ना कोये
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होये।
चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोए
दो पाटन के बीच में, साबुत बचा ना कोए।
कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥
मैं हमेशा कहता हूँ कि  तकदीर हैं क्या , मैं क्या जानू ? मैं मालिक अपनी किस्मत का, मैं बंदा अपनी,....... अपनी हिम्मत का ..............
पुराना इतिहास खत्म नहीं हो जाता हैं , लेकिन नया इतिहास तो हमेशा बनता ही हैं ना.........
Unforgettable Dialogues
"जिसने हर रोज अपनी माँ को थोड़ा थोड़ा मरते देखा हो , उसे मौत से डर नहीं लगता ." - Trishul
"आपने जेल की दीवारों और जंजीरों का लोहा देखा है जेलर साहब , कालिया की हिम्मत का फौलाद नहीं देखा हैं ." -Kaalia
"जो मर्द होता है, उसे दर्द नहीं होता ." -Mard
"रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप होते हैं , नाम है शहेंशाह ." -Shahenshah
"सही बात सही वक़्त पे किया जाये तो उसका मज़ा ही कुछ और है , और मैं सही वक़्त का इंतज़ार करता हूँ ." -Trishul
......आमोद कुमार, पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

Wednesday, June 16, 2010

मैं मालिक अपनी किस्मत का, मैं बंदा अपनी अपनी हिम्मत का ..............

मैं तो हमेशा सच बोलता हूँ. अब अगर लोग मेरी बातों को झूठ  समझ लेते हैं तो इसमें मेरे जैसे बंदे का क्या कसूर हैं ? -------------मैं तो मालिक हूँ अपनी किस्मत का, मैं तो बंदा हूँ अपनी अपनी हिम्मत का ..............लोग कहते हैं कि सिकन्दर सारी दुनिया का मालिक था, लेकिन हमें सिकन्दर बनने का कोई शौक नहीं हैं लेकिन अपने आत्मा का मालिक तो हमेशा बना रहूँगा , इसकी आज़ादी तो मुझे हैं ही .....लोगो प़र अत्याचार करके सिकन्दर बनने से अच्छा हैं कि कही जहर खा कर जान दे दे .....इस धरती माँ का बोझ तो कमसे कम ना बने ....
सिकन्दर तो छुछुंदर था जिसने अपने जुर्म से इतिहास के हरेक पन्ना में नाम लिख दिया , जो प्यार से इस दुनियाँ को चलायेगा वह व्यक्ति ही बनेगा असली शहंशाह !!!!!
मैं थोडा दुखित और खिन्नित अवश्य हूँ …पर क्रोधित नहीं हूँ…. अपनी हिम्मत अंतिम दम तक बनाये रखूंगा !विधिवत रूप से जब कोई कार्य नहीं हो पता हैं तो थोडा परेशानी तो होती ही हैं ना |
यदि किसी को हमसे समस्या है तो ये उनकी समस्या है …हमें किसी से कोई समस्या नहीं है और रहेगा भी नहीं , हम तो सभी लोगो से अच्छे की ही कामना करते हैं !
किसी की भी स्थिति अगर विकट है तो हिम्मत से काम ले ना की समस्या में उलझे रह कर एक  नया समस्या खड़ा करे , सब समस्या का निदान होता हैं शान्ति और प्रेम से साथ में अगर हिम्मत रहे तो तुरंत  समाधान मिल जाता हैं |
......आमोद कुमार, पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

Monday, June 14, 2010

अतीत की स्मृति में मनुष्य के लिए स्वाभाविक आकर्षण है.........

भिन्न भिन्न प्रकार की वस्तुओं को देखकर हमारे मन पर भिन्न भिन्न प्रकार का प्रभाव पड़ता है। किसी सुन्दर वस्तु को देखकर हम प्रफुल्ल हो जाते हैं, किसी अद्भुत वस्तु या व्यापार को देखकर आश्चर्यमग्न हो जाते हैं, किसी दु:ख के दारुण दृश्य को देखकर करुणा से आर्द्र हो जाते हैं।
जीवन तो जीवन-चाहे राजा का हो, चाहे रंक का। उसके सुख और दु:ख दो पक्ष होंगे ही। इनमें से कोई पक्ष स्थिर नहीं रह सकता। संसार और स्थिरता? अतीत के लम्बे चौड़े मैदान के बीच में इन उभय पक्षों की घोर विषमता सामने रखकर आप जिस भावधारा में डूबे हैं उसी में औरों को भी डुबाने के लिए भावुक बातें लिखी हैं ...
''दार्शनिक कहते हैं, जीवन एक बुदबुदा है, भ्रमण करती हुई आत्मा के ठहरने की एक धर्मशाला मात्र है। वे यह भी बताते हैं कि इस जीवन का संग तथा वियोग क्या है-एक प्रवाह में संयोग के साथ बहते हुए लकड़ी के टुकड़ों के साथ तथा विलग होने की कथा है। परन्तु क्या ये विचार एक संतप्त हृदय को शान्त कर सकते हैं?...सांसारिक जीवन की व्यथाओं से दूर बैठा हुआ जीवन संग्राम का एक तटस्थ दर्शक चाहे कुछ भी कहे, किन्तु जीवन के इस भीषण संग्राम में युध्द करते हुए घटनाओं के घोर थपेड़े खाते हुए हृदयों की क्या दशा होती है, यह एक भुक्तभोगी ही बता सकता है।'' अतीत की स्मृति में मनुष्य के लिए स्वाभाविक आकर्षण है। अर्थपरायण लाख कहा करें कि 'गड़े मुरदे उखाडने से क्या फ़ायदा' पर हृदय नहीं मानता, बार बार अतीत की ओर जाया करता है; अपनी यह बुरी आदत नहीं छोड़ता। इसमें कुछ रहस्य अवश्य है। हृदय के लिए अतीत मुक्तिलोक है जहाँ वह अनेक बन्धनों से छूटा रहता है और अपने शुध्द रूप में विचरता है। वर्तमान हमें अन्धा बनाए रहता है; अतीत बीच बीच में हमारी आँखे खोलता रहता है। मैं तो समझता हूँ कि जीवन का नित्यस्वरूप दिखानेवाला दर्पण मनुष्य के पीछे रहता है; आगे तो बराबर खिसकता हुआ परदा रहता है। बीती बिसारनेवाले 'आगे की सुध' रखने का दावा किया करें, परिणाम अशान्ति के अतिरिक्त और कुछ नहीं। वर्तमान को सँभालने और आगे की सुध रखने का डंका पीटनेवाले संसार में जितने ही अधिक होते जाते हैं संघशक्ति के प्रभाव से जीवन की उलझनें उतनी ही बढ़ती जाती हैं। बीती बिसारने का अभिप्राय है जीवन की अखंडता और व्यापकता की अनुभूति का विसर्जन, सहृदयता और भावुकता का भंग-केवल अर्थ की निष्ठुर क्रीड़ा।
जब संसार में कोई वस्तु स्थायी नहीं तो सुख दशा कैसे स्थायी रह सकती है? जिसे कभी पूर्ण सुख समृध्दि प्राप्त थी उसके लिए केवल उस सुख दशा का अभाव ही दु:ख स्वरूप होगा। उसे सामान्य दशा ही दु:ख की दशा प्रतीत होगी। जो राजा रह चुका है उसकी स्थिति यदि एक सम्पन्न गृहस्थी की सी हो जायगी तो उसे वह दु:ख की दशा ही मानेगा। सुख की यह सापेक्षता समष्टि रूप में दु:ख की अनुभूति की अधिकता बनाए रहती है किसी एक व्यक्ति के जीवन में भी, एक कुल या वंश की परम्परा में भी। इसी से यह संसार दु:खमय कहा जाता है।
अच्छे मनुष्य के लिए जीवन एक  अग्नि-पथ हैं , बड़ा मुस्किल होता हैं इस  अग्नि-पथ पर चलना लेकिन अगर कुछ भी अच्छा करना चाहते हैं तो अवस्य चले , दौलत और जवानी एक दिन खो जाती हैं लेकिन हमेशा अग्नि-पथ की यादें राह जाती हैं  !!!!!!!!!!!!!!!!भगवान आदि के चक्कर में ना पड़े ....अपने आप की  ताकत से आगे बढे ....
भारत के संविधान में तो नहीं पर यह प्रकृति का दिया हुआ उपहार हैं की इस धरती में सबको अपनी-अपनी मूर्खताओं और उन पर खुश रहने की छूट है , हो सकता उसमे हम भी एक हो , ... लेकिन मैं यह बात अपने दिल से लिख रहा हूँ की अगर भगवान नाम के कोई भी चीज़ अगर धरती या आकाश जहाँ कही भी हो .....उनसे मैं कह रहा हूँ कि '''''''हे ईश्वर अगर आप अगर सचमुच हैं तो हमको आज मौत दे दीजिये , यह चुनौती हैं मेरा आपके लिए '''''''''''' मैं अगर मर गया तो हे ईश्वर जो लोग मेरे जैसा हैं वह आपकी सदैव आस्तिक बन जायेगा ....... मेरे एक के मरने से दुनियाँ से कोई फर्क भी नहीं पड़ेगा ....वैसे भी मैं तो अपने आपको गुनाहों का देवता मानता हूँ |
आमोद कुमार

पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

Sunday, June 13, 2010

अपने हाथ की लकीरों पर भरोसा करना मुर्खता के अलावा और कुछ भी नहीं हैं ........

अपने हाथ की लकीरों पर भरोसा करना  मुर्खता के अलावा और कुछ भी नहीं हैं ........हम भी जब किसी को जानते हैं कि ये  ज्योतिष हैं तो उनको खुश करने के लिये अपना हाथ देते हैं कि देखिये ना मेरा हाथ कैसा हैं वह भी सिर्फ इस लिये कि वे खुश रहे कि कोई उनसे उपना हाथ दिखवा रहा हैं .आज कल ही नहीं पहले भी ना जाने कितना ज्योतिष लोग घूमते आ रहे हैं जिनका शुद्ध  व्यवसाय हैं दुसरे व्यक्ति का हाथ देखकर अपने व्यवसाय में प्रगति करना ..... इतना सारा तरह तरह का पत्थर पहनवा देते हैं की सभी लोग जानते हैं ....आपको अगर किसी तरह की समस्या हैं , जब कुछ नहीं समझ में आये तो किसी ज्योतिष जी के पास चले जाये क्योंकि ज्योतिष लोग के पास सभी चीज का झूठा इलाज हैं .
हम भी हाथ में तरह तरह का जो मुझको सुंदर लगता हैं अँगूठी पहनते हैं जिसमे पत्थर भी लगा रहता हैं .....बहुत लोग पूछे भी हैं कि किस ज्योतिष जी से देखवाकर पहने हैं , उस समय हमारा सीधा उत्तर रहता हैं अरे सर हम तो अपना मन से पहन लिये हैं , तुरंत लोग हँसना शुरू कर देंगे कि अरे क्यों झूठ बोलते हैं ? हम भी फिर सीधा उत्तर देते हैं चुकि आप शुरू से झूठ और झूठे व्यक्ति के साथ रहने के आदि रहे हैं इसलिये आपको  ऐसा लग रहा हैं इसमें आपकी कोई गलती नहीं हैं ........ कितना लोग सामने में तो  नहीं हमसे हटकर बोल देंगे अरे छोड़ो यह पागल हैं , सामने चुकि इसलिये नहीं बोलते हैं कि हम अच्छा पिटाई भी कर देते हैं  और जब वह व्यक्ति हमसे पुनः पूछता हैं कि हमको क्यों आपने मारा ......फिर मेरा सीधा उत्तर रहता हैं कि आप ही ना हमको पागल बोले थे  अभी और आप तो जानते हैं कि पागल आदमी कुछ भी कर सकता हैं .......फिर यह तुरंत उस महान व्यक्ति से सुनने को मिल जाता हैं कि आपने बहुत चालाकी दिखाई हैं ....हमारा उत्तर रहता हैं कि अब सर आप बताये कि एक तरफ तो आप हमको पागल बोल देते हैं दूसरे तरफ चालक , आप कृपया अच्छे डॉक्टर से मिलकर अपने बारे में उचित सलाह लेकर दवा खाए   क्योंकि आपकी मानसिक स्थिति सही नहीं प्रतीत होती हैं , आप तुरंत तुरंत अपने कहें हुए शब्दों से मुकर जाते हैं .....
सब लोग कर्म प़र विश्वास करे , जो व्यक्ति बिना हाथ के जन्म लेता हैं उसकी रेखा कहाँ होती हैं ? वह व्यक्ति तो कर्म के सहारे ही अपने जीवन को अच्छे से जीता हैं ......
जिस तरह से एक शराबी और जुआरी सच लिखने का दावा नहीं कर सकता , उसी तरह से किसी के हाथ कि लकीर देखकर उसके तकदीर का आकलन नहीं किया जा सकता हैं ......ईतिहास गवाह हैं कि जिसने स्वप्न में भी कल्पना नहीं कि होगी , वह व्यक्ति भी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री बने हैं ........
लालच और बुराइयों से दूर रहने  का हमेसा प्रयतन करे , तकलीफ तो रास्ते में बहुत मिलेगी, लेकिन सुख मिलेगी अपरम्पार .....
......आमोद कुमार, पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

Saturday, June 12, 2010

दूसरों के साथ सकारात्मक तरीके से विचारों का आदान-प्रदान करना ही मानसिक शक्ति का सबसे बडा स्रोत है .....

दूसरों के साथ सकारात्मक तरीके से विचारों का आदान-प्रदान करना ही मानसिक शक्ति का सबसे बडा स्रोत है .....
जिस तरह रंग सादगी को निखार देते हैं उसी तरह सादगी भी रंगों को निखार देती है। सहयोग सफलता का सर्वश्रेष्ठ उपाय है.....एकता का किला सबसे सुरक्षित होता है। न वह टूटता है और न उसमें रहने वाला कभी दुखी होता है ।
बिना साहस के हम कोई दूसरा गुण भी अनवरत धारण नहीं कर सकते । हम कृपालु, दयालु , सत्यवादी , उदार या इमानदार नहीं बन सकते ।बिना निराश हुए ही हार को सह लेना पृथ्वी पर साहस की सबसे बडी परीक्षा है ।
किसी की करुणा व पीड़ा को देख कर मोम की तरह दर्याद्र हो पिघलनेवाला ह्रदय तो रखे परंतु विपत्ति की आंच आने पर कष्टों-प्रतिकूलताओं के थपेड़े खाते रहने की स्थिति में चट्टान की तरह दृढ़ व ठोस भी बने रहना हैं !
पानी में तैरनेवाले ही डूबते हैं, किनारे पर खड़े रहनेवाले नहीं, मगर ऐसे लोग कभी तैरना भी नहीं सीख पाते।
हर व्यक्ति में प्रतिभा होती है. दरअसल उस प्रतिभा को निखारने के लिए गहरे अंधेरे रास्ते में जाने का साहस कम लोगों में ही होता है..
कमाले बुजदिली है , पस्त होना अपनी आँखों में ।
अगर थोडी सी हिम्मत हो तो क्या हो सकता नहीं ॥
अभय-दान सबसे बडा दान है ।भय से ही दुख आते हैं, भय से ही मृत्यु होती है और भय से ही बुराइयां उत्पन्न होती हैं ।
भय से तब तक ही डरना चाहिये जब तक भय (पास) न आया हो । आये हुए भय को देखकर बिना शंका के उस पर् प्रहार् करना चाहिये ।
जिन ढूढा तिन पाइयाँ , गहरे पानी पैठि ।

मै बपुरा बूडन डरा , रहा किनारे बैठि ॥
.......आमोद कुमार, पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

संकल्प बल की यह आखिरी उपलब्धि है...........

राह पर चलते हुए कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति को देखो,फिर चाहे वो इंग्लॅण्ड का सर्वाधिश हो या अमेरिका प्रेसिडेंट ,रशिया का सर्वेसर्वा हो या चीन का सरमुख्त्यार हो,अपने मन में कोई भी तरीके की इर्षा या भय की सोच ना लाओ....उनकी बादशाही नजर को अपनी नजर से देखो......सोचो की में भी वो ही हु......एकबार ऐसा भाव बना लोगे तो धोखे और अविश्वास से भरा यह संसार,आपका कुछ नहीं बिगड़ सकेगा........मार्ग में चलते चलते आपके सामने जब भारी आपत्ति या दुःख ए तब उनमे सुख की अनुभूति करे...क्युकी वह सब ही नित्यानंद प्राप्त करने में निमित्त बनता है........
अशुभ का कभी भी विरोध ना करे.......आप अगर गुस्से या आवेश में आकार किसी को ठीक करने को चले तो सफल नहीं हो पाओगे.....सब परिस्थितियो का स्वागत करे.......फिर क्यों वो आपकी धरना से विपरीत क्यों ना हो....?आप खुद देख सकोगे की प्रत्यक्ष बुराई भलाई में,सच्चाई बदल रही है.......
हरी ॐ ......नारायण हरी....ॐ नमो भगवते वासुदेवाय.........
मनोबल बढ़ाकर आत्मा में बैठ जाओ, आप ही ब्रह्म बन जाओ। संकल्प बल की यह आखिरी उपलब्धि है।अपने को परिस्थितिओ का गुलाम कभी न समझो। तुम स्वयं अपने भाग्य के विधाता हो !
जीवन की पथरीली सी राहों में,तपती हुई दोपहर में चलतेचले जाना हैं , फल की चिंता नहीं करना हैं .......चल चला चल ......मैं निर्भय रहूँगा । मैं बेपरवाह रहूँगा जगत के सुख दु:ख में । मैं संसार की हर परिस्थिति में निश्चिन्त रहूँगा, क्योंकि मैं आत्मा हूँ । ऐ मौत ! तू शरीरों को बिगाड़ सकती है, मेरा कुछ नहीं कर सकती । तू क्या डराती है मुझे ?
दृढ़तापूर्वक निश्चय करो कि तुम्हारी जो विशाल काया है, जिसे तुम नाम और रुप से ‘मैं’ करके सँभाल रहे हो उस काया का, अपने देह का अध्यास आज तोड़ना है । साधना के आखिरी शिखर पर पँहुचने के लिए यह आखिरी अड़चन है । इस देह की ममता से पार होना पड़ेगा । जब तक यह देह की ममता रहेगी तब तक किये हुए कर्म तुम्हारे लिए बंधन बने रहेंगे ।
हे प्रभु ! हे दया के सागर ! तेरे द्वार पर आये हैं । तेरे पास कोई कमी नहीं । तू हमें बल दे, तू हमें हिम्मत दे कि तेरे मार्ग पर कदम रखे हैं तो पँहुचकर ही रहें । हे मेरे प्रभु ! देह की ममता को तोड़कर तेरे साथ अपने दिल को जोड़ लें .....
हाय रे हाय मनुष्य तेरा श्वास ! हाय रे हाय तेरी कल्पनाएँ ! हाय रे हाय तेरी नश्वरता ! हाय रे हाय मनुष्य तेरी वासनाएँ ! आज तक इच्छाएँ कर रहा था कि इतना पाया है और इतना पाँऊगा, इतना जाना है और इतना जानूँगा, इतना को अपना बनाया है और इतनों को अपना बनाँऊगा, इतनों को सुधारा है, औरों को सुधारुँगा ।
मैं निर्भय रहूँगा । मैं बेपरवाह रहूँगा जगत के सुख दु:ख में । मैं संसार की हर परिस्थिति में निश्चिन्त रहूँगा, क्योंकि मैं आत्मा हूँ । ऐ मौत ! तू शरीरों को बिगाड़ सकती है, मेरा कुछ नहीं कर सकती । तू क्या डराती है मुझे ?
निर्भयतापूर्वक, दृढ़तापूर्वक, ईमानदारी और नि:शंकता से अपनी असली चेतना को जगाना हैं .......
......आमोद कुमार, पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

Thursday, June 10, 2010

आत्मा की संतुष्टि, शारीरिक स्वस्थता व बुद्धि की स्थिरता चाहते हैं तो हमेशा हँसते-खिलखिलाते रहे ......

आत्मा की संतुष्टि, शारीरिक स्वस्थता व बुद्धि की स्थिरता चाहते हैं तो हमेशा हँसते-खिलखिलाते रहे .हँसना एक मानवीय लक्षण है, सृष्टि का कोई भी जीवधारी नहीं हँसता लेकिन एक हम मनुष्य ही हँसने वाले प्राणी हैं, जीवन में निरोगी रहने के लिए हमेशा मुस्कुराते रहना चाहिए। खाना खाते समय मुस्कुराइए, आपको महसूस होगा कि खाना अब अधिक स्वादिष्ट लग रहा है।
अपने में जिंदादिली एवं  खुशमिजाजी बनाये रखने के लिये हमेशा हँसते रहने का प्रयास करे ..निराशा और चिंता का अचूक इलाज हैं हँसना ..जो व्यक्ति सुख और दुःख दोनों में हँसते रहता हैं वह व्यक्ति ही हैं सबसे बड़ा खिलाड़ी..रोते हुए तो सब आते हैं यह कटु सत्य हैं ...लेकिन जो हँसते हँसाते जीवन काटते हैं ..वही हैं सच्चे संत .....
कभी कभी हरेक इंसान के लिये परिस्थिति  ऐसा बनती हैं की आदमी को ना चाहते हुए भी रोना पड़ जाता हैं शायद नियति का प्रभाव हो , लेकिन बहादुर की तरह आँख से आँसू पोछकर हँसते हुए अच्छे कर्मो के लिये निकल जाना हैं .....लेकिन जो नियति रुलाएगा वह एक दिन हँसने का भी दिन जरूर लायेगा |
जब भी किसी के लिए कुछ भी सोंचो अच्छा सोंचो, अगर सोंच अच्छी रहेगी तो दिल को भी ख़ुशी मिलेगी, दिल को खुशी मिलेगी तो होठो पे मुस्कुराहट आ ही जाएगी, हँसी और खुशी तो जहाँ भी चाहो मिल सकती हे, उसे ढूँढने नही जाना पड़ता, कभी कुछ पल के लिए हम मायूस हो गये और कुछ अच्छा ना लगे तब भी अगर आप कोई ऐसा पल याद कर ले जो आप की ज़िंदगी का सबसे हसीन पल हो तो मायूसी धीरे धीरे से अपने आप ही दूर हो जाएगी.
हँसते हुए जो समय आप व्यतीत करते हैं, वह ईश्वर के साथ व्यतीत किया समय है।अच्छे मित्रों को पाना कठिन , वियोग कष्टकारी और भूलना असम्भव होता है।इस लिये गुस्सा नहीं होना हैं ...
हर व्यक्ति में प्रतिभा होती है. दरअसल उस प्रतिभा को निखारने के लिए गहरे
अंधेरे रास्ते में जाने का साहस कम लोगों में ही होता है.

कमाले बुजदिली है , पस्त होना अपनी आँखों में ।
अगर थोडी सी हिम्मत हो तो क्या हो सकता नहीं ॥
अपने को संकट में डाल कर कार्य संपन्न करने वालों की विजय होती है। कायरों की नहीं।
गलती करने में कोई गलती नहीं है ।लेकिन गलती करने से डरना सबसे बडी गलती है, गलती करने का सीधा सा मतलब है कि आप तेजी से सीख रहे हैं , बड़ी गलतियाँ किये बिना कोई बडा आदमी नहीं बन सकता ,शायद इन्ही कारणों से मैं आगे अभी तक नहीं निकल पाया हूँ .......
दुनिया में सुख एवं दुःख दोनों ही धूप-छाँव की भाँति आते-जाते हैं यदि मनुष्य दोनों परिस्थितियों में हँसमुख रहे तो उसका मन सदैव काबू में रहता है व वह चिंता से बचा रह सकता है। आज के इस तनावपूर्ण वातावरण में व्यक्ति अपनी मुस्कुराहट व हँसी को भूलता जा रहा है,फलस्वरूप तनावजन्य बीमारियाँ जैसे- उच्च रक्तचाप, शुगर, माइग्रेन, हिस्टीरिया, पागलपन, डिप्रेशन आदि बहुत-सी बीमारियों को निमंत्रण दे रहा है।
अंत में कहूँगा की अपनी गलती स्वीकार कर लेने में लज्जा की कोई बात नहीं है । इससे दूसरे शब्दों में यही प्रमाणित होता है कि कल की अपेक्षा आज आप अधिक समझदार हैं , और खुश रहिये ....हँसते हँसते ......ये जीवन हैं ....क्योंकि असफलता आपको महान कार्यों के लिये तैयार करने की प्रकृति की योजना है ......
......आमोद कुमार, पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान

Wednesday, June 9, 2010

अपने दिव्य रूप की चमक में मनुष्य अपने अंधेरे क्षणों में रोशनी प्राप्त करता है......

अक्सर कहा जाता है कि प्रबंधन कोरी किताबों को पढ़ कर नहीं सीखा जा सकता, इसे वास्तविक जीवन की जटिल परिस्थितियों से संघर्ष कर ही सीखा जा सकता है। यही कारण है कि कालजयी रचनाएं अपने समय के मनुष्य के द्वंद्व का सबसे बड़ा गवाह होती हैं । बरसों तक कायम रहने वाली इन रचनाओं की चमक में मनुष्य अपने अपने अंधेरे क्षणों में रोशनी प्राप्त करता है। कालजयी रचनाएं चाहें भगवदगीता हो या इलियड हो अथवा पिछली शताब्दी की रचना वार एंड पीस, सारी रचनाओं की पृष्ठभूमि युद्ध के धरातल पर तैयार की गई है।
प्रबंधन का पहला सूत्र गीता से:
कुरुक्षेत्र के मैदान में लिखी गई इस महान रचना का उद्भव ही नहीं हो पाता अगर अर्जुन ने कुशल सलाहकार अथवा युद्ध प्रबंधक नहीं चुना होता। अर्जुन और दुर्योधन अक्षोहिणी सेना का सहयोग प्राप्त करने कृष्ण के पास गए थे। दुर्योधन ने अक्षोहिणी सेना प्राप्त की और अर्जुन ने मैनेजर के रूप में कृष्ण को चुना। आगे स्पष्ट है कि युद्ध के हर अहम मौके पर कृष्ण ने अपनी कूटनीतिक चालों से कौरवों के इरादे ध्वस्त कर दिए।
प्रबंधन का दूसरा सूत्र गीता से:
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव:, गीता की शुरुआत ही धर्म शब्द से होती है अर्थात युद्ध का उद्देश्य यहां पर केवल महत्वाकांक्षा की प्रतिस्पर्धा नहीं है अपितु युद्ध नैतिक मूल्यों के लिए भी लड़ा जा रहा है। गीता का असल प्रश्न दूसरे अध्याय सांख्य योग से शुरू होता है। अर्जुन अनिर्णय का शिकार है यह ऐसी ही स्थिति है जिसका सामना अधिकांश प्रबंधक कर रहे हैं। उन्हें कठिन लक्ष्य दिए जाते हैं जिनको पूरा करना कई बार उन्हें असंभव जान पड़ता है।
अर्जुन के सामने भी यही समस्या थी। सामने भीष्म और द्रोण जैसे दिग्गज है वह गुरु भी हैं और श्रेष्ठ योद्धा भी। ऐसे में युद्ध के पूर्व ही अर्जुन अपना गांडीव रख देते हैं। कृष्ण ऐसे समय में प्रोत्साहक (मोटिवेटर) के रूप में सामने आते हैं। वह अर्जुन को चुनौती देते हैं कि हतो वा प्राप्यसि स्वर्गा, जीत्वा वा भोक्ष्यसे महीम। अर्थात जीतोगे तो धरती का ऐश्वर्य भोगोगे और वीरगति प्राप्त करने पर स्वर्ग। मोटिवेशन की प्रबंधन में सबसे बड़ी भूमिका है और यहीं से गीता की शुरुआत होती है।
गीता का तीसरा सूत्र:
गीता का संदेश वेदों और उपनिषदों के संदेश से ही अधिक परिष्कृत होकर सामने आया है। बृहदारण्यक उपनिषद में कहा गया है कि आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवतु। अर्थात अगर आपने अपनी आत्मा का संबंध इस विश्वआत्मा से जोड़ लिया तो भेदभाव औरर् ईष्या की सारी भावना समाप्त हो जाएगी। पूरी गीता इस शुध्द आत्मा की तलाश का आख्यान है। गीता का मुख्य संदेश है कर्ता भाव से मुक्ति। जब मनुष्य कोई काम करता है और इसके पीछे अपनी पीठ थपथपाता है तब एक तरह से अहंकार की सृष्टि होती है जिससे कई तरह के मनोविकारों का जन्म होता है।
महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा में गीता के एक सुंदर श्लोक से इसे समझाया था। ध्यायते विषयोन्पुनस:.... पूरे श्लोक का मर्म है कि विषयों को हमेशा सोचने वाले व्यक्ति के मन में यह स्थाई विकार के रूप में शामिल हो जाते हैं और इससे क्रोध आदि विकारों का जन्म होता है इससे स्मृति भंग हो जाती है और अतत: आत्मा का नाश हो जाता है। दरअसल प्रबंधन के क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्ति के मन में भी कई तरह की आकांक्षाएं होती हैं, कई बार यह आकांक्षाएं तुलना का रूप ले लेती है इससे एक तरह के चूहा दौड़ की शुरुआत होती है जिससे सही लक्ष्यों की ओर से मन भटक जाता है।
गीता का चौथा सूत्र:
जब कृष्ण अपना दिव्य रूप अर्जुन को दिखाते हैं तो उनके मुख से अनायास ही निकल जाता है,
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतमदर्शनम अनेक दिव्याभरणं
दिव्यानेकोद्यातायुधम, दिव्यमाल्यामबरधरं, दिव्य गंधानुलेपनम
सर्वाश्चर्यं मयं विश्वोतदेवमुखम।
यहां पर कृष्ण पर्सनालिटी के प्रति सजगता दिखा रहे हैं। एक प्रोफेशनल को कैसे रहना चाहिए। अपने दिव्य रूप में वह अनेक सुगंधित द्रव्यों से सजे हैं उन्होंने दिव्य माला धारण कर रखी है। कहने का तात्पर्य यह है कि कृष्ण संपूर्ण सौंदर्य पर जोर देते हैं अर्थात मन की शुध्दता और तन का वैभव।
गीता का पांचवा सूत्र:
कृष्ण गीता में कर्म पर जोर तो देते ही हैं उनका जोर ज्ञान पर भी होता है। उन्होंने कहा है कि न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिहं विद्यतं। प्रोफेशनल लाइफ में तरक्की करने आपको लगातार ज्ञान से अपडेट करना होगा।
 गीता का छठा सूत्र:
गीता मनुष्य को लगातार आत्म-निरीक्षण के लिए प्रेरित करती है। पश्चिम में सफल प्रबंधन के लिए प्रबंधक के चरित्र में कुछ खास गुणों का होना अनिवार्य माना गया। यही बात गीता में भी कृष्ण ने कही है
अभयं सत्व संशुध्दिज्र्ञान योग व्यवस्थिति:॥
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप अर्जवम॥
गीता में विस्तार से सात्विक गुण वाले व्यक्ति और राजसिक एवं तामसिक गुणों वाले प्रवृत्ति के व्यक्ति के बीच अंतर रेखांकित किया गया है। जीवन की परिस्थितियां मनुष्य के भीतर द्वंद्व उत्पन्न करती रहती हैं, कई बार मनुष्य दूसरों के कहने पर उद्विग्न हो जाता है और कई बार अपने कटु वचनों से दूसरों को उद्विग्न कर देता है। प्रोफेशनल लाइफ में यह दोनों वाकये कैरियर के लिए घातक होती हैं। गीता इससे बचते हुए स्वधर्म का पालन करने का सलाह देती है। यह ईर्ष्या से भरे वातावरण में संजीवनी की तरह साबित होती है।
श्रेयान स्वधर्मों विगुण: परधर्मास्वनिष्ठितात।
स्वभावं नियतं कर्म कुर्वन्नाप्तोति किल्बिषम॥
अंत में गीता का मैनेजमेंट प्रबंधकों को सबसे बड़ा संदेश यह है कि संशय का त्याग कर (संशयात्मा विनश्यति) अपने कर्म का पालन करें और फल की चिंता परमात्मा पर छोड़ दें।
......आमोद कुमार, पाटलिपुत्र , बिहार , हिंदुस्तान